21/01/2026
अष्टांग योग { Ashtanga Yoga }
Eight limbs of Yoga योग के 8 चरण 🧘📶
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान समाधयोsष्टावङ्गानि।। (योगसूत्र- 2.29)
1. यम - पांच सामाजिक नैतिक नियम
✓अहिंसा : वाणी से, विचारों से और कर्मों से किसी भी जीव जगत को हानि नहीं पहुँचाना।
✓सत्य: मन, वचन और कर्म से सत्यता का पालन करना ।
✓अस्तेय : चौर्य प्रवृत्ति से निवृत्ति अर्थात् चोरी इत्यादि ना करना।
✓ब्रह्मचर्य :चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना या सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना ।
✓ अपरिग्रह : आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा ना करना।
2. नियम - पाँच व्यक्तिगत नैतिक नियम
√ शौच : शरीर और मन की शुद्धि ।
√ सन्तोष: जो कुछ जीवन में प्राप्त हैं उसमें संतुष्ट रहना।
√ तप: द्वन्दों को सहन करना, स्व अनुशासन में रहना।
√ स्वाध्याय: गुरुओं द्वारा रचित ग्रंथों को पढ़ना और आत्मचिंतन, आत्म निरीक्षण करना।
√ ईश्वर-प्रणिधान: मन, वचन से समस्त शुभ और अशुभ कर्मों को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित करना , पूर्ण श्रद्धा, पूर्ण विश्वास और निष्ठा के साथ ईश्वर को ही अपना सर्वस्व मानना।
3. आसन : अष्टांग अंग का तीसरा अंग है आसन।
4. प्राणायाम: प्राणायाम का अर्थ है प्राणों का आयाम अर्थात प्राणों का विस्तार ।
5. प्रत्याहार: इन्द्रियों को उनके आहार विषयों से विमुख कर देना।
6. धारणा : चित्त को किसी एक विचार में बांध लेने की क्रिया को धारणा कहा जाता है।
7. ध्यान : ध्यान चेतन मन की एक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपनी चेतना बाह्य जगत् के किसी चुने हुए दायरे अथवा स्थल एवं स्थान विशेष पर केंद्रित करता है।
8. समाधि: ध्यान की उच्च अवस्था को समाधि कहते हैं। जब साधक ध्येय वस्तु (जिसका वह ध्यान कर रहा है) के ध्यान में पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नहीं रहता है तो उसे समाधि कहा जाता है।
ये योग के आठ अंग है।
Source: Fb