Radha Madhav Satsang - Myanmar

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 #सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_मदर्स_डे_के_उपलक्ष्य_में_भक्ति_संदेश :-श्री राधा-चरण-चंचरीक भक्तवृंद ! आप सभी को मदर्स-डे (...
10/05/2026

#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_मदर्स_डे_के_उपलक्ष्य_में_भक्ति_संदेश :-
श्री राधा-चरण-चंचरीक भक्तवृंद !
आप सभी को मदर्स-डे (मातृ-दिवस) की हार्दिक बधाई व शुभकामनायें।
संसार में भी माँ का स्थान पिता से सौ गुना ऊँचा माना गया है –
‘पितु: शतगुणा माता पूज्या वंद्या गरीयसी’ (ब्रह्मवैवर्तपुराण 4/59/144)

अपनी संतान के प्रति जितना वात्सल्य, जितनी ममता माँ की होती है, जितना त्याग वो करती है उतना पिता नहीं कर सकते। यद्यपि दोनों ही अपनी संतान से प्रेम करते हैं लेकिन फिर भी माता का स्थान सर्वोच्च है, उसका वात्सल्य प्रेम अतुलनीय है।
अस्तु , इसी दृष्टि से माँ का सम्मान करने के लिए ,उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही ये पर्व (मदर्स-डे) मनाया जाता है।

लेकिन आध्यात्मिक पथ के पथिक आत्मकल्याण के लिए समस्त सांसारिक पर्वों को भी आध्यात्मिक दृष्टि से भक्ति-युक्त होकर ही मनाते हैं। समस्त वेदों-शास्त्रों के अनुसार हमारा वास्तविक स्वरूप आत्मा है। इसीलिए हमारे समस्त संबंध अपने अंशी भगवान श्री कृष्ण से ही हैं। उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण ने ही राधारानी के रूप में हमारी अकारण करुणामयी माँ का रूप धारण किया। वे ही हमारी सनातन माँ हैं।

हमारे परमपूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं-
प्रति जन्म नयी नयी मातु बनी बामा।
बदली न तेरी कभु साँची मातु श्यामा।। (श्यामा-श्याम-गीत)

अर्थात् सांसारिक माँ तो हर जन्म में बदलती रहती है, हम जिस-जिस योनि में गये कुत्ते, बिल्ली, गधे सब हमारी माँ बन चुके हैं, इनसे हमारा संबंध नित्य नहीं हैं, परिपूर्ण नहीं है हमारी वास्तविक माँ राधारानी ही हैं, जो सदा से हमारी माता हैं, वो कभी नहीं बदलती, न कभी हमें अकेला छोड़ती हैं, सदा हमारे साथ रहती हैं।

तू ही मेरी साँची महतारी, तूने कहा श्रुति महँ प्यारी ।
( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)

लेकिन हम ही कृतघ्नी हैं, कुपुत्र हैं जो अपनी सनातन माँ की ओर पीठ किये हुए हैं, उनसे विमुख हैं। इसीलिए माया का आधिपत्य है और अनादिकाल से हम अनंत प्रकार के दु:ख भोग रहे हैं।

अब इस अनादिकालीन बिगड़ी बात को बनाने के लिए, माया से छुटकारा पाने के लिए हमें उसी सनातन माँ की शरण में जाना होगा।
इसीलिए तो तुलसीदास जी ने भी माता सीता का दामन थामा और एक निरीह बालक की भाँति रोकर जगज्जननी से कृपा याचना करते हुए कहते हैं-

कबहुँक अम्ब अवसर पाइ
मोरिहूँ सुधि द्याइबी ,कछु करुण कथा चलाई ।
तो -
सुनत राम कृपालु के मो बिगरिबो बनि जाई।।

अर्थात् हे माँ ! कभी उचित अवसर जानकर प्रभु श्री राम के समक्ष आप ही मेरी करुण कथा सुना दीजिएगा जिससे उनकी कृपा-दृष्टि मुझे प्राप्त हो और मेरा काम बन जाए।

क्योंकि तुलसीदास जी जानते हैं कि माँ का हृदय पिता से अधिक कोमल होता है, उदार होता है इसलिए उन्हीं से सिफ़ारिश की याचना कर रहे हैं ।
श्री महाराज जी ने भी अपने कई संकीर्तनों में इसी प्रकार के भाव व्यक्त किये हैं –

सुने श्याम न ,तुम सुनु स्वामिनि राधे ।
(ब्रज रस माधुरी भाग-1)

अर्थात् हे राधारानी, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर को पुकारते-पुकारते मैं थक गया हूँ, वे तो मेरी पुकार नहीं सुनते लेकिन तुम तो सुन लो, तुम तो मेरी माँ हो, तुम अपने पुत्र से दूर भला कैसे रह सकती हो? उसकी पुकार को अनसुना कैसे कर सकती हो?
मुझे पूर्ण विश्वास है एक न एक दिन तुम अपने इस कुपुत्र को भी अवश्य अपनाओगी क्योंकि तुम तो साक्षात् कृपा की ही मूर्ति हो-

तेरी कृपा का भरोसा भारी राधारानी ।
तू तो कृपा की है मूरति राधारानी ।
तू तो कृपा ही कृपा करे राधारानी ।
तेरी कृपा का न ओर छोर राधारानी ।
(ब्रज रस माधुरी भाग-2)

यहाँ तक कि श्यामसुंदर भी किशोरी जू से कृपा प्राप्त करके ही जीवों पर कृपा करते हैं -

तेरी कृपा ते ही बनवारी, करें जीवों पर कृपा प्यारी
कृपा पर कृपा करें प्यारी, ऐसी कृपा पर वारी वारी
( ब्रज रस माधुरी - भाग 3)

अर्थात् साक्षात् कृपा शक्ति पर भी किशोरी जी कृपा करती हैं तभी वो कृपा कहलाती है।
राधारानी की ऐसी कृपा पर हम बारंबार बलिहार जाते हैं

पुन: श्री महाराज जी कहते हैं --
जापै टुक कृपा करे प्यारी, वाके पाछे डोले बनवारी।

जिसे किशोरी जी का कृपा -कटाक्ष प्राप्त हो जाए स्वयं श्यामसुंदर उस भक्त के पीछे-पीछे चलते हैं इसीलिए तो-

सुनि कृपा का विरद प्यारी, तेरे द्वार भीड़ भारी प्यारी
कोउ हो या ना हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।
(ब्रज रस माधुरी - भाग 3)

राधारानी के अधाधुंध दरबार में ही भक्तों की अधिक भीड़ होती है क्योंकि माता होने से वे अधिकारी, अनाधिकारी सभी पर मुक्त हस्त से कृपा लुटाती हैं। कृपा करने से तृप्त नहीं होतीं, खाते पीते सोते सर्वदा अपने पुत्रों पर कैसे कृपा करें? इसी चिंतन में डूबी रहती हैं।

अस्तु ,ऐसी अकारण-करुणामयी माता होने से ही उनका स्थान श्यामसुंदर से भी ऊँचा है। मातृस्वरूपा होने से जितनी क्षमा, दया, करुणा किशोरी जी के हृदय में है उतनी श्यामसुंदर के ह्रदय में नहीं हो सकती।
ऐसी वात्सल्यमयी माता की शरण में जाने से श्यामसुंदर की कृपा तो स्वयमेव प्राप्त हो जाती हैं।
तो आज उन्हीं राधारानी के चरणों की वंदना करने का, उनकी अनंत कृपाओं का स्मरण करके अश्रु बहाने का दिन है। निष्काम प्रेमयुक्त अश्रु समर्पित करके हम निरंतर उनका गुणगान करें तो एक दिन अवश्य ही उनकी कृपा के अधिकारी बन जायेंगें।
अत्यंत भोरी भारी, श्यामसुंदर की प्यारी, सुकुमारी, बरसाने वारी, वृषभानुदुलारी, कीर्तिकुमारी ,हमारी महतारी की वात्सल्य युक्त कृपा दृष्टि हम सभी अधम जीवों को प्राप्त हो इसी शुभकामना के साथ – आपकी दीदी:
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_प्रचारिका_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

नृसिंह जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।नरसिंह अवतार गोविंद-राधे ।हरि सर्वव्यापक सिद्ध करा दे ।।जय जय नृसिंह अवतार क...
30/04/2026

नृसिंह जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

नरसिंह अवतार गोविंद-राधे ।
हरि सर्वव्यापक सिद्ध करा दे ।।

जय जय नृसिंह अवतार की , जय जय प्रह्लाद कुमार की।
जय जय निज जन रखवार की, जय प्रेम ह्लादिनी सार की।
जय जय नरहरि सरकार की, जय जय भक्तन सरदार की।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

प्रेम से बोलिये:-
भक्तवत्सल नृसिंह भगवान की जय।
भक्तशिरोमणि प्रह्लाद की जय।

आप सभी को सीता मैया के प्राकट्योत्सव की हार्दिक बधाई व शुभकामनायेँ ! जगदंबिका होकर भी अपनी पावन परम सुखदायी बाल-लीला से ...
25/04/2026

आप सभी को सीता मैया के प्राकट्योत्सव की हार्दिक बधाई व शुभकामनायेँ !
जगदंबिका होकर भी अपनी पावन परम सुखदायी बाल-लीला से माता सुनयना व जनक जी को रिझाने वाली प्यारी सी मिथिला-कुमारी हम पर प्रसन्न हों।
छोटी सी जनकनंदिनी की जय !
#श्रीधरी_दीदी

20/04/2026
अक्षय तृतीया के परम पावन पर्व के उपलक्ष्य में श्री वृन्दावन धाम स्थित श्री बाँके बिहारी जी के चरण दर्शन। सभी भक्तों को इ...
19/04/2026

अक्षय तृतीया के परम पावन पर्व के उपलक्ष्य में श्री वृन्दावन धाम स्थित श्री बाँके बिहारी जी के चरण दर्शन। सभी भक्तों को इस पुनीत पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

बोलिये बाँके बिहारी लाल की जय।

नहिं बिसरत सखि छैल बिहारी ।
जित देखूँ तित वोही वोही दिखत,
हाय ! ये कैसी मोहिनी डारी।

बजत चरन छूम छननन नूपुर,
ताहू पर मुसकावति भारी।

अब 'कृपालु' मम लगत न पलकें,
देखि अनूपम रूप बिहारी ॥

#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

LIVE Now! Mar 27, 6:30 – 9:00 pm. Ram Navami Sadhana ShivirHappy Ram Navami!FREE LIVE SESSIONS:(25 - 29 March 2026)Sessi...
27/03/2026

LIVE Now! Mar 27, 6:30 – 9:00 pm. Ram Navami Sadhana Shivir

Happy Ram Navami!
FREE LIVE SESSIONS:
(25 - 29 March 2026)
Session (1): 4:00 – 6:00am.
Session (2): 8:00 – 11:00am.
Session (3): 1:30 – 4:15pm.
Session (4): 6:30 – 9:00 pm.
27 March: Ram Navami!
Radhe Radhe!

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 #जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_की_प्रचारिका  #सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_रामनवमी_के_पुनीत_पर्व_के_उपलक्ष्य_में_बधाई_सं...
27/03/2026

#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज_की_प्रचारिका #सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_रामनवमी_के_पुनीत_पर्व_के_उपलक्ष्य_में_बधाई_संदेश:-

आनंदकंद सच्चिदानंद श्रीरामचन्द्र चरणारविंद मकरंद मिलिंद महानुभाव !
आप सभी को भगवान श्री रामचन्द्र के दिव्य जन्मोत्सव की बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनायें।
हमारे शरणागत-वत्सल प्रभु ने जगत्कल्याण के लिए ही इस धराधाम पर अवतार लिया। अपने मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप में जगत्पावनी लीलायें करके त्रैलोक्य को पावन बनाया। वैसे तो भगवान अनंत गुणगणनिधान हैं, उनकी महिमा का कोई पार नहीं पा सकता, उनके गुणों की कोई थाह नहीं पा सकता ना शब्दों में कोई वर्णन हो सकता है।

लेकिन फिर भी अपने मलिन अंत:करणों को पावन करने के लिए ही आज हम प्रभु श्री राम की शरणागत वत्सलता की किन्चित् चर्चा करेंगे। उनके केवल एक दिव्य गुण का ही चिंतन करके ,उसपर दृढ़ विश्वास करके जीव भवसागर को पार कर सकता है ।

जब भगवान के शत्रु रावण का छोटा भाई विभीषण भी उनकी शरण में आया तो शरणागत-वत्सल प्रभु ने सुग्रीव इत्यादि के रोकने पर भी न केवल विभीषण को अपनी शरण प्रदान की अपितु उसी क्षण उसे लंकेश बना दिया । वाल्मीकि रामायण में यहाँ तक कहा –

आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया ।विभीषणो का सुग्रीव यदि का रावण: स्वयम् ।।

अरे ये तो विभीषण है स्वयं रावण भी मेरी शरण में आ जाये तो उसे भी मैं अभय प्रदान करूँगा ।
अपनी शरणागत वत्सलता का परिचय उन्होंने स्वयं ही अपने शब्दों में रामायण इत्यादि में दिया है वे कहते हैं –

जो नर होई चराचर द्रोही,आवै सभय सरन तकि मोहीं ।
तजि मद मोह कपट छल नाना ,करऊं सद्य तेहि साधु समाना ।। ( राम चरित मानस )

अर्थात् चाहे कोई कितना ही बड़ा अपराधी क्यों न हो लेकिन अगर मेरी शरण में आ जाता है तो मैं तत्क्षण उसे साधु बना देता हूँ । पुन: कहते हैं –

कोटि विप्र वध लागहिं जाहू ,आए सरन तजहुँ नहिं ताहू। ( राम चरित मानस )

अर्थात् घोर से घोर अपराधी भी मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसे लौटा नहीं सकता। यहाँ तक कि शरणागत भक्त उन्हें अपने प्राणों के समान प्रिय हैं।

जौं सभीत आवा सरनाई,रखिहहुँ ताहि प्रान की नाईं ।। ( राम चरित मानस )

जैसे एक माँ अपने शिशु की प्राणों के समान रक्षा करती है उसी प्रकार प्रभु अपने शरणागतों की रक्षा करते हैं ।
करहुँ सदा तिन्ह के रखवारी,जिमि बालक राखईं महतारी ।। ( राम चरित मानस )
शरणागत होने मात्र से अपनी अनंत कृपा का भंडार उस जीव के लिए खोल देने वाले प्रभु से बढ़कर उदार जगत में और कौन हो सकता हैं इसीलिए स्तुति करते हुए तुलसीदास जी विनय पत्रिका में कहते हैं –

ऐसो को उदार जग माहीं ।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं ।
प्रभु श्री राम इतने उदार हैं कि शरणागत की जाँति, पाँति, कुल, पात्रता, अपात्रता इत्यादि पर भी तनिक भी विचार नहीं करते इसीलिए तो कहीं मर्यादा पुरुषोत्तम होकर भी भीलनी के जूठे बेर खाकर विभोर होते हैं ,तो कहीं गीध को हृदय से लगाते हैं, स्वयं पुत्र के समान उनका श्राद् कर्म करते हैं, उन्हें अपना दिव्य धाम प्रदान करते हैं । श्री महाराज जी द्वारा रचित संकीर्तनों में भी हम उनकी महिमा गाते हैं –

जय जय राम, जय जय राम ।
जय जय राम, जय जय राम ।
दिये प्रेम, गीध, शबरिहुँ तुम राम ।
जूठे बेर खायशबरिहिं किय पूर्णकाम ।
किये श्राद् कर्म गीधहिं दिये निज धाम ।

अस्तु प्रभु श्री राम की शरणागत-वत्सलता पर, उनके इसी सनातन विरद पर विचार करके, दृढ़ विश्वास रखकर हमें केवल उनके शरणागत होने का प्रयास करना हैं । इसके लिए सारे छल कपट को फेंककर निर्मल हृदय से भोले शिशु के समान उनके लिए रुदन करना है-

मन क्रम वचन छाड़ि चतुराई ,
भजतहिं कृपा करहिं रघुराई ।। ( राम चरित मानस )

फिर उनकी कृपा प्राप्त करने में कोई देर नहीं हो सकती । इसीलिए आइये आज रोकर अपने रामलला से उसी अकारण कृपा की याचना करें –

राम राघव राम राघव राम राघव पाहिमाम्।
गीध को भी उर लगाया, कौन तुम सम राघव।
तुमने तारा वानरहूँ कहँ, हौं तो नर हौं राघव ।
शिला पर भी की कृपा अस को कृपालु राघव ।
एक दिन करिहौं कृपा यह हैं भरोसा राघव ।

श्री महाराज जी कहते हैं - हे प्रभु ! तुमने तो गीध पर, वानरों पर यहाँ तक कि शिला (अहिल्या) पर भी कृपा की है, तुम अकारण करुण हो इसीलिए मुझे यह दृढ़ विश्वास है कि एक दिन मुझ पर भी कृपा अवश्य करोगे । तुम्हारी इसी कृपा की बाट जोहता हुआ मैं तुम्हारा गुणगान करता रहूँगा ।

आज पीत झंगुलिया पहने, शिशु भूषण से युक्त, नन्हें नन्हें चरण उछालते हुए, किलकते हुए सांवले सलोने रामलला की कृपा दृष्टि हम सभी अधम जीवों को प्राप्त हो इसी शुभकामना के साथ;
आपकी दीदी:
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_प्रचारिका_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

https://youtube.com/shorts/s4p-D9Nm0Cw
03/03/2026

https://youtube.com/shorts/s4p-D9Nm0Cw

राधे राधे, आजु होरी है होरी है आजु होरी है…" रंग, उमंग और भक्ति से भरा यह राधा-कृष्ण होली भजन आपके दिल को झूमने पर मजबू....

02/03/2026

समस्त विश्व समुदाय को गौरांग महाप्रभु जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ।

चैतन्य महाप्रभु जी:
चेतोदर्पणमार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणम् श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू-जीवनम् । आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम् ॥१॥

अर्थात:- श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो जो हृदय में वर्षों से संचित मल का मार्जन करने वाला तथा बारम्बार जन्म-मृत्यु रूपी दावानल को शांत करने वाला है। भगवान श्री कृष्ण का नाम रूप लीला गुण धाम का चिंतन कीर्तन आदि मानव जीव के लिए परम कल्याणकारी है क्योंकि यह चन्द्र-किरणों की तरह शीतलता प्रदान करता है। समस्त अप्राकृत विद्या रूपी वधु का यही जीवन है। यह आनंद के सागर की वृद्धि करने वाला है और नित्य अमृत का आस्वादन कराने वाला है ॥१॥

नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥

अर्थात हे भगवन ! आपका मात्र नाम ही जीवों का सब प्रकार से मंगल करने वाला है- कृष्ण, गोविन्द जैसे आपके लाखों नाम हैं। आपने इन नामों में अपनी समस्त शक्तियां अर्पित कर दी हैं। इन नामों का स्मरण एवं कीर्तन करने में देश-काल आदि का कोई भी नियम नहीं है। प्रभु ! आपने अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यंत ही सरलता से भगवत-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में अब भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाया है ॥२॥

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥

अर्थात - स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष के समान सहनशील होकर, मिथ्या मान की कामना न करके दुसरो को सदैव मान देकर हमें सदा ही श्री हरिनाम कीर्तन विनम्र भाव से करना चाहिए ॥३॥

न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये। मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥

अर्थात - हे सर्व समर्थ जगदीश ! मुझे धन एकत्र करने की कोई कामना नहीं है, न मैं अनुयायियों, न सुन्दर स्त्री अथवा न प्रशंसनीय काव्यों का इक्छुक हूँ । मेरी तो एकमात्र यही कामना है कि जन्म-जन्मान्तर मैं आपकी अहैतुकी भक्ति कर सकूँ ॥४॥

अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ। कृपया तव पादपंकज-स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय॥५॥

अर्थात- हे नन्दतनुज ! मैं आपका नित्य दास हूँ किन्तु किसी कारणवश मैं जन्म-मृत्यु रूपी इस सागर में गिर पड़ा हूँ । कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूलि बनाकर मुझे इस विषम मृत्युसागर से मुक्त करिये ॥५॥

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा। पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥

अर्थात हे प्रभु ! आपका नाम कीर्तन करते हुए कब मेरे नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बहेगी, कब आपका नामोच्चारण मात्र से ही मेरा कंठ गद्गद होकर अवरुद्ध हो जायेगा और कब मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा ॥६॥

युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे॥७॥

अर्थात - हे गोविन्द ! आपके विरह में मुझे एक क्षण भी एक युग के बराबर प्रतीत हो रहा है । नेत्रों से मूसलाधार वर्षा के समान निरंतर अश्रु-प्रवाह हो रहा है तथा समस्त जगत एक शून्य के समान दिख रहा है ॥७॥

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्-मर्महतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्-तु स एव नापरः॥८॥

अर्थात - एकमात्र श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे ही सदैव बने रहेंगे, चाहे वे मेरा आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे आहत करें। वे नटखट कुछ भी क्यों न करें -वे सभी कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि वे मेरे नित्य आराध्य प्राणनाथ हैं ॥८॥ :- चैतन्य महाप्रभु जी

नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्!
गौरांग महाप्रभु ने अष्टपदी में कहा कि भगवान् ने अपने नाम में अपनी सारी शक्तियाँ भर दी हैं, सारी। सब शक्तियाँ। ये नहीं कि एक दो छिपा ली हैं कोई। तो नाम तो आपके पास है। जो आप लोग रोज लेते हैं यहाँ पर, जिसके लिए इतनी दूर से यहाँ पर आये हैं। तो भगवान् आपको मिल जायें तो वही बात, महापुरुष आपको मिल जाये, तो भी वही बात, उसका नाम मिल जाय तो वही बात, उसका गुण मिल जाये तो वही बात। सब बराबर हैं। फिर क्या फर्क हुआ ? हाँ जी। लेकिन भगवान् तो भगवान् ही है, नम्बर दो महापुरुष है, नम्बर तीन नाम है। ऐसा नहीं है। ये आपकी कमी है बुद्धि की। चूँकि आपने नाम को भगवान् के बराबर नहीं माना। इसलिये आपका अनुराग नहीं हो पा रहा है नाम में ।
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज

 #समस्त_साधक_बंधुओं_को_बसंत_पंचमी_की_हार्दिक_बधाई_एवं_शुभकामनाएँ।संत जन बारह मास बसंत।पिउ पिउ कहि कहि छिन छिन निशिदिन, क...
23/01/2026

#समस्त_साधक_बंधुओं_को_बसंत_पंचमी_की_हार्दिक_बधाई_एवं_शुभकामनाएँ।

संत जन बारह मास बसंत।
पिउ पिउ कहि कहि छिन छिन निशिदिन, कूकत कोकिल संत।
कबहुँक झरत दृगन अँसुवन जनु, झर तरु -पत्र अनंत।
कबहुँक झूमि झूमि मधुकर जनु, गुनगुनात गुन कंत।
कबहुँ प्रमत फूल सरसोँ जनु , फूलि फूलि हरषंत।
प्रेम बसंत ‘कृपालु’ नित्य रह, रस सरसंत न अंत।।

भावार्थ:- संत महात्माओं के पास बारहों महीने बसन्त का निवास रहता है । संत लोग बसन्तकालीन कोयल की कूक के समान अत्यन्त प्रेम भरी ध्वनि में निरन्तर ‘पिउ’ ‘पिउ’ ऐसा कहा करते हैं। संत लोग बसन्तकालीन पतझड़ के समान आँखों से निरन्तर प्रेमाश्रु गिराते रहते हैं। संत लोग बसन्तकालीन भौरों के समान गुनगुनाते हुए झूम-झूम कर प्रियतम श्यामसुन्दर के गुण गाते रहते हैं। संत लोग बसन्तकालीन फूली हुई सरसों के समान प्रियतम के प्रेम में प्रमत होकर आनन्दातिरेक से हृदय में फूले नहीं समाते। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं बसन्त काल तो दो महीने का ही होता है, किन्तु संतों का प्रेम-बसन्त तो नित्य रहता है, एवं प्रतिक्षण-वर्द्धमान-रस अनन्तकाल तक प्रदान करता है।
(प्रेम रस मदिरा: सिद्धान्त-माधुरी)
#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति,नई दिल्ली।

आप सभी को दिव्यातिदिव्य श्री कीर्ति मंदिर के सातवें वार्षिकोत्सव की हार्दिक बधाई व शुभकामनायेँ !
Celebrating the 7th Anniversary of Kirti Mandir.
Kirti Mandir was founded by Jagadguru Shri Kripau Ji Maharaj in Barsana, the birthplace of Shri Radha Rani. This divine temple is home to a unique deity of Baby Radha sitting on Mother Kirti's lap, and was inaugurated on the auspicious occasion of Basant Panchami in 2019.

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