10/05/2026
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_द्वारा_मदर्स_डे_के_उपलक्ष्य_में_भक्ति_संदेश :-
श्री राधा-चरण-चंचरीक भक्तवृंद !
आप सभी को मदर्स-डे (मातृ-दिवस) की हार्दिक बधाई व शुभकामनायें।
संसार में भी माँ का स्थान पिता से सौ गुना ऊँचा माना गया है –
‘पितु: शतगुणा माता पूज्या वंद्या गरीयसी’ (ब्रह्मवैवर्तपुराण 4/59/144)
अपनी संतान के प्रति जितना वात्सल्य, जितनी ममता माँ की होती है, जितना त्याग वो करती है उतना पिता नहीं कर सकते। यद्यपि दोनों ही अपनी संतान से प्रेम करते हैं लेकिन फिर भी माता का स्थान सर्वोच्च है, उसका वात्सल्य प्रेम अतुलनीय है।
अस्तु , इसी दृष्टि से माँ का सम्मान करने के लिए ,उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही ये पर्व (मदर्स-डे) मनाया जाता है।
लेकिन आध्यात्मिक पथ के पथिक आत्मकल्याण के लिए समस्त सांसारिक पर्वों को भी आध्यात्मिक दृष्टि से भक्ति-युक्त होकर ही मनाते हैं। समस्त वेदों-शास्त्रों के अनुसार हमारा वास्तविक स्वरूप आत्मा है। इसीलिए हमारे समस्त संबंध अपने अंशी भगवान श्री कृष्ण से ही हैं। उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण ने ही राधारानी के रूप में हमारी अकारण करुणामयी माँ का रूप धारण किया। वे ही हमारी सनातन माँ हैं।
हमारे परमपूज्य गुरुवर जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं-
प्रति जन्म नयी नयी मातु बनी बामा।
बदली न तेरी कभु साँची मातु श्यामा।। (श्यामा-श्याम-गीत)
अर्थात् सांसारिक माँ तो हर जन्म में बदलती रहती है, हम जिस-जिस योनि में गये कुत्ते, बिल्ली, गधे सब हमारी माँ बन चुके हैं, इनसे हमारा संबंध नित्य नहीं हैं, परिपूर्ण नहीं है हमारी वास्तविक माँ राधारानी ही हैं, जो सदा से हमारी माता हैं, वो कभी नहीं बदलती, न कभी हमें अकेला छोड़ती हैं, सदा हमारे साथ रहती हैं।
तू ही मेरी साँची महतारी, तूने कहा श्रुति महँ प्यारी ।
( जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज)
लेकिन हम ही कृतघ्नी हैं, कुपुत्र हैं जो अपनी सनातन माँ की ओर पीठ किये हुए हैं, उनसे विमुख हैं। इसीलिए माया का आधिपत्य है और अनादिकाल से हम अनंत प्रकार के दु:ख भोग रहे हैं।
अब इस अनादिकालीन बिगड़ी बात को बनाने के लिए, माया से छुटकारा पाने के लिए हमें उसी सनातन माँ की शरण में जाना होगा।
इसीलिए तो तुलसीदास जी ने भी माता सीता का दामन थामा और एक निरीह बालक की भाँति रोकर जगज्जननी से कृपा याचना करते हुए कहते हैं-
कबहुँक अम्ब अवसर पाइ
मोरिहूँ सुधि द्याइबी ,कछु करुण कथा चलाई ।
तो -
सुनत राम कृपालु के मो बिगरिबो बनि जाई।।
अर्थात् हे माँ ! कभी उचित अवसर जानकर प्रभु श्री राम के समक्ष आप ही मेरी करुण कथा सुना दीजिएगा जिससे उनकी कृपा-दृष्टि मुझे प्राप्त हो और मेरा काम बन जाए।
क्योंकि तुलसीदास जी जानते हैं कि माँ का हृदय पिता से अधिक कोमल होता है, उदार होता है इसलिए उन्हीं से सिफ़ारिश की याचना कर रहे हैं ।
श्री महाराज जी ने भी अपने कई संकीर्तनों में इसी प्रकार के भाव व्यक्त किये हैं –
सुने श्याम न ,तुम सुनु स्वामिनि राधे ।
(ब्रज रस माधुरी भाग-1)
अर्थात् हे राधारानी, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर को पुकारते-पुकारते मैं थक गया हूँ, वे तो मेरी पुकार नहीं सुनते लेकिन तुम तो सुन लो, तुम तो मेरी माँ हो, तुम अपने पुत्र से दूर भला कैसे रह सकती हो? उसकी पुकार को अनसुना कैसे कर सकती हो?
मुझे पूर्ण विश्वास है एक न एक दिन तुम अपने इस कुपुत्र को भी अवश्य अपनाओगी क्योंकि तुम तो साक्षात् कृपा की ही मूर्ति हो-
तेरी कृपा का भरोसा भारी राधारानी ।
तू तो कृपा की है मूरति राधारानी ।
तू तो कृपा ही कृपा करे राधारानी ।
तेरी कृपा का न ओर छोर राधारानी ।
(ब्रज रस माधुरी भाग-2)
यहाँ तक कि श्यामसुंदर भी किशोरी जू से कृपा प्राप्त करके ही जीवों पर कृपा करते हैं -
तेरी कृपा ते ही बनवारी, करें जीवों पर कृपा प्यारी
कृपा पर कृपा करें प्यारी, ऐसी कृपा पर वारी वारी
( ब्रज रस माधुरी - भाग 3)
अर्थात् साक्षात् कृपा शक्ति पर भी किशोरी जी कृपा करती हैं तभी वो कृपा कहलाती है।
राधारानी की ऐसी कृपा पर हम बारंबार बलिहार जाते हैं
पुन: श्री महाराज जी कहते हैं --
जापै टुक कृपा करे प्यारी, वाके पाछे डोले बनवारी।
जिसे किशोरी जी का कृपा -कटाक्ष प्राप्त हो जाए स्वयं श्यामसुंदर उस भक्त के पीछे-पीछे चलते हैं इसीलिए तो-
सुनि कृपा का विरद प्यारी, तेरे द्वार भीड़ भारी प्यारी
कोउ हो या ना हो अधिकारी, सब पर कृपा करें प्यारी।
(ब्रज रस माधुरी - भाग 3)
राधारानी के अधाधुंध दरबार में ही भक्तों की अधिक भीड़ होती है क्योंकि माता होने से वे अधिकारी, अनाधिकारी सभी पर मुक्त हस्त से कृपा लुटाती हैं। कृपा करने से तृप्त नहीं होतीं, खाते पीते सोते सर्वदा अपने पुत्रों पर कैसे कृपा करें? इसी चिंतन में डूबी रहती हैं।
अस्तु ,ऐसी अकारण-करुणामयी माता होने से ही उनका स्थान श्यामसुंदर से भी ऊँचा है। मातृस्वरूपा होने से जितनी क्षमा, दया, करुणा किशोरी जी के हृदय में है उतनी श्यामसुंदर के ह्रदय में नहीं हो सकती।
ऐसी वात्सल्यमयी माता की शरण में जाने से श्यामसुंदर की कृपा तो स्वयमेव प्राप्त हो जाती हैं।
तो आज उन्हीं राधारानी के चरणों की वंदना करने का, उनकी अनंत कृपाओं का स्मरण करके अश्रु बहाने का दिन है। निष्काम प्रेमयुक्त अश्रु समर्पित करके हम निरंतर उनका गुणगान करें तो एक दिन अवश्य ही उनकी कृपा के अधिकारी बन जायेंगें।
अत्यंत भोरी भारी, श्यामसुंदर की प्यारी, सुकुमारी, बरसाने वारी, वृषभानुदुलारी, कीर्तिकुमारी ,हमारी महतारी की वात्सल्य युक्त कृपा दृष्टि हम सभी अधम जीवों को प्राप्त हो इसी शुभकामना के साथ – आपकी दीदी:
#सुश्री_श्रीधरी_दीदी_प्रचारिका_जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज