07/12/2025
"नामदेव के नेतृत्व का तमाचा: पदकों ने विरोधियों की जुबान बंद कर दी !"
भारतीय ताइक्वांडो लंबे समय से कानूनी विवादों, संगठनात्मक टूट-फूट और आंतरिक राजनीति के कारण लगातार बाधित होता रहा है। लेकिन इस शोरगुल और भ्रम के बीच भारतीय खिलाड़ियों द्वारा अंडर 21 वर्ल्ड ताइक्वांडो प्रतियोगिता के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जीते गए पदकों ने न केवल इतिहास बदला, बल्कि उन लोगों की बोलती भी बंद कर दी है जो लगातार इंडिया ताइक्वांडो और इसके अध्यक्ष नामदेव शिरगांवकर को खेल का “बाहरी”, “अनुभवहीन” या “खिलाड़ी-विरोधी” साबित करने में जुटे थे। यह उपलब्धियाँ ऐसे समय में आई हैं जब विरोधी गुटों ने पिछले कई वर्षों से माहौल विषाक्त बनाने, खिलाड़ियों को भ्रमित करने और खेल को भीतर से कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
वर्ल्ड ताइक्वांडो और भारत सरकार द्वारा इंडिया ताइक्वांडो को दी गई आधिकारिक और वैधानिक मान्यता किसी भी चर्चा को समाप्त कर देने के लिए पर्याप्त थी, परन्तु इसके बावजूद समानांतर फेडरेशनों और उनके समर्थकों ने लगातार गलत सूचनाएँ फैलाकर यह तर्क दिया कि नामदेव शिरगांवकर का नेतृत्व खिलाड़ियों के हित में नहीं है। वे यह साबित करने पर तुल गए कि भारत का ताइक्वांडो किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों में है जो इस खेल को समझता ही नहीं। लेकिन विगत 3 वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आए इन ऐतिहासिक पदकों ने सिद्ध कर दिया है कि नेतृत्व की कसौटी अदालतों के आदेशों या सोशल मीडिया की बयानबाजी से नहीं, बल्कि परिणामों से होती है, और परिणाम दुनिया के सामने हैं।
लगभग पचास वर्षों से भारतीय ताइक्वांडो जिस पदकहीन दौर की पीड़ा झेलता रहा, उसे समाप्त करने का श्रेय आज उन खिलाड़ियों को जाता है जिन्होंने इंडिया ताइक्वांडो के बैनर तले एशिया से लेकर विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में तिरंगा फहराया। उसकी बराबरी का श्रेय उस नेतृत्व को भी दिया जाएगा जिसने तमाम विरोध, दुष्प्रचार और अवरोधों के बावजूद खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण, अवसर और संरचना उपलब्ध कराई।
दूसरी ओर उन संगठनों और व्यक्तियों की मंशा अब पूरी तरह उजागर हो चुकी है जो लगातार अदालतों, मंत्रालयों और कमेटियों की आड़ लेकर यह भ्रम फैलाते रहे कि इंडिया ताइक्वांडो अवैध है, अमान्य है या खिलाड़ियों के भविष्य को नष्ट कर रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि इन्हीं लोगों ने वर्षों तक खिलाड़ियों को वैश्विक मंच से दूर रखा, चयन प्रक्रियाओं को विवादों में फँसाया और ताइक्वांडो को एक ऐसे अंधकार में धकेला जहाँ प्रतिभाएँ गुम होती चली गईं। और आज जब भारतीय खिलाड़ी पहली बार इस स्तर पर पदक लेकर लौटे हैं, तो यह सफलता उन लोगों के लिए करारा तमाचा है जो राजनीति, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और भ्रम फैलाने के अलावा भारतीय ताइक्वांडो को कुछ नहीं दे सके।
यह समय सत्य और परिणामों के बीच चुनाव करने का है। एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने कभी भारत को विश्व ताइक्वांडो की मुख्यधारा से जोड़ने का साहस नहीं दिखाया, जो सिर्फ कुर्सियों की लड़ाई लड़ते रहे और खिलाड़ियों का उपयोग अपनी कानूनी रणनीतियों के मोहरे की तरह करते रहे। दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्होंने खिलाड़ियों को मौके दिए, उनके लिए रास्ते खोले और वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय मंच दिलाया। खिलाड़ियों द्वारा जीते गए ये पदक इसी चुनाव का निष्पक्ष और कठोर फैसला हैं।
भारतीय ताइक्वांडो समुदाय आज जिस दोराहे पर खड़ा है, वहाँ यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि भविष्य उन लोगों का होगा जो खेल को राजनीति से ऊपर रखेंगे। विरोधी गुटों द्वारा फैलाए गए भ्रम, झूठे दस्तावेज़, अनर्गल आरोप और लगातार की गई व्यवधानकारी गतिविधियाँ अब खिलाड़ियों की सफलता के सामने फीकी पड़ चुकी हैं। अब यह बहस की बात ही नहीं रह गई है कि कौन-सा नेतृत्व खिलाड़ियों को विश्व स्तर पर ले जा सकता है, क्योंकि इसके प्रमाण पदकों के रूप में मौजूद हैं।
कल आए ये पदक केवल चमकते हुए धातु के मेडल नहीं, बल्कि एक कठोर संदेश हैं। एक संदेश उन लोगों के लिए जिन्होंने भारतीय ताइक्वांडो को दशकों तक बंधक बना रखा था। एक संदेश कि खेल राजनीति से बड़ा है। खिलाड़ियों का पसीना अदालतों के आदेशों से ज्यादा पवित्र है। और सबसे महत्वपूर्ण, सफलता हमेशा वहाँ जाती है जहाँ नीयत साफ हो और दिशा सही।
भारतीय ताइक्वांडो का यह ऐतिहासिक क्षण सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि एक निर्णायक मोड़ है। यह तय करता है कि भारत इस खेल में आगे किस दिशा में जाएगा, उनके साथ जो वर्षों से केवल अवरोध पैदा कर रहे हैं, या उन लोगों के साथ जिन्होंने वास्तविक उपलब्धियाँ दी हैं और भारतीय खिलाड़ियों को दुनिया के सर्वोच्च मंचों पर पहुँचाया है। वर्तमान परिस्थितियाँ और उपलब्धियाँ स्पष्ट रूप से दूसरे विकल्प की ओर संकेत कर रही हैं।