16/05/2015
119th Constitutional Amendment Bill Passed:::::::::::::;;;;;
भारत और बांग्लादेश का साझा सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक इतिहास रहा है। बांग्लादेश उत्तर-पूर्व में स्थित भारत का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी राष्ट्र है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4096 किमी. लंबी सीमा है और भारत की सर्वाधिक अंतर्राष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से स्पर्श करती है। पांच भारतीय राज्यों (असम, प. बंगाल, मेघालय, मिजोरम एवं त्रिपुरा) की सीमाएं बांग्लादेश से मिलती हैं। इन दोनों देशों की सीमाओं पर भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लगभग 50000 से 100000 लोग अवैध रूप से निवास करते हैं जिसे चिटमहल (Chitmahal) या भारत-बांग्लादेश अंतःक्षेत्र (Enclave) कहा जाता है। विदेशी अंतःक्षेत्र (Enclove) किसी देश में भूमि के वे छोटे-छोटे टुकड़े हैं जिन्हें किसी अन्य देश द्वारा घेर लिया गया है तथा जिस पर एक छोटी जनसंख्या बसी हुई है। ये अंतःक्षेत्र वर्ष 1947 में ब्रिटिश शासन की समाप्ति के पश्चात भारत एवं पूर्वी पाकिस्तान तथा तद्नुसार वर्ष 1971 में भारत और बांग्लादेश को विरासत में तनाव के कारक के रूप में मिले थे। इन अंतःक्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों की दशा बहुत ही दयनीय है तथा ये राज्यविहीन नागरिक की स्थिति में हैं तथा सभी सरकारी आधारभूत सुविधाओं से वंचित हैं। इन अंतःक्षेत्रों की अदला-बदली करने एवं दोनों देशों की असीमांकित भू-सीमा का सीमांकन करने के लिए प्रथम प्रयास 16 मई, 1974 को भारत एवं बांग्लादेश सरकार द्वारा ‘भू-सीमा समझौता’ (Land Boundary Agreement-LBA) हस्ताक्षरित करके किया गया था। यद्यपि इस समझौते से संबंधित कानून बांग्लादेश में वर्ष 1974 में ही पारित किया जा चुका था। परंतु नागरिकता एवं क्षेत्रों के हस्तांतरण से संबंधित व्यापक मुद्दों के संतोषजनक समाधान के अभाव में यह समझौता प्रभाव में नहीं लाया जा सका था। इसी कड़ी के रूप में 6 सितंबर, 2011 को दोनों देशों द्वारा भू-सीमा समझौते पर प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए। इस प्रोटोकॉल को मनमोहन-शेख हसीना समझौता-2011 के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रोटोकॉल के जरिए अनसुलझे भूमि सीमा मुद्दों के समाधान के साथ-साथ विदेशी अंतःक्षेत्रों (Enclaves) तथा अनधिकृत भूमि (Adverse Possessions) को एक-दूसरे को हस्तांतरित करने का प्रावधान था। चूंकि भू-सीमा समझौता-1974 अथवा मनमोहन-शेख हसीना समझौता-2011 को क्रियान्वित करने के लिए भारतीय संविधान की धारा 368 के तहत संविधान में संशोधन करना आवश्यक था क्योंकि बिना संशोधन के देश की कोई भी जमीन किसी दूसरे देश को नहीं दी जा सकती। मई, 2015 में भारतीय संसद द्वारा 119वां संविधान संशोधन बिल-2013 पारित किया गया जिससे संबंधित प्रमुख तथ्य अग्रलिखित हैं-
यह विधेयक 7 मई, 2015 को लोक सभा द्वारा पारित किया गया।
जबकि इस विधेयक को 6 मई, 2015 को ही राज्य सभा द्वारा पारित किया जा चुका है।
विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति मिलने के बाद यह 100वां संविधान संशोधन-2015 के नाम से जाना जाएगा।
इस विधेयक का उद्देश्य भारत एवं बांग्लादेश के मध्य हुए 41 साल पुराने ‘भू-सीमा समझौता- LBA 1974 को प्रभाव में लाना है।
यह विधेयक भारतीय संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन करता है जो हमारे देश के राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की सीमाओं एवं क्षेत्रों को परिभाषित करता है।
इस विधेयक के तहत संविधान की पहली अनुसूची में असम, प. बंगाल, मेघालय एवं त्रिपुरा के प्रदेशों से संबंधित अनुच्छेदों में संशोधन किया गया है।
इस संशोधन द्वारा मुख्यतः भारत एवं बांग्लादेश के मध्य अनधिकृत भूमि एवं अंतः क्षेत्रों की अदला-बदली की जाएगी।
विधेयक के लागू होने पर जहां भारत को बांग्लादेश से 7110.02 एकड़ भूमि मिलेगी, वहीं बांग्लादेश को भारत से 17160.63 एकड़ भूमि मिलेगी।
बांग्लादेश में स्थापित 111 भारतीय अंतःक्षेत्र शिविरों को अब बांग्लादेश को सौंपा जाएगा तथा भारत के प. बंगाल, असम, त्रिपुरा एवं मेघालय में बसे 51 बांग्लादेशी अंतःक्षेत्र शिविरों को भारत को सौंपा जाएगा।
यह विधेयक अंतःक्षेत्र शिविरों की अदला-बदली द्वारा भारत एवं बांग्लादेश के मध्य एक नई मानक सीमा का निर्धारण करेगा।
दोनों देशों के मध्य एक लंबी मानक सीमा रेखा सुनिश्चित होने पर यहां अवैध प्रवास, तस्करी (मानव एवं सामान), गैर कानूनी कार्यों एवं आतंकवाद पर प्रतिबंध लगेगा।
इसके द्वारा उन राष्ट्रविहीन नागरिकों को संबंधित राष्ट्र की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी, जो अब तक किसी भी देश के नागरिक नहीं हैं तथा उन्हें अन्य आधारभूत नागरिक सुविधाएं जैसे पहचान पत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, बिजली आदि भी प्राप्त हो सकेंगी।
इसके तहत जनसंख्या की अदला-बदली नहीं होगी। यह यहां के लोगों की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वे कहां रहना चाहते हैं।
यह विधेयक देश के उत्तर-पूर्वी अल्पविकसित राज्यों तक सरकार की पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा तथा इन क्षेत्रों में विकासात्मक कार्य को भी बढ़ावा प्रदान करेगा।
भारत की उत्तर-पूर्व नीति के भाग के रूप में यह दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क बढ़ाने में भारत की मदद करेगा तथा इससे दक्षिण एशियाई क्षेत्र और वैश्विक स्तर पर यह संदेश जाएगा कि सीमा विवाद का हल शांतिपूर्वक निपटाया जा सकता है, उसी तरह, जैसे भारत एवं बांग्लादेश ने निपटाया है।