16/06/2021
इटली के ला स्पेज़िया प्रांत में, लगभग 20 हज़ार की आबादी वाला एक छोटा सा शहर है, सारज़ाना, इस शहर में एक प्रसिद्ध स्थान है, मिरो लुपेरी सामुदायिक स्टेडियम,यह स्थानीय टीम एसोसिएज़ियोन स्पोर्टिवा डिलेटेंटिस्टिका सरज़ाना का घर है,
जो रोसोनेरो (रेड एंड ब्लैक) के नाम से मशहूर टीम का अपना स्टेडियम है |
परंतु इसकी गाथा सिर्फ इतनी भर नहीं है हुआ यूं कि 1946 में ए.एस.डी सरज़ाना कैलसियो व शहर की जनता ने तय किया कि वह अपने सबसे बहादुर बेटों और बेटियों में से एक के नाम पर स्थानीय स्टेडियम का नाम रखेंगे, उस बेटे की याद और सम्मान में जो कभी मैदान पर बेहतरीन गोलकीपर और बाद में युद्ध के मैदान में फासीवाद के विरुद्ध बने प्रतिरोधी दस्ते के मुख्य नेता व योद्धा बन जनता के साथ खड़ा हुआ|
मिरो लुपेरी का जन्म 29 अप्रैल,1911 को सरज़ाना,ला स्पेज़िया में हुआ था,अपनी युवावस्था में उनका ए.एस.डी. के लिए निर्विवाद रूप से शुरुआती ग्यारह में मुख्य गोलकीपर के रूप में इतालवी फुटबॉल में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण व सफल सफर रहा। यहाँ तक सरज़ाना ने 1940-1941 में लिगुरिया फर्स्ट डिवीजन में भी भाग लिया|
केवल नियति ही रोसोनेरो(रेड एंड ब्लैक) और लुपेरी के उदय को रोकने में सक्षम थी,पहले से ही जर्जर हो चुके इतालवी समाज को मुसोलिनी और हिटलर के फासीवादी गठबंधन ने घोर फासीवादी अंधकार में डुबो दिया, और द्वितीय विश्व युद्ध के प्रकोप के कारण जो फासीवाद द्वारा मानवता पर थोपा गया था,1941-42 फुटबॉल चैंपियनशिप को निलंबित कर दिया गया |
एक इतालवी नागरिक के रूप में मिरो लुपेरी को सैन्य दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा करना था, इसलिए पहले मरीन कॉर्प्स में एक तुर्यवादक के रूप में और बाद में उन्हें स्थानीय प्रांत, स्पेज़िया की सेना के शस्त्रागार में एक अन्य कार्यकर्ता के रूप में काम पर रखा गया ।
लेकिन एक सच्चे व जुझारू जन खिलाड़ी को फासीवादी युद्ध में शामिल होना कहाँ मंजूर होता, मिरो ने महसूस किया कि यह युद्ध उसकी जगह नहीं है, और उन्होंने फासीवादी इटली और जर्मन गठबंधन वाली ताकतों की भयावहता का सामना करने का निर्णय लिया और छापामार प्रतिरोधी दस्ते में शामिल हो गए।
इतालवी कम्युनिस्ट पार्टी ने फासीवादी ताकतों के विरुद्ध , "गैरीबाल्डी असॉल्ट ब्रिगेड" को संगठित करने और बनाने का फैसला किया, जिसका उद्देश्य राजनीतिक-सैन्य कैडरों के निर्माण के माध्यम से इटली के प्रत्येक शहर और कस्बे में उपस्थिति और समर्थन प्राप्त करना था।
मिरो लुपेरी, गैरीबाल्डी ब्रिगेड का हिस्सा बने, विशेष रूप से "यूगो मुक्किनी डिटेचमेंट" में, कई संघर्षों में से एक में उनका मिशन था 20 अन्य लड़ाकों के साथ पहाड़ी इलाकों में एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण "मोंटे डी'निमो" को आजाद करवाना जो जर्मनों के चंगुल में था , परन्तु छापामार प्रतिरोधी दस्ते को चारों ओर से घेर लिया जाता है और फासीवादी सेना संख्या और हथियारों दोनों मामले में उनसे बहुत ज्यादा थी,हार के साथ-साथ सभी फासीवादी विरोधी लड़ाकों की मृत्यु निश्चित, लेकिन मिरो ने अपनी टुकड़ी के नेता के रूप में निर्णय ले लिया था, उन्होंने अपना जीवन देना पसंद किया और अपनी अंतिम सांस तक लड़े ताकि कि उनके अन्य साथी वहां से सुरक्षित निकल सके और फासीवादी विरोधी युद्ध को आगे जारी रखें , एक वीर छापामार योद्धा युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गया,यह व्यक्ति पूरी दुनिया में फासीवाद-विरोधी आंदोलन के लिए समर्पण का प्रतीक बन गया, और मरणोपरांत उन्हें वीरता के लिए स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।
उनकी ब्रिगेड, गैरीबाल्डी ब्रिगेड, प्रतिरोध की हरावल बन गई और मुक्ति का दिन भी आया, 25 अप्रैल, 1945 को मिरो लुपेरी जैसे अनेक लोगों की स्मृति के साथ-साथ स्वतंत्रता के झंडे लहरा रहे थे फासीवाद को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया गया था|
अगर मैल्कम एक्स के शब्दों में कहें तो "इतिहास आम लोगों की स्मृति है", हम सभी फासीवाद पूंजीवाद विरोधी अंतर्राष्ट्रीयवादी लोगों, जनपक्षधर खिलाड़ियों व युवाओं को मिरो और उन तमाम आम जनता की कुर्बानियों को कभी नहीं भूलना है जिसने अंधकार से मुक्ति दिलाई|
मौजूदा दौर में जब जनविरोधी फासीवादी उभार मानवता के सामने दोबारा उठ खड़ा हुआ है यह स्मृतियां और भी ज्यादा प्रासंगिक है|
Azad Sports Club, Shimla