25/05/2026
✨🐎 अश्व पालक और घुड़सवार की हकीकत 🐎✨
एक सच्चाई से जुड़ी संवादात्मक प्रस्तुति
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📞 फोन की घंटी बजती है…
🔔 ट्री… ट्री… ट्री…
👤 घुड़सवार —
“हैलो… बोलत बानी…”
👤 अश्व पालक —
“प्रणाम जी! सब कुशल मंगल?”
👤 घुड़सवार —
“जी प्रणाम! रउरा कहीं, का हाल बा?”
👤 अश्व पालक —
“सब ठीक बा। रउरा सुनाईं…”
कुछ देर इधर-उधर की बात होने के बाद…
👤 अश्व पालक —
“ई पूछे के रहल ह… कनी खाली बानी?”
👤 घुड़सवार —
“रउरा खातिर कबो खाली ना रहब का! बताईं…”
👤 अश्व पालक —
“हमरो घोड़वा पाँच दिन घूम लेत…”
👤 घुड़सवार —
“बस एतने बात! हम एक-दू दिन में आवत बानी…”
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🐴 अब शुरू होती है असली चर्चा…
👤 घुड़सवार —
“घोड़ा कैसन बा? केतना चलेला? कहाँ से आइल बा? आ चाल कवन बा?”
👤 अश्व पालक —
“घोड़ा बढ़िया बा। राजस्थान से खरीद के आइल बानी। एह खातिर त रउरा के बोलवनी कि जाँच हो जाए…”
👤 घुड़सवार —
“उमिर का बा? बच्चा बा कि जवान?”
👤 अश्व पालक —
“अभी त 18 महीना के बच्चा बा… लेकिन पैर निकाल देले बा… 25–28 तक चल लेत बा…”
👤 घुड़सवार —
“ठीक बा… सुननी ह कि रेस लड़े वाला घोड़ा ले आइल बानी…”
👤 अश्व पालक —
“बाकी सब रउरे देखी…”
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💰 फिर बात पहुँची मेहनताना पर…
👤 घुड़सवार —
“रेट-ऊरेट जानत बानी नू?”
👤 अश्व पालक —
“जवन सबके देत होई, ओहिसे हमू देब…”
👤 घुड़सवार —
“अब त 1000 चलत बा…”
👤 अश्व पालक —
“हम किसान आदमी हई… 500 दे सकत बानी…”
👤 घुड़सवार —
“500 वाला के बोलवा ली… हम 1000 से कम ना लेब…”
👤 अश्व पालक —
“त हमनी लेखा आदमी के घोड़ा ना फेराई…”
👤 घुड़सवार —
“ठीक बा… प्रणाम…”
📴 फोन कट जाता है…
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🌾🐎 अब सवाल उठता है…
क्या बात पैसे पर आकर रुक गई?
या घोड़े की चाल पर?
या फिर अश्व पालक की हैसियत पर?
असलियत शायद इन तीनों के बीच कहीं छिपी है…
एक तरफ मेहनत और अनुभव की कीमत है,
तो दूसरी तरफ किसान और अश्व प्रेमी की मजबूरी…
घोड़ा केवल जानवर नहीं होता,
वो पालक का सपना, मेहनत और सम्मान भी होता है।
और घुड़सवार के लिए उसकी कला और समय की कीमत…
दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे…
बस बीच में समझ और परिस्थिति हार गई…
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✍️🐎
अश्व प्रेमी कवि — सुधीर गहमरी 🙏🙏