Dr-Shadab Alam

Dr-Shadab Alam General physician

22/08/2024

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब है हाजिर भी
जो मंज़र है नाज़िर भी

08/07/2024

कश्तियाँ सबकी किनारे पे पहुँच जाती हैं
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
________

हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे
_____

कौन उठाएगा तुम्हारी ये जफ़ा मेरे बाद
याद आएगी बहुत मेरी वफ़ा मेरे बाद

______

तुमको आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझको ग़ुस्से पे प्यार आता है

_________

मुश्किल बहुत पड़ेगी बराबर की चोट है
आईना देखिएगा ज़रा देख-भाल के

________

हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी
क्यूँ तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी

________

ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम ‘अमीर’
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

________

गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है ‘अमीर’
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना

08/05/2024

कुछ लोग इतने कमीन , लालची और बेशर्म होते हैं कि वें मालों दौलत के सामने रिश्तों को कुचलने में ज़रा भी नही हिचकिचाते , बाकी वें ईमान का चोला बड़ी बेशर्मी के साथ ओढ़े भी रहते हैं ।

05/05/2024

Look cool , but
Play hot.........

27/03/2024

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ'तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है

जान कर सोता तुझे वो क़स्द-ए-पा-बोसी मिरा
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है

मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है

देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है

बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है

पहले घर पर नेमतख़ाना हुआ करता था जो मुख्तलिफ नामों से जाना जाता था जैसे नियामत खाना या गंजीना भी कहा जाता था।लकड़ी का, ज...
25/03/2024

पहले घर पर नेमतख़ाना हुआ करता था जो मुख्तलिफ नामों से जाना जाता था जैसे नियामत खाना या गंजीना भी कहा जाता था।

लकड़ी का, जाली लगा रहता था; दरवाज़े में ताला लगाने की जगह होती थी। बहुत ही नेमतें हुआ करती थी उसमें।

जब बचपन में घर पर कुछ भी ख़ास बनता था, तो अम्मी हम लोगों के एक तरफ़ा हमले से बचाने के लिए उसमें रख दिया करती थीं, और उसमे ताला लगा दिया जाता था।

पर अब तो ना ही नेमतख़ाना है। और ना ही उसके ताले को खुलवाने की जद्दोजेहद। कुछ हम बदल गए और कुछ कल्चर। रकाबी भी प्लेट हो गया ...

04/01/2023

ज़िन्दगी में कभी भी एक ही सांप आपको दो बार ना काटे इसका ध्यान रखना चाहिए।

15/12/2022

हमने भी कई आस्तीन के सांप पाल पोस कर बड़े किए हैं ।

Habiba
15/12/2022

Habiba

15/12/2022

Address

P. T. C Ambala Road Meghchhhapr Saharanpur
Saharanpur
247002

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Dr-Shadab Alam posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Dr-Shadab Alam:

Share