04/01/2026
अपने घर की हालत सुधारने निकली थी वो पहाड़ की बेटी,
कमजोर कहाँ थी वो...
वो तो शेरनी थी, हिमालय की तरह अटल और मजबूत। अपनी इज्जत, आन-बान और स्वाभिमान की रक्षा में
आखिरी सांस तक डटी रही,
लड़ी हर पल, झुकी नहीं, टूटी नहीं। न्याय आज नहीं तो कल जरूर मिलेगा,
क्योंकि सच्चाई की लौ कभी बुझती नहीं।
आवाज़ उठती रहेगी, गूंजती रहेगी पहाड़ों में,
खामोश कभी नहीं होगी ये पुकार। अंकिता सिर्फ एक नाम नहीं,
वो पहाड़ की हर बेटी की आवाज है,
हर उस लड़की की ताकत जो सपनों के लिए घर छोड़ती है।
वो लड़ी थी अकेले, अब हम सबकी बारी है—
पूरे सच का खुलासा कराने की,
सच्चा न्याय दिलाने की। तीन साल बीत गए, लेकिन जख्म अभी ताजा है,
वीआईपी के रहस्य अभी अनसुलझे हैं।
हम नहीं रुकेंगे, लड़ते रहेंगे,
जब तक हर दोषी को सजा नहीं मिलती।