03/06/2020
*सप्रे शाला दानी स्कूल के वृक्षों व मैदान की दास्तान*
(बेबाक कलम से काव्य रचना.....)
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भावना:- कौन लेगा सुध कटे वृक्षों की उनके जीव आपस में जो कह रहे वह मानवता के लिए कलंक है, समझे व लोगों को जागरूक करें..... सप्रे मैदान बचाने कदम बढ़ाने जुड़ें व जोड़ें....क्या कहते हैं कटे पड़े पेड़, व खुदे हुए मैदान देखिए भावनाएं.....🌴🌱🌾🌿🍃🍁🍂🌳
सनकी के सनक ने उजाड़ा चमन को,
थाम दिए चहचहाते पंछियों की चहक को ।
कसूर क्या था हमारा जो काट डाले हमारे जीवन उपवन को ।
थोड़ी भी दया, करुणा नहीं,पैसों के लोभी लालचियों को ।।
हमारा क्या कसूर था,
यही न के बच्चे बूढ़े जवान, महिला, लड़कियां सभी खेलते, योगा, वाकिंग करते थक कर मेरी छांव में बैठ जाते,
यही कसूर है न हमारा ....,
टिफिन रिसेस का टाइम होता स्कूल के बच्चे बच्चियाँ हमारे प्रेम आँचल तले होते,
तुमसे देखा न गया हमारी ममत्व को ।
उजाड़ दीया बच्चों की गोद को।।
क्या तुमने कभी हमारा आसरा न लिया होगा,
क्या कभी हमारे फूलों फलों का रस न लिया होगा,
क्या बीतती है जाकर पूछ लेना अपनी मइयां से ,
जब बच्चे हो जाएं दूर ममता की छइयां से ।
न समझ पाओ तो अपने बच्चे को कांधे पर उठा लेना,
हंसता खिलता खेलता देख तुम बाहीँयां फैला लेना ।।
नापाक कदम जो उठा लिए अब भी संभल जाना ।
दिल से माटी के कर्ज का मोल तुम चुका जाना ।।
जो खेलते बड़े हुए थे हमारी दरख्तों में,
खामोश हैं कुछ अब भी स्वारथ के नातों में,
आवाज़ बुलंद सब मिलकर कर हमारी खातिर कर डालो ।
हम वृक्षों की फरियाद अंधे बहरों के कानों तक पहुंचा डालो।।
हम तड़प रहे रो रहे अपने आधार से हटकर ।
क्या चुका पाओगे कर्ज, मिट्टी के मर्ज पर ।।
जो अब भी न तुम जाग पाओगे,
तो समझो इतिहास में क्या मुंह दिखाओगे।
मैं दानी सप्रे मैदान का वही अंश था,
जिसने देखा अंग्रेजों की हुकूमत का दंश था ।
आज़ादी के मतवाले इसी मैदान में आते थे,
देश की मान बढ़ाने कसरत करते योजना खूब बनाते थे ।।
मेरी ही ऊर्जा भूमि से खुला था छत्तीसगढ़ राज का द्वार,
क्या भुल गए प्रदेश के सभी नर नार ।
क्यों नहीं मुझे बचाने आते हो , क्या मतलब नहीं मुझसे या राजनेताओं के तलवे ही चाहते हो ।।
कह रहा बेबाक हमारा मन,
मैदान वृक्ष नहीं हम तो हैं तुम्हारे जीवन के अंग ,
जो अंग कट जाए उसकी पीड़ा को समझ लेना
न बचे हम तो तुम्हारे आने वाली पीढ़ी को खेल कहाँ मिलेगा यह तो समझ लेना ।
नहीं होगी फिर रौनक खेल उत्सव स्वस्थता व मौज मस्ती भी,
जो हम नहीं होंगे तो नहीं होगी शुद्ध हवाओं की बस्ती भी ।।
*यही निवेदन* करते हैं हम वृक्ष और मैदान,
बचालो सर्वजन मिलकर हमारा यह जहान,
सब मिलकर बचालो अब हमारा यह जहान ।।
*(ये दास्तान है सप्रे मैदान की दानी स्कूल रायपुर के वृक्ष व बगान की)*
बेबाक कलम से......