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10/06/2026

#हिमालय #गंगोत्री

27/05/2026

श्री विद्या में प्रथम आवरण (भूपुर / त्रैलोक्यमोहन चक्र) – विस्तृत जानकारी (तांत्रिक विधि से)
प्रथम आवरण श्री चक्र का सबसे बाहरी भाग है, जिसे भूपुर (भूमि का प्रसार) या त्रैलोक्यमोहन चक्र कहते हैं। यह तीन समानांतर रेखाओं (तीन दीवारें) वाला चौकोर (चतुरस्र) है। यह तीनों लोकों (भू, भुव, स्व) को मोहित करने वाली शक्ति का प्रतीक है। साधक की बाहरी माया, इंद्रियाँ और विकारों से रक्षा करता है तथा अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति देता है।
मुख्य तत्व:
- चक्र का नाम: त्रैलोक्यमोहन चक्र
- चक्रेश्वरी / अधिष्ठात्री देवी: त्रिपुरा चक्रेश्वरी (या त्रिपुरा)
- योगिनी: प्रकट योगिनी
- बीज मंत्र (आवरण का): ॐ अं आं सौः (Am Āṃ Sauḥ) — कुछ परंपराओं में Hsshoum आदि भी
- आवरण मुद्रा: सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा (Kshobha Mudra) — बीज: द्रां (Drāṃ)
- रंग: बाहरी रेखा — सफेद/स्वर्णिम, मध्य — लाल, आंतरिक — पीला/कृष्ण (परंपरा अनुसार)
- समय / रत्न: 24 मिनट (360 श्वास) / पुखराज (Topaz)
पूजा क्रम: नवावरण पूजा में बाहरी से अंदर की ओर। गुरु-दीक्षा प्राप्त साधक ही पूर्ण विधि करें। प्रत्येक देवी को गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। मुद्रा दिखाकर पूजा करें।
# # # १. तीन रेखाओं पर देवियों की विस्तृत सूची
भूपुर में तीन रेखाएँ हैं। देवियाँ दक्षिणावर्त (clockwise) क्रम में रखी जाती हैं। यंत्र चौकोर है जिसमें चार द्वार (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) होते हैं। देवियों के स्थान यंत्र की भुजाओं और कोनों पर हैं (चित्र में O1, M1 आदि से दिखाए जाते हैं)। सिद्धियाँ बाहरी रेखा पर कोनों/भुजाओं पर, मातृकाएँ मध्य रेखा पर आठ दिशाओं (NE, E, SE, S, SW, W, NW, N) में, मुद्रा देवियाँ आंतरिक रेखा पर समान रूप से।
प्रथम रेखा (बाहरी / outermost line) — १० सिद्धि देवियाँ
ये सिद्धियाँ (अणिमा आदि) साधक को अष्ट सिद्धियाँ + दो अतिरिक्त शक्तियाँ देती हैं। इनका तेज पिघले हुए सोने जैसा है। दाहिने हाथ में अंकुश, बाएँ में पाश।
1. अणिमा सिद्ध्यंबा (Anima Sidhyamba) — सूक्ष्म होने की शक्ति
2. लघिमा सिद्ध्यंबा (Laghima) — हल्का होने की शक्ति
3. महिमा सिद्ध्यंबा (Mahima) — विशाल होने की शक्ति
4. ईशित्व सिद्ध्यंबा (Ish*tva / Ishvita) — ईश्वरत्व की शक्ति
5. वशित्व सिद्ध्यंबा (Vash*tva) — वशीकरण की शक्ति
6. प्राकाम्य सिद्ध्यंबा (Prakamya) — इच्छा पूर्ति की शक्ति
7. भुक्ति सिद्ध्यंबा (Bhukti) — भोग की शक्ति
8. इच्छा सिद्ध्यंबा (Ichha) — इच्छा शक्ति
9. प्राप्ति सिद्ध्यंबा (Prapti) — प्राप्ति शक्ति
10. सर्वकाम सिद्ध्यंबा (Sarvakama Sidhyamba) — सभी कामनाओं की पूर्ति
मंत्र (समूह):
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अणिमाद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः
(खड्गमाला में व्यक्तिगत: अणिमा सिद्धये नमः, लघिमा सिद्धये नमः आदि)
द्वितीय रेखा (मध्य / middle line) — ८ मातृका देवियाँ
ये आठ दिशाओं की रक्षा करती हैं। पूर्ण आभूषणों से युक्त, विभिन्न आयुध धारण।
1. श्री ब्राह्मी मातृका
2. श्री माहेश्वरी मातृका
3. श्री कौमारी मातृका
4. श्री वैष्णवी मातृका
5. श्री वाराही मातृका
6. श्री महेन्द्री (इन्द्राणी) मातृका
7. श्री चामुण्डा मातृका
8. श्री महालक्ष्मी मातृका
मंत्र (समूह):
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्राह्म्याद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः
तृतीय रेखा (आंतरिक / innermost line) — १० मुद्रा देवियाँ (दश मुद्रा शक्तियाँ)
ये लाल रंग की हैं। मुद्राओं (हाथ की मुद्राओं) का शासन करती हैं।
1. सर्वसंक्षोभिणी देवी
2. सर्वविद्राविणी देवी
3. सर्वाकर्षिणी देवी
4. सर्ववशंकरि देवी
5. सर्वोन्मादिनी देवी
6. सर्वमहांकुशा देवी
7. सर्वखेचरी देवी
8. सर्वबीजा देवी
9. सर्वयोनि देवी
10. सर्वत्रिखण्डा देवी
मंत्र (समूह):
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिण्यादि दश मुद्रा देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः
चक्राग्रे / द्वार पर:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः
# # # २. मुद्राएँ (दश मुद्रा)
प्रथम आवरण की मुख्य मुद्रा सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा है। नवावरण पूजा में हर आवरण के बाद या संबंधित देवियों के साथ इन १० मुद्राओं का प्रदर्शन किया जाता है। ये हाथ की विशेष मुद्राएँ हैं जो शक्ति को जागृत करती हैं। प्रत्येक मुद्रा का बीज मंत्र भी है। (विस्तृत प्रदर्शन गुरु से सीखें; यहाँ संक्षिप्त वर्णन)
1. सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा (बीज: द्रां) — दोनों हाथों की तर्जनी और मध्यमा उंगली मिलाकर बाकी उंगलियाँ बंद। (सभी को हिलाने/उत्तेजित करने वाली)
2. सर्वविद्राविणी मुद्रा (बीज: द्रीं) — तर्जनी और मध्यमा मिलाकर बाकी बंद।
3. सर्वाकर्षिणी मुद्रा (बीज: क्लीं) — मध्यमा उंगलियाँ मिलाकर बाकी बंद।
4. सर्ववशंकरि मुद्रा (बीज: ब्लूं) — दोनों हाथों की उंगलियाँ मिलाकर बंद।
5. सर्वोन्मादिनी मुद्रा (बीज: सः) — अंगूठा, तर्जनी, मध्यमा, कनिष्ठिका ऊपर, अनामिका मिलाकर।
6. सर्वमहांकुशा मुद्रा (बीज: क्रों) — अंगूठा, तर्जनी, मध्यमा, कनिष्ठिका ऊपर, अनामिका ऊपर मुड़ी हुई।
7. सर्वखेचरी मुद्रा (बीज: ह्स्ख्फ्रें) — दाहिना हाथ बाएँ पर लपेटकर आकाश की ओर।
8. सर्वबीजा मुद्रा (बीज: ह्सौं) — दोनों हाथों की उंगलियों के सिरे मिलाकर वृत्त बनाना।
9. सर्वयोनि मुद्रा (बीज: ऐं) — कनिष्ठिका ऊपर, अनामिका दाहिने-बाएँ मिलाकर, मध्यमा और अंगूठा नीचे।
10. सर्वत्रिखण्डा मुद्रा (बीज: ह्स्रैं ह्रीं ह्स्रौं) — योनि मुद्रा जैसी लेकिन कनिष्ठिका नीचे, अंगूठा ऊपर।
ये मुद्राएँ पूजा में देवी को दिखाई जाती हैं और कुंडलिनी जागरण में सहायक हैं।
# # # ३. पूजा विधि (संक्षिप्त तांत्रिक रूप)
1. यंत्र को शुद्ध करें, गुरु मंत्र जपें।
2. चक्र को नाम से पूजें: ॐ त्रैलोक्यमोहन चक्राय नमः
3. तीन रेखाओं की देवियों को समूह मंत्र से पूजें (ऊपर दिए गए)।
4. प्रत्येक के बाद संबंधित मुद्रा दिखाएँ।
5. अंत में प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी को पूजें।
6. आरती, प्रणाम, तर्पण।
चेतावनी: यह अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली तांत्रिक विद्या है। बिना योग्य गुरु की दीक्षा के बगैर साधना ना करें
संबंधित पुस्तकें:
- श्रीविद्यार्णव तंत्र (नवावरण पूजा विधि)
- श्री चक्र नवावरण पूजा पद्धति
- खड्गमाला स्तोत्र की टीका
-
यह जानकारी पारंपरिक ग्रंथों (श्रीविद्यार्णव तंत्र, खड्गमाला, परशुराम कल्पसूत्र) और श्री विद्या परंपरा पर आधारित है।

23/05/2026

हिमालय की सुंदर दर्शन
Himalaya #

21/05/2026

तंत्र शास्त्र और वज्रयान दोनों ही परंपराओं में देवी तारा का स्थान अद्वितीय है। उन्हें 'तारिणी' कहा गया है, जिसका अर्थ है—वह जो संसार रूपी सागर से तार दे (पार लगा दे)।
वज्रयान बौद्ध धर्म में वे 'बुद्धों की माता' हैं, तो हिंदू श्री विद्या और दशमहाविद्या में उन्हें 'नील सरस्वती' या 'उग्रतारा' के रूप में पूजा जाता है।
# # 1. तारा के विभिन्न स्वरूप
साधना के दृष्टिकोण से तारा के मुख्य रूप इस प्रकार हैं:
*आर्य तारा (हरित तारा/Green Tara):** यह सबसे लोकप्रिय स्वरूप है। वे अभय मुद्रा में रहती हैं और सभी प्रकार के भयों (चोर, सर्प, अग्नि, अज्ञान आदि) से रक्षा करती हैं।
*श्वेत तारा (White Tara):** ये शांति, दीर्घायु और आरोग्य की अधिष्ठात्री हैं। इनके सात नेत्र (दो चेहरे पर, दो हाथों की हथेलियों में, दो पैरों के तलवों में और एक ललाट पर) करुणा का प्रतीक हैं।
*उग्र तारा (Blue Tara/Ekajati):** तांत्रिक साधना में इनका स्वरूप रौद्र है। ये शत्रुओं के नाश और तीव्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए जानी जाती हैं। श्री विद्या परंपरा में इनका घनिष्ठ संबंध है।
# # 2. तारा साधना का मुख्य मंत्र
साधना की धारा के अनुसार मंत्रों में भिन्नता होती है:
*बौद्ध मंत्र (General):** > ॐ तारे तुत्तारे तुरे स्वाहा
(Om Tare Tuttare Ture Svaha)
यह मंत्र मानसिक शांति और सभी बाधाओं के निवारण के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
*हिंदू तांत्रिक मंत्र (Eka-Jata/Ugra Tara):**
इन मंत्रों में 'स्त्रीं' (strīm) बीज का प्रयोग होता है, जिसे 'तारा बीज' कहा जाता है।
(नोट: तांत्रिक मंत्रों का जाप उचित दीक्षा और मार्गदर्शन के बिना नहीं करना चाहिए।)
# # 3. साधना की विधि और नियम
तारा साधना मुख्य रूप से 'वाक्' (वाणी) और 'सिद्धियों' से जुड़ी है। इसके कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित हैं:
*समय:** तांत्रिक तारा साधना के लिए 'निशीथ काल' (मध्यरात्रि) को श्रेष्ठ माना जाता है, जबकि सात्विक उपासना प्रातः काल की जा सकती है।
*आसन:** कुशा या ऊन का आसन।
*अक्षय फल:** कहा जाता है कि तारा की साधना करने वाले को 'वाक् सिद्धि' प्राप्त होती है, यानी उसकी वाणी सत्य होने लगती है।
*एकाग्रता:** साधक को अपने हृदय कमल या भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) में देवी के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
# # 4. तारा और श्री विद्या का संबंध
श्री विद्या की साधना में तारा को 'नील सरस्वती' कहा जाता है।
वे साधक को वह *'प्रज्ञा'** प्रदान करती हैं जो श्री चक्र के रहस्यमय अर्थों को समझने के लिए आवश्यक है।
* ललिता त्रिपुरसुंदरी की सेना में 'तारा' को वह शक्ति माना गया है जो साधक के अज्ञान रूपी शत्रुओं का संहार करती हैं।
# # 5. आध्यात्मिक लाभ
तारा साधना का मुख्य उद्देश्य केवल भौतिक इच्छाएं नहीं, बल्कि मोक्ष है:
1. भय से मुक्ति: यह मन के गहरे भय को समाप्त करती है।
2. तीव्र बुद्धि: ज्ञान और कला के क्षेत्र में सफलता।
3. करुणा का उदय: हृदय में समस्त जीवों के प्रति प्रेम भाव जागृत होना।
विशेष सुझाव: यदि आप तारा साधना को अकादमिक या शोध (Research) के उद्देश्य से देख रहे हैं, तो तिब्बती ग्रंथों और उत्तर-भारतीय 'तारापीठ' की परंपराओं का अध्ययन करना बहुत लाभप्रद रहता है। तांत्रिक साधनाओं के प्रयोगात्मक पक्ष के लिए किसी अनुभवी गुरु का सान्निध्य अनिवार्य है।
क्या आप तारा साधना के विशिष्ट तांत्रिक पहलुओं जैसे 'तारा कवच' या 'हृदय स्तोत्र' के बारे में जानकारी चाहते हैं?

21/05/2026

श्री विद्या में दो त्रिकोण (ऊर्ध्व त्रिकोण और अधो त्रिकोण) श्रीचक्र का मूल रहस्य दो त्रिकोणों पर आधारित है—ऊर्ध्व (उपर) त्रिकोण और अधो (नीचे) त्रिकोण। इन दोनों का मिलन ही “षट्कोण”, “कामकल्प वृक्ष” या “त्रिपुर सुन्दरि का मूल यंत्र रूप” माना जाता है।
नीचे इसका अर्थ सरल भाषा में समझें:
1. ऊर्ध्व त्रिकोण (▲) — शिव तत्व
यह त्रिकोण ऊपर की ओर संकेत करता है। यह दर्शाता है:
• शिव तत्व / पुरुष ऊर्जा
• ज्ञान (Jnana)
• उर्ध्वगामी चेतना
• सहस्रार की ओर उठने वाली शक्ति
• अग्नि (Fire)
ऊर्ध्व त्रिकोण का अर्थ है—चेतना का ऊपर उठना, स्थिरता, शून्यता, साक्षी भाव।
2. अधो त्रिकोण (▼) — शक्ति तत्व
यह त्रिकोण नीचे की ओर संकेत करता है। यह दर्शाता है:
• शक्ति / प्रकृति / स्त्री ऊर्जा
• इच्छा (Iccha)
• सृजन शक्ति (Creation)
• कुंडलिनी की आधार स्थिति
• जल (Water)
अधो त्रिकोण का अर्थ—सृजन, विस्तार, शक्ति का नीचे फैलना और जगत का प्रकट होना।
3. दोनों त्रिकोण का मिलन — शिव–शक्ति की ऐक्यता
जब ये दोनों त्रिकोण एक-दूसरे में समाहित होते हैं, तो बनता है:
✦ षट्कोण (Hexagram) — श्रीचक्र का मूल बीज रूप
इसका अर्थ:
• शिव और शक्ति का पूर्ण मिलन (युगल रूप)
• इच्छा–ज्ञान–क्रिया का संतुलन
• परम अद्वैत (Non-dual state)
• सृष्टि और समाधि दोनों का रहस्य
दो त्रिकोणों का मिलन ही “श्री विद्या का हृदय” है।
4. साधना में दो त्रिकोण का उपयोग
श्रीविद्या में साधना के तीन स्तर कहे जाते हैं:
(1) शक्ति साधना — अधो त्रिकोण
ऊर्जा जागरण, नाड़ी–चक्र शुद्धि।
(2) शिव साधना — ऊर्ध्व त्रिकोण
चेतना जागरण, ध्यान, शून्यता।
(3) सौन्दर्य लहरी — दोनों का मिलन
शिव–शक्ति का सामंजस्य → बिंदु की प्राप्ति।
5. बिंदु का जन्म
दोनों त्रिकोणों के मिलन का केंद्र बिंदु कहलाता है। यही बिंदु:
• श्रीचक्र का मूल
• त्रिपुर सुन्दरी का स्थान
• परम आत्मज्ञान का प्रतीक

15/05/2026

गंगोत्री में साधु संत

12/05/2026

#गंगोत्री Dham@peace of world

12/05/2026

मौन?

03/05/2026

श्री विद्या में प्रथम आवरण (भूपुर / त्रैलोक्यमोहन चक्र) – विस्तृत जानकारी (तांत्रिक विधि से)
प्रथम आवरण श्री चक्र का सबसे बाहरी भाग है, जिसे भूपुर (भूमि का प्रसार) या त्रैलोक्यमोहन चक्र कहते हैं। यह तीन समानांतर रेखाओं (तीन दीवारें) वाला चौकोर (चतुरस्र) है। यह तीनों लोकों (भू, भुव, स्व) को मोहित करने वाली शक्ति का प्रतीक है। साधक की बाहरी माया, इंद्रियाँ और विकारों से रक्षा करता है तथा अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति देता है।
मुख्य तत्व:
- चक्र का नाम: त्रैलोक्यमोहन चक्र
- चक्रेश्वरी / अधिष्ठात्री देवी: त्रिपुरा चक्रेश्वरी (या त्रिपुरा)
- योगिनी: प्रकट योगिनी
- बीज मंत्र (आवरण का): ॐ अं आं सौः (Am Āṃ Sauḥ) — कुछ परंपराओं में Hsshoum आदि भी
- आवरण मुद्रा: सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा (Kshobha Mudra) — बीज: द्रां (Drāṃ)
- रंग: बाहरी रेखा — सफेद/स्वर्णिम, मध्य — लाल, आंतरिक — पीला/कृष्ण (परंपरा अनुसार)
- समय / रत्न: 24 मिनट (360 श्वास) / पुखराज (Topaz)
पूजा क्रम: नवावरण पूजा में बाहरी से अंदर की ओर। गुरु-दीक्षा प्राप्त साधक ही पूर्ण विधि करें। प्रत्येक देवी को गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। मुद्रा दिखाकर पूजा करें।
# # # १. तीन रेखाओं पर देवियों की विस्तृत सूची
भूपुर में तीन रेखाएँ हैं। देवियाँ दक्षिणावर्त (clockwise) क्रम में रखी जाती हैं। यंत्र चौकोर है जिसमें चार द्वार (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) होते हैं। देवियों के स्थान यंत्र की भुजाओं और कोनों पर हैं (चित्र में O1, M1 आदि से दिखाए जाते हैं)। सिद्धियाँ बाहरी रेखा पर कोनों/भुजाओं पर, मातृकाएँ मध्य रेखा पर आठ दिशाओं (NE, E, SE, S, SW, W, NW, N) में, मुद्रा देवियाँ आंतरिक रेखा पर समान रूप से।
प्रथम रेखा (बाहरी / outermost line) — १० सिद्धि देवियाँ
ये सिद्धियाँ (अणिमा आदि) साधक को अष्ट सिद्धियाँ + दो अतिरिक्त शक्तियाँ देती हैं। इनका तेज पिघले हुए सोने जैसा है। दाहिने हाथ में अंकुश, बाएँ में �

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