27/05/2026
श्री विद्या में प्रथम आवरण (भूपुर / त्रैलोक्यमोहन चक्र) – विस्तृत जानकारी (तांत्रिक विधि से)
प्रथम आवरण श्री चक्र का सबसे बाहरी भाग है, जिसे भूपुर (भूमि का प्रसार) या त्रैलोक्यमोहन चक्र कहते हैं। यह तीन समानांतर रेखाओं (तीन दीवारें) वाला चौकोर (चतुरस्र) है। यह तीनों लोकों (भू, भुव, स्व) को मोहित करने वाली शक्ति का प्रतीक है। साधक की बाहरी माया, इंद्रियाँ और विकारों से रक्षा करता है तथा अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति देता है।
मुख्य तत्व:
- चक्र का नाम: त्रैलोक्यमोहन चक्र
- चक्रेश्वरी / अधिष्ठात्री देवी: त्रिपुरा चक्रेश्वरी (या त्रिपुरा)
- योगिनी: प्रकट योगिनी
- बीज मंत्र (आवरण का): ॐ अं आं सौः (Am Āṃ Sauḥ) — कुछ परंपराओं में Hsshoum आदि भी
- आवरण मुद्रा: सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा (Kshobha Mudra) — बीज: द्रां (Drāṃ)
- रंग: बाहरी रेखा — सफेद/स्वर्णिम, मध्य — लाल, आंतरिक — पीला/कृष्ण (परंपरा अनुसार)
- समय / रत्न: 24 मिनट (360 श्वास) / पुखराज (Topaz)
पूजा क्रम: नवावरण पूजा में बाहरी से अंदर की ओर। गुरु-दीक्षा प्राप्त साधक ही पूर्ण विधि करें। प्रत्येक देवी को गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। मुद्रा दिखाकर पूजा करें।
# # # १. तीन रेखाओं पर देवियों की विस्तृत सूची
भूपुर में तीन रेखाएँ हैं। देवियाँ दक्षिणावर्त (clockwise) क्रम में रखी जाती हैं। यंत्र चौकोर है जिसमें चार द्वार (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) होते हैं। देवियों के स्थान यंत्र की भुजाओं और कोनों पर हैं (चित्र में O1, M1 आदि से दिखाए जाते हैं)। सिद्धियाँ बाहरी रेखा पर कोनों/भुजाओं पर, मातृकाएँ मध्य रेखा पर आठ दिशाओं (NE, E, SE, S, SW, W, NW, N) में, मुद्रा देवियाँ आंतरिक रेखा पर समान रूप से।
प्रथम रेखा (बाहरी / outermost line) — १० सिद्धि देवियाँ
ये सिद्धियाँ (अणिमा आदि) साधक को अष्ट सिद्धियाँ + दो अतिरिक्त शक्तियाँ देती हैं। इनका तेज पिघले हुए सोने जैसा है। दाहिने हाथ में अंकुश, बाएँ में पाश।
1. अणिमा सिद्ध्यंबा (Anima Sidhyamba) — सूक्ष्म होने की शक्ति
2. लघिमा सिद्ध्यंबा (Laghima) — हल्का होने की शक्ति
3. महिमा सिद्ध्यंबा (Mahima) — विशाल होने की शक्ति
4. ईशित्व सिद्ध्यंबा (Ish*tva / Ishvita) — ईश्वरत्व की शक्ति
5. वशित्व सिद्ध्यंबा (Vash*tva) — वशीकरण की शक्ति
6. प्राकाम्य सिद्ध्यंबा (Prakamya) — इच्छा पूर्ति की शक्ति
7. भुक्ति सिद्ध्यंबा (Bhukti) — भोग की शक्ति
8. इच्छा सिद्ध्यंबा (Ichha) — इच्छा शक्ति
9. प्राप्ति सिद्ध्यंबा (Prapti) — प्राप्ति शक्ति
10. सर्वकाम सिद्ध्यंबा (Sarvakama Sidhyamba) — सभी कामनाओं की पूर्ति
मंत्र (समूह):
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अणिमाद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः
(खड्गमाला में व्यक्तिगत: अणिमा सिद्धये नमः, लघिमा सिद्धये नमः आदि)
द्वितीय रेखा (मध्य / middle line) — ८ मातृका देवियाँ
ये आठ दिशाओं की रक्षा करती हैं। पूर्ण आभूषणों से युक्त, विभिन्न आयुध धारण।
1. श्री ब्राह्मी मातृका
2. श्री माहेश्वरी मातृका
3. श्री कौमारी मातृका
4. श्री वैष्णवी मातृका
5. श्री वाराही मातृका
6. श्री महेन्द्री (इन्द्राणी) मातृका
7. श्री चामुण्डा मातृका
8. श्री महालक्ष्मी मातृका
मंत्र (समूह):
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ब्राह्म्याद्यष्ट देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः
तृतीय रेखा (आंतरिक / innermost line) — १० मुद्रा देवियाँ (दश मुद्रा शक्तियाँ)
ये लाल रंग की हैं। मुद्राओं (हाथ की मुद्राओं) का शासन करती हैं।
1. सर्वसंक्षोभिणी देवी
2. सर्वविद्राविणी देवी
3. सर्वाकर्षिणी देवी
4. सर्ववशंकरि देवी
5. सर्वोन्मादिनी देवी
6. सर्वमहांकुशा देवी
7. सर्वखेचरी देवी
8. सर्वबीजा देवी
9. सर्वयोनि देवी
10. सर्वत्रिखण्डा देवी
मंत्र (समूह):
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वसंक्षोभिण्यादि दश मुद्रा देवी श्री पादुकां पूजयामि नमः
चक्राग्रे / द्वार पर:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि नमः
# # # २. मुद्राएँ (दश मुद्रा)
प्रथम आवरण की मुख्य मुद्रा सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा है। नवावरण पूजा में हर आवरण के बाद या संबंधित देवियों के साथ इन १० मुद्राओं का प्रदर्शन किया जाता है। ये हाथ की विशेष मुद्राएँ हैं जो शक्ति को जागृत करती हैं। प्रत्येक मुद्रा का बीज मंत्र भी है। (विस्तृत प्रदर्शन गुरु से सीखें; यहाँ संक्षिप्त वर्णन)
1. सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा (बीज: द्रां) — दोनों हाथों की तर्जनी और मध्यमा उंगली मिलाकर बाकी उंगलियाँ बंद। (सभी को हिलाने/उत्तेजित करने वाली)
2. सर्वविद्राविणी मुद्रा (बीज: द्रीं) — तर्जनी और मध्यमा मिलाकर बाकी बंद।
3. सर्वाकर्षिणी मुद्रा (बीज: क्लीं) — मध्यमा उंगलियाँ मिलाकर बाकी बंद।
4. सर्ववशंकरि मुद्रा (बीज: ब्लूं) — दोनों हाथों की उंगलियाँ मिलाकर बंद।
5. सर्वोन्मादिनी मुद्रा (बीज: सः) — अंगूठा, तर्जनी, मध्यमा, कनिष्ठिका ऊपर, अनामिका मिलाकर।
6. सर्वमहांकुशा मुद्रा (बीज: क्रों) — अंगूठा, तर्जनी, मध्यमा, कनिष्ठिका ऊपर, अनामिका ऊपर मुड़ी हुई।
7. सर्वखेचरी मुद्रा (बीज: ह्स्ख्फ्रें) — दाहिना हाथ बाएँ पर लपेटकर आकाश की ओर।
8. सर्वबीजा मुद्रा (बीज: ह्सौं) — दोनों हाथों की उंगलियों के सिरे मिलाकर वृत्त बनाना।
9. सर्वयोनि मुद्रा (बीज: ऐं) — कनिष्ठिका ऊपर, अनामिका दाहिने-बाएँ मिलाकर, मध्यमा और अंगूठा नीचे।
10. सर्वत्रिखण्डा मुद्रा (बीज: ह्स्रैं ह्रीं ह्स्रौं) — योनि मुद्रा जैसी लेकिन कनिष्ठिका नीचे, अंगूठा ऊपर।
ये मुद्राएँ पूजा में देवी को दिखाई जाती हैं और कुंडलिनी जागरण में सहायक हैं।
# # # ३. पूजा विधि (संक्षिप्त तांत्रिक रूप)
1. यंत्र को शुद्ध करें, गुरु मंत्र जपें।
2. चक्र को नाम से पूजें: ॐ त्रैलोक्यमोहन चक्राय नमः
3. तीन रेखाओं की देवियों को समूह मंत्र से पूजें (ऊपर दिए गए)।
4. प्रत्येक के बाद संबंधित मुद्रा दिखाएँ।
5. अंत में प्रकट योगिनी त्रिपुरा चक्रेश्वरी को पूजें।
6. आरती, प्रणाम, तर्पण।
चेतावनी: यह अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली तांत्रिक विद्या है। बिना योग्य गुरु की दीक्षा के बगैर साधना ना करें
संबंधित पुस्तकें:
- श्रीविद्यार्णव तंत्र (नवावरण पूजा विधि)
- श्री चक्र नवावरण पूजा पद्धति
- खड्गमाला स्तोत्र की टीका
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यह जानकारी पारंपरिक ग्रंथों (श्रीविद्यार्णव तंत्र, खड्गमाला, परशुराम कल्पसूत्र) और श्री विद्या परंपरा पर आधारित है।