22/08/2025
पेंसिल और रबर
एक बार की बात है। एक छोटे से पेंसिल बॉक्स में पेंसिल और रबर रहते थे। दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।
हर दिन पेंसिल कॉपी पर कहानियाँ, कविताएँ और पाठ लिखा करती थी।
लेकिन कभी-कभी लिखते समय पेंसिल से गलती हो जाती। शब्द बिगड़ जाते, लाइन टेढ़ी हो जाती।
तब पेंसिल उदास हो जाती और कहती –
“ओह! मैंने फिर गलती कर दी।”
यह सुनकर रबर मुस्कुराता और प्यार से कहता –
“चिंता मत करो दोस्त, मैं हूँ न तुम्हारी मदद करने।”
फिर रबर धीरे-धीरे पेंसिल की गलती मिटा देता। पन्ना फिर से साफ हो जाता और पेंसिल दोबारा लिखना शुरू कर देती।
लेकिन हर बार गलती मिटाते-मिटाते रबर का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा घिस जाता। वह धीरे-धीरे छोटा होता चला गया।
एक दिन पेंसिल ने यह देखा और आँसू भर आई।
उसने रबर से कहा –
“मेरे प्यारे दोस्त, जब भी तुम मेरी मदद करते हो, तुम्हारा थोड़ा हिस्सा खो जाता है। मुझे बहुत अफ़सोस है। मैं तुम्हें दुख नहीं देना चाहता था।”
रबर ने मुस्कुराकर जवाब दिया –
“पेंसिल, माफ़ी मत मांगो। यही मेरा काम है—तुम्हारी गलतियाँ मिटाना। अगर मुझे खुद को थोड़ा खोना पड़े ताकि तुम्हारे शब्द सुंदर बन सकें, तो यह मुझे मंज़ूर है। दोस्ती का मतलब ही है एक-दूसरे का सहारा बनना।”
पेंसिल ने रबर को कसकर गले लगाया और कहा –
“अब मैं ध्यान से लिखूँगा, ताकि तुम्हें ज़्यादा मिटाना न पड़े। लेकिन मैं हमेशा तुम्हारे इस त्याग को याद रखूँगा।”
उस दिन के बाद पेंसिल ने बहुत सावधानी से लिखना शुरू कर दिया। फिर भी जब भी गलती होती, रबर वहीं मौजूद रहता—थोड़ा छोटा, मगर हमेशा मुस्कुराता हुआ।