09/11/2021
दिन बुधवार, 10 नवंबर 2021 को छठ पूजा मनाई जाएगी ।
यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व वह है जो कि सृष्टि की पूजा को प्रमुख मानता है, इसलिए इसे छठ पूजा कहते हैं ।
यह सूर्य की उपासना का त्यौहार है और यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है । यह बिहारियों का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। या यूं कह लें यही उनकी संस्कृति है व यही उनकी पहचान है।
सभी के कामनाओं की पूर्ति के लिए इस छठ त्यौहार को मनाया जाता है। यह वैदिक काल से चला आ रहा है इस कारण वैदिक आर्य संस्कृति की यह एक छोटी सी झलक दिखाता है । ऋग्वेद में सूर्य पूजन, उषा पूजन और प्रकृती पूज्न्व आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता है।
धीरे-धीरे यह पूजा पूरे विश्व में प्रचलित हो गया है और इस इस्लामिक लोग भी मनाते हुए देखे जा सकते हैं। क्योंकि छठ में कोई मूर्ति पूजा नहीं होती है। सूर्य देवता को छठ पूजा समर्पित है इसके अलावा उषा, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित है । इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन देने वाले सभी देवी देवताओं के लिए धन्यवाद करने का समय होता है।
इस त्यौहार के अनुष्ठान कठोर है और 4 दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान करना होता है, दिन भर का निर्जला उपवास रखना होता है । साथ ही लंबे समय तक पानी में खड़ा होना प्रसाद चढाना और अर्ध्य देना शामिल है। "परवातिन" नामक मुख्य उपासक आमतौर पर महिलाएं होती हैं । हालांकि बड़ी संख्या में पुरूष भी इस उत्सव का पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग विशेष त्यौहार नहीं है । छठ महापर्व को सभी स्त्री-पुरुष, बूढ़े व जवान मनाते हैं ।
यह पर्यावरण के अनुकूल हिंदू त्यौहार है । यह भैया दूज के तीसरे दिन से आरंभ होता है ।
पहले दिन सेंधा नमक, घी से बना हुआ चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है । अगले दिन से उपवास आरंभ होता है दिन भर शाम करीब 7:00 बजे से खीर बनाकर पूजा करने के उपरांत ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं ।
तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पण करते हैं ।
अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हैं।
इस पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है । लहसुन व प्याज वर्जित होता है । जिन घरों में पूजा होती है वहां भक्ति गीत गाए जाते हैं और अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद बांटा जाता है।
भारतवर्ष में सूर्योपासना ऋग्वेद काल से होती आ रही है। इसकी चर्चा विष्णु पुराण, भागवत पुराण व ब्रह्म पुराण में विस्तार से की गई है। सूर्य उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में मनाई जाती है। देवता के रूप में इनका उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक काल में मूर्ति का रूप ले लिया और पौराणिक देवता भी माना जाने लगा था ।
सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है । ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में इसका विशेष प्रभाव बताया है। संभवत यही कारण है कि सूर्य की विशेष उपासना की जाती है।
वस्तुतः, इन दिनों सूर्य थोडे कमजोर होते हैं इसीलिए ज्यादा से ज्यादा उनके समक्ष रहने का और पूजन करने का विधान होगा।
कहते हैं कि श्री कृष्ण भगवान के पोते को एक बार कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गई थी।
इसमें बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद का बहुत ही महत्व है। इसके केंद्र में किसान जीवन भी है और ग्रामीण जीवन भी है।
इस व्रत के लिए ना तो विशेष धन की जरूरत होती है, ना किसी पुरोहित की और ना ही गुरु के अभ्यर्थना की। नगरों के तालाब या नदी के किनारे की भी सफाई हो जाती है।
आप सभी को छठ पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।
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