साईकल प्योर अगरबत्ती

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वृश्चिक संक्रांति, यह दिन मंगलवार, 16 नवंबर को पड़ रहा है। किसी भी संक्रांति में सूर्य की पूजा होती है। जब सूर्य का एक रा...
15/11/2021

वृश्चिक संक्रांति, यह दिन मंगलवार, 16 नवंबर को पड़ रहा है। किसी भी संक्रांति में सूर्य की पूजा होती है। जब सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश होता है तो उसे संक्रांति कहते हैं।

क्योंकि सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश कर रहे हैं इसलिए इसे वृश्चिक संक्रांति कहा जाता है । सूर्य प्रत्येक राशि में 1 महीने तक रहते हैं और इसके बाद फिर दूसरी राशि आ जाते हैं। 12 राशियों में एक - एक महीने रहते हुए साल बीत जाता है।

संक्रांति को बहुत ही पवित्र दिनों में से एक माना जाता है इसलिए इसे हिंदू धर्म में पर्व भी कहा गया है।
मकर संक्रांति को तो भव्य रूप से मनाया ही जाता है वहीं अन्य संक्रांति पर भी सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है । इसमें स्नान दान का बहुत महत्व होता है ।

यह संक्रांति धार्मिक व्यक्तियों व कर्मचारियों, छात्रों व शिक्षकों के लिए बहुत शुभ मानी जाती है। वृश्चिक संक्रांति के विशिष्ट पूजा उपाय से धन से जुड़ी समस्याओं का निदान हो जाता है और छात्रों को परीक्षाओं में सफलता मिलती है । आज के दिन खान-पान की भी चीजें गरीबों को दान करते हैं । ब्राह्मण को गाय दान करने का भी खास महत्व है इस दिन ।

सुबह उठकर के पहले सूर्योदय में सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए । पानी में लाल चंदन मिलाकर तांबे के लोटे से सूर्य को जल चढ़ाएं इसके साथ ही लाल फूल, लाल चंदन व लाल सिंदूर इत्यादि भी चढ़ाने चाहिये।

ईश्वर आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें।

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प्रदोष व्रत माह में दो बार किया जाता है। एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को और दूसरा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को।माह नवंबर 2021 ...
14/11/2021

प्रदोष व्रत माह में दो बार किया जाता है। एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को और दूसरा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को।
माह नवंबर 2021 में कृष्ण पक्ष का प्रदोष व्रत मंगलवार 2 नवंबर को मनाया जा रहा है । इस व्रत को करने से मनुष्यों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

पूजन विधि -
इस दिन भगवान शिव की पूजा करते हैं।
शिव मूरत लें या फिर शिवलिंग की स्थापना करें।

सुबह स्नान इत्यादि से निवृत होकर, निकट के मंदिर जाएं या फिर घर पर ही शिव जी का अर्चन करें। व्रत करने का संकल्प लें। किस कारण यह व्रत करना है, यह मन में इच्छा रखें।
शाम को स्नान के बाद उत्तर या पूर्व दिशा में मुख करके पूजन करना चाहिए।
मूरत को दूध व जल से स्नान कराएं। फिर अक्षत व पुष्प चढ़ाएं।
मदार का पुष्प उत्तम रहेगा।
फिर भांग धतूरे का प्रसाद चढ़ाएं।
घी - कपूर से आरती करें।

सामग्री चढ़ाते समय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें।
फिर शिव चालीसा पढ़ें।
आरती करते समय, "कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेन्द्र हारम ।" मंत्र बोलें।

अगले दिन पारण करें।
महत्ता - हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्री शिव जी ही आत्मा हैं। हमारे जीवन का आधार हैं। जो भी कष्ट हमें आत्मा से दूर ले जाते हैं, भगवान शिव तुरन्त हमारे कष्टों को दूर करते हैं।

साईकल प्योर अगरबत्ती की तरफ से आप सभी को प्रदोष व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं !

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पंचांग के अनुसार, 14 नवंबर 2021, दिन रविवार को कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है ।इस एकादशी को " देवप्रबोधिनी ...
13/11/2021

पंचांग के अनुसार, 14 नवंबर 2021, दिन रविवार को कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है ।
इस एकादशी को " देवप्रबोधिनी एकादशी " या देवोत्थान एकादशी के नामों से भी जाना जाता है ।

यह एकादशी दीपावली के बाद आती है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं, इसीलिए इसे #देवोत्थान एकादशी कहा जाता है।

मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में 4 माह शयन के बाद जागते हैं। भगवान विष्णु के शयनकाल के चार मास में विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं, इसीलिए देवोत्थान एकादशी पर भगवान हरि के जागने के बाद शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू होते हैं। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है।

प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन और उनसे जागने का आह्वान किया जाता है। इस दिन होने वाले धार्मिक कर्म इस प्रकार हैं
• सुबह उठकर घर की साफ सफाई के बाद स्नान करके आंगन में भगवान विष्णु के चरणों की आकृति बनाना चाहिए।
• एक ओखली में गेरू से चित्र बनाकर फल, मिठाई, बेर, सिंघाड़े, ऋतुफल और गन्ना उस स्थान पर रखकर उसे डलिया से ढांक देना चाहिए। इस दिन रात्रि में घर के बाहर और पूजा स्थल पर दीये जलाना चाहिए।
• रात्रि के समय परिवार के सभी सदस्य को भगवान विष्णु समेत सभी देवी-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके बाद भगवान को शंख, घंटा-घड़ियाल आदि बजाकर उठाना चाहिए |

तुलसी विवाह का आयोजन
देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है। तुलसी के वृक्ष और शालिग्राम की यह शादी सामान्य विवाह की तरह पूरे धूमधाम से की जाती है। चूंकि तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं इसलिए देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान करना। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के कन्या नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें।

पौराणिक कथा आखिर क्यों सोते-जागते हैं श्री हरि?
एक बार भगवान विष्णु से उनकी प्रिया लक्ष्मी जी ने आग्रह भाव में कहा-हे प्रभु!आप दिन-रात जागते हैं लेकिन,जब आप सोते हैं तो फिर कई वर्षों के लिए सो जाते हैं। ऐसे में समस्त प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिए आप नियम से ही विश्राम किया कीजिए। आपके ऐसा करने से मुझे भी कुछ समय आराम मिलेगा। लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्कुराए और बोले-'देवी'। तुमने उचित कहा है। मेरे जागने से सभी देवों और खासकर तुम्हें मेरी सेवा में रहने के कारण विश्राम नहीं मिलता है। इसलिए आज से मैं हर वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और योगनिद्रा कहलाएगी जो मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी रहेगी। इस दौरान जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे, मैं उनके घर तुम्हारे सहित सदैव निवास करूंगा।
कहते हैं कि उस दिन से प्रभु वर्षा ऋतु में 4 महीने तक योगनिद्रा में रहते हैं।

आप सभी को देवप्रबोधिनी एकादशी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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श्री कृष्ण ने अपने अत्याचारी मामा कंस का वध कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को किया था । वर्ष 2021 में यह दिन 13 न...
12/11/2021

श्री कृष्ण ने अपने अत्याचारी मामा कंस का वध कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को किया था ।
वर्ष 2021 में यह दिन 13 नवम्बर को पड़ रहा है ।

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कंस एक चंद्रवंशी यादव राजा था जिसकी राजधानी मथुरा थी। वह भगवान कृष्ण की मां देवकी का भाई था। कंस के पिता का नाम उग्रसेन और माता का नाम रानी पद्मावती था।

कंस की प्रवृति राक्षसों जैसी थी । अपनी महत्वाकांक्षा के कारण, बाणासुर और नरकासुर की सलाह पर, कंस ने अपने पिता को अपदस्थ किया और मथुरा के राजा के रूप में खुद को स्थापित किया था । कंस ने मगध के राजा जरासन्ध की बेटियों अस्ति और प्राप्ति से विवाह करने का फैसला किया ।

उसके 9 बहनें व 5 भाई थे। वह सबसे बड़ा था। अपनी बहन देवकी से वह बहुत प्यार करता था। देवकी का विवाह अपने सामंत चंद्रवंशी क्षत्रिय वासुदेव के साथ तय कर दी।
विवाह के उपरान्त, कंस जब रथ मे बिठा कर देवकी को विदा कर रहे थे, उसी समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा।

इसपर कुपित होकर उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार मे डाल दिया। कंस ने देवकी के छः पुत्रों को मार डाला। सातवें को भगवान की लीला से वासुदेव की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित किया गया। उनको भी नन्द के यहाँ पहुंचाया गया था।
आठवें पुत्र को भी योगमाया की सहायता से भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण को गोकुल ले जाया गया, जहां उन्हें गोकुल के यादवकुल के मुखिया व वासुदेव के भाई नंद की देखभाल में पाला गया था ।

कंस को जब इन बातों की जानकारी हुई तब उसने कृष्ण को मारने के लिए कई राक्षसों को भेजा, जिनमें से सभी का कृष्ण द्वारा वध कर दिया गया।

कंस ने कृष्ण और बलराम को मारने के लिए छल से बुलावा भेजा । अंत में, श्री कृष्ण अक्रूर जी के साथ मथुरा पहुँचते हैं और अपने मामा कंस का वध करते हैं तथा अपने माता पिता को कारावास से मुक्त कराया था ।
कंस वध के बाद भी भगवान ने कई लीलाएं की जो जीवों को मोक्ष देने के लिए हितकारी हैं।

आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं।

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जगधात्री पूजा, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। जगाधत्री पूजा, 12 नवंबर 2021, दिन शुक्रवार को मना...
11/11/2021

जगधात्री पूजा, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। जगाधत्री पूजा, 12 नवंबर 2021, दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी ।

यह पूजा बंगाल में बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है ।
यह पूजा दुर्गा के भक्तों द्वारा मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है । चूंकि, दुर्गा मां को विश्व का रक्षक माना जाता है, इसीलिए इनका नाम जगधात्री कहा गया है ।

दुर्गा पूजा और काली पूजा के बाद, " जगधात्री पूजा " कोलकाता में एक प्रमुख प्रमुख हिंदू आयोजन है ।

शुभ मुहूर्त- यह पूजन नवमी तिथि को, 12 नवंबर 2021 को 5 बजकर 50 मिनट पर शुरू हो रही है और नवमी तिथि समाप्त हो रही है 5:30 पर 13 नवंबर 2021 को ।

यह त्यौहार रामकृष्ण मिशन आश्रम में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है ।

यह त्यौहार श्री रामकृष्ण की पत्नी देवी शारदा ने शुरू किया था जो कि लोकप्रिय स्थानीय मान्यता के अनुसार देवी जगधात्री की अवतार थीं । देवी जगधात्री को कारइंद्रासूरसुदिनी, माहेश्वरी, शक्तिचार्य और अध्रूता के नाम से जाना जाता है ।

आप सभी को जगधात्री पूजा की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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हिंदू धर्म में अक्षय नवमी का विशेष महत्व होता है। इसे आंवला नवमी भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के ...
11/11/2021

हिंदू धर्म में अक्षय नवमी का विशेष महत्व होता है। इसे आंवला नवमी भी कहा जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के नौवें दिन अक्षय नवमी मनाया जाता है।

आंवला नवमी 2021 शुभ मुहूर्त-
12 नवंबर 2021, दिन शुक्रवार को सुबह 06 बजकर 50 मिनट से दोपहर 12 बजकर 10 मिनट तक पूजन का शुभ मुहूर्त है।

शास्त्रों के अनुसार, अक्षय नवमी के दिन आंवला के वृक्ष की पूजा की जाती है। कहते हैं कि ऐसा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
नाम के अनुसार ही, इस दिन को प्राप्त किये गए पुण्यों का कभी भी क्षय नहीं होता ।

इस दिन दान-धर्म का अधिक महत्व होता है। मान्यता है कि इस दिन दान करने से उसका पुण्य वर्तमान के साथ अगले जन्म में भी मिलता है।

आप सभी को अक्षय नवमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मासिक दुर्गाष्टमी मनाई जा रही है ।यह 11 नवंबर 2021 को मनाई जाएगी ।हिंदू धर्म में ...
10/11/2021

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मासिक दुर्गाष्टमी मनाई जा रही है ।
यह 11 नवंबर 2021 को मनाई जाएगी ।

हिंदू धर्म में मासिक दुर्गा अष्टमी का बहुत महत्व है । लोग इस दिन व्रत रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा उपासना करते हैं । इस दिन ही मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था।

इस दिन माँ दुर्गा का व्रत - पूजन करने से मनुष्य के सभी कष्ट दूर होते हैं । हर तरह की सुख - समृद्धि व संपदा की प्राप्ति होती है । सभी मनोकामनाएं पूर्ण होते हैं।

साल में चैत माह से मार्गशीर्ष तक दुर्गा अष्टमी व्रत मनाया जाता है ।
इस दिन सबसे पहले स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा के स्थान पर गंगाजल डालकर उसकी शुद्धि कर लें। इसके पश्चात मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें ।

माता को सिंदूर व लाल पुष्प अर्पित करें । प्रसाद के रूप में फल और मिठाई चढ़ाएं । श्री दुर्गा चालीसा का पाठ करें । फिर माता की आरती करें।
देवी से प्रार्थना करें कि वह आपकी सभी इच्छाओं को पूरी करें।।

सभी साधकों को मासिक दुर्गा अष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिवस, 11 नवंबर को गोवर्धन पूजा दिवस के लगभग सात दिन बाद मथुरा और आस-पास के इलाकों में  #गोपाष्टम...
10/11/2021

कार्तिक शुक्ल अष्टमी के दिवस, 11 नवंबर को गोवर्धन पूजा दिवस के लगभग सात दिन बाद मथुरा और आस-पास के इलाकों में #गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाएगा | इस दिन विशिष्ट रूप से गायों में कामधेनु की पूजा के लिए समर्पित किया जाता है।

यह महाराष्ट्र और आसपास के राज्यों में एक लोकप्रिय त्योहार है जिस पर गाय की पूजा की जाती है। गो का मतलब गाय और गोपा का मतलब है जो गायों को ख़याल रखता है| गोपाष्टमी का उत्सव गोवत्सा द्वादशी के समान हैं।

गोपाष्टमी का महत्व गायों और बछड़ों की पूजा करने का है, जो कई राज्यों में हजारों परिवारों को जीवन प्रदान करते है और इसलिए भक्तजन गायों को देवी के अभिव्यक्ति के रूप में मानते हैं।

हिंदू पौराणिक कथाओं में, यह उल्लेख किया गया है कि हजारों देवताओं प्रत्येक गाय में वास करते हैं और गायों को दी जाने वाली पूजा सीधे उन देवताओं तक पहुंच जाएगी। ऐसा कहा जाता है कि गोपाष्टमी पर, भगवान कृष्ण, जिनकी गायों की ओर स्नेह असाधारण है, उन्हें भी पूजा जाता है।

गोपाष्टमी दिवस पर सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि गायों की पूजा है, जिन्हें पहले नहलाया जाता है, फूलों और मालाओं से पूजा जाता है और फिर उनके बछड़ों के साथ टीका किया जाता है।

सभी साधकों को गोपाष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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दिन बुधवार, 10 नवंबर 2021 को छठ पूजा मनाई जाएगी ।यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व वह...
09/11/2021

दिन बुधवार, 10 नवंबर 2021 को छठ पूजा मनाई जाएगी ।

यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व वह है जो कि सृष्टि की पूजा को प्रमुख मानता है, इसलिए इसे छठ पूजा कहते हैं ।

यह सूर्य की उपासना का त्यौहार है और यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है । यह बिहारियों का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। या यूं कह लें यही उनकी संस्कृति है व यही उनकी पहचान है।

सभी के कामनाओं की पूर्ति के लिए इस छठ त्यौहार को मनाया जाता है। यह वैदिक काल से चला आ रहा है इस कारण वैदिक आर्य संस्कृति की यह एक छोटी सी झलक दिखाता है । ऋग्वेद में सूर्य पूजन, उषा पूजन और प्रकृती पूज्न्व आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता है।
धीरे-धीरे यह पूजा पूरे विश्व में प्रचलित हो गया है और इस इस्लामिक लोग भी मनाते हुए देखे जा सकते हैं। क्योंकि छठ में कोई मूर्ति पूजा नहीं होती है। सूर्य देवता को छठ पूजा समर्पित है इसके अलावा उषा, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित है । इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन देने वाले सभी देवी देवताओं के लिए धन्यवाद करने का समय होता है।

इस त्यौहार के अनुष्ठान कठोर है और 4 दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान करना होता है, दिन भर का निर्जला उपवास रखना होता है । साथ ही लंबे समय तक पानी में खड़ा होना प्रसाद चढाना और अर्ध्य देना शामिल है। "परवातिन" नामक मुख्य उपासक आमतौर पर महिलाएं होती हैं । हालांकि बड़ी संख्या में पुरूष भी इस उत्सव का पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग विशेष त्यौहार नहीं है । छठ महापर्व को सभी स्त्री-पुरुष, बूढ़े व जवान मनाते हैं ।

यह पर्यावरण के अनुकूल हिंदू त्यौहार है । यह भैया दूज के तीसरे दिन से आरंभ होता है ।

पहले दिन सेंधा नमक, घी से बना हुआ चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है । अगले दिन से उपवास आरंभ होता है दिन भर शाम करीब 7:00 बजे से खीर बनाकर पूजा करने के उपरांत ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं ।

तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य अर्पण करते हैं ।
अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हैं।

इस पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है । लहसुन व प्याज वर्जित होता है । जिन घरों में पूजा होती है वहां भक्ति गीत गाए जाते हैं और अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद बांटा जाता है।

भारतवर्ष में सूर्योपासना ऋग्वेद काल से होती आ रही है। इसकी चर्चा विष्णु पुराण, भागवत पुराण व ब्रह्म पुराण में विस्तार से की गई है। सूर्य उपासना सभ्यता के विकास के साथ विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग रूप में मनाई जाती है। देवता के रूप में इनका उल्लेख मिलता है। उत्तर वैदिक काल में मूर्ति का रूप ले लिया और पौराणिक देवता भी माना जाने लगा था ।

सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है । ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में इसका विशेष प्रभाव बताया है। संभवत यही कारण है कि सूर्य की विशेष उपासना की जाती है।
वस्तुतः, इन दिनों सूर्य थोडे कमजोर होते हैं इसीलिए ज्यादा से ज्यादा उनके समक्ष रहने का और पूजन करने का विधान होगा।

कहते हैं कि श्री कृष्ण भगवान के पोते को एक बार कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष सूर्योपासना की गई थी।
इसमें बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद का बहुत ही महत्व है। इसके केंद्र में किसान जीवन भी है और ग्रामीण जीवन भी है।

इस व्रत के लिए ना तो विशेष धन की जरूरत होती है, ना किसी पुरोहित की और ना ही गुरु के अभ्यर्थना की। नगरों के तालाब या नदी के किनारे की भी सफाई हो जाती है।

आप सभी को छठ पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

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