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एक बार आजाद मैदान पर हमारी टीम का मैच चल रहा था ... हम फाईनल खेल रहे थे ... सामने वाली टीम ने टॉस जीता और बल्लेबाजी का न...
18/03/2024

एक बार आजाद मैदान पर हमारी टीम का मैच चल रहा था ... हम फाईनल खेल रहे थे ... सामने वाली टीम ने टॉस जीता और बल्लेबाजी का निर्णय लिया ... किसी भी टूर्नामेंट का फाईनल खेलने वाली दोनों टीमें अच्छी होती हैं इसमें तो कभी किसी को डाऊट नहीं होता है ... लेकिन फाईनल खेलने वाली दोनों टीमों को फाईनल के result को लेकर बहुत डाऊट रहता है ... और डाऊट प्रेशर क्रिएट करता है ... तो फाईनल का प्रेशर सामने वाली टीम पर साफ दिख रहा था ... उनके बल्लेबाज ओवरपिच्ड बॉल को भी डिफेंस कर रहे थे ... ख़ैर संभलकर खेलने के बावजूद उनकी टीम पूरे 45 ओवर नहीं खेल पायी और 196 रनों के मामूली स्कोर पर सिमट गयी ...

मेरी टीम का मैं ओपनर था ... तो लंच के बाद बैटिंग के लिए गया ... हवा चलते हुए मैदान पर, स्लो - सपाट विकेट पर शुरू के 2 ओवर तक मैं भी थोड़ा संभल कर खेल रहा था क्योंकि दिमाग में सामने वाली टीम के बिखरने का खौफ़नाक मंजर लूप-मोड में चल रहा था ...

लेकिन 3 ओवर वॉचफुली खेलने के बाद मुझे लगने लगा कि पिच से कुछ हो तो नही रहा है ... और हवा में बॉल की स्विंग तब तक ख़त्म नहीं होगी , जब तक मारेंगे नहीं ... इसलिए 4th ओवर से मैंनें पराक्रमी बल्लेबाजी शुरू कर दी ... और एक ही ओवर में 4 चौके टनाटन ठोक दिये ... जहाँ 3 ओवर में स्कोर था 9 रन ... तो वहीं 4th ओवर की समाप्ती पर था 26 रन ...

एक ओवर में मारे गये 4 चौकों ने ऐसा कॉन्फिडेंस बढ़ा दिया कि अब जो आये उसी की पड़े ... Minimum दो चौका तो हर बॉलर को ... आनन-फानन में पूरी टीम 9 ओवर खत्म होते - होते 96 रनों पर थी ... हम बस 100 रन दूर थे फाईनल जीतने से ... 33-34 ओवर बचे थे, 10 के 10 विकेट हाथ में ... मैं ख़ुद 73 रनों पर बल्लेबाजी कर रहा था , कॉन्फीडेंट था ... तो मुझे लग रहा था कि अब यहाँ से हमारी टीम हार नहीं सकती ...

लेकिन कॉन्फिडेंस कब ओवर-कॉन्फिडेंस में बदला पता नहीं ... सामने वाली टीम ने 10वें ओवर में स्पिन अटैक इंट्रोड्यूस किया ... मेरे पार्टनर ने मुझे बोला भी कि पहले ही बॉल से मत अटैक करना , बॉलिंग चेंज है थोड़ा देख ले 2-4 गेंद शुरू के ... पर हवा के घोड़े पर सवार मैं , बस हाँ-हाँ कह के स्ट्राईक ऐंड की तरफ आ गया ... और अपने साथी खिलाड़ी की सलाह को इग्नोर करते हुए पहली ही बॉल को स्टेप-आऊट कर के मिड-ऑफ के ऊपर से मारा ... बॉल चौका तो चला गया ... लेकिन मैं लगभग कैच-आऊट होते होते बचा ... ओवर -कॉन्फिडेंस को और हवा मिल गयी ... मैं अगली बॉल पे फिर स्टेप आऊट हुआ ... बॉल मेरे थाईस से छुती हुई विकेटकीपर के दस्तानों में गयी और उसने पलक झपकते ही गिल्ली उड़ा दी ... ये स्टम्पिंग 1996 के सचिन के सेमीफाइनल में आऊट होने वाली स्टम्पिंग जैसी ही थी ...

मैं पिच पर से वापस पवेलियन लौट रहा था ... और पहला खयाल जो तब मन में आया वो ये था कि चलो ठीक है ... 96 रन ही बनाने है, 9विकेट हैं, 34 ओवर्स हैं जीत जायेंगे ... लेकिन फिर 10 कदम बढ़ने पर दूसरा खयाल आया, बिल्कुल छोटा सा ... फाईनल है बना लेंगें ना हम ? .... इस एक डाऊट को लेकर मैं पवेलियन में बैठा ... और ये डाऊट हर ओवर में बढ़ने लगा ... क्योंकि हर ओवर में हमारी टीम का कम से कम एक विकेट तो जा ही रहा था... तो बहोत संघर्ष के बाद हमारी टीम 25 ओवर में 125 रन बना कर ऑल-ऑउट हो गई ...

पूरी रात नींद नहीं आयी ... अगले दिन सुबह कोच ने पूरी टीम को लाईन में खड़ा कर के गालीयाँ दी ... और मुझे तो सबसे ज़्यादा नंगा किया ... उनकी गालियों में एक गजब की सीख थी ... वो हर 10 गालियों से भरी लाइन के बाद एक बात रीपीट कर रहे थे - 'ऐसा मैच अकेला टीम को जिताने का, बेहन**** ... गाँ*** अकेला। किसी पे छोड़ने का नहीं । तेरे बैट में बॉल लग रही थी , तो अकेला लेके जाने का था ना चुति*** '

उस दिन मुझे समझ आया कि आप अगर ख़ुद का रन बनाते हो तो वो भी पहले आपके टीम के ही काम आती है ... इसलिए संभलकर खेलने में, सेल्फिश खेलने में, अपना रन बनाने में और टीम को आप ही जिताओ ऐसी सोच रखने में कोई बुराई नहीं है ...

मुझे लगता है DC की प्लेयर शफाली वर्मा को भी कल सेल्फिश ही खेलना चाहिए था ... उनके बैट में बॉल बांकी प्लेयर के मुकाबले सबसे ज़्यादा अच्छे से लग रही थी ... उन्हें बहादुरी नहीं दिखानी चाहिए थी ... ब्रेक के बाद पहले ही बॉल को सिक्स मारने नहीं जाना चाहिए था ... वो अगर केलकुलेट कर के खेलतीं , संभल कर खेलतीं, ज़िम्मेदारी लेकर खेलतीं तो शायद फाईनल मैच का परिणाम कुछ और होता ... और शायद जीत DC Women टीम की ही होती ...

शफाली वर्मा ने जो भूल कल की वही सेम टू सेम भूल रोहित शर्मा ने वर्ल्डकप के फाईनल में की थी ... उन्होनें ऑस्ट्रेलियाई बॉलरों को मार कर ऑलमोस्ट बर्बाद कर दिया था ... लेकिन सेल्फलेस खेलने के चक्कर में वो आऊट हुए ... और उनकी विश्वकप जीतना deserve करने वाली टीम रनरअप बनकर रह गयी ...

मैच जीतते-जीतते मिली हार आपको हताश करती है ... मुझे लगता है शेफाली वर्मा अगले कुछ महीने ठीक से शायद सो नहीं पायेंगी ... जैसे, रोहित शर्मा ने वर्ल्डकप के बाद एक इंटरव्यू में कबूल किया था कि वो ठीक से सो नहीं पा रहे हैं ... क्योंकि, वर्ल्डकप में मिली हार को वो स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं ... शायद वो ख़ुद को हार का ज़िम्मेदार मानते हों ...

इस सदमा में कचोट भरा हुआ है ... और वो कचोट रोहित के व्यवहार में भी झलकने लगा है ... रोहित शर्मा ने शतक ठोकने के बावजूद आसमान में बल्ला लहराना छोड़ दिया है ... 😔😔😓😔😓😔

: रविशेख

28/02/2024

'Build to crash' वाली कहावत तो आप सब ने सुनी ही होगी ... कभी-कभी मीडिया किसी आदमी को इतना बढ़ा चढ़ा कर पेश करती है कि अगर वो सफल हुआ तो भी कहने को एक ख़बर बनेगी ... और अगर नहीं सफल हुआ तो कम से कम उसे रौंदने के लिए तो एक टॉपिक उनके पास तो ज़रूर होगी ही ...

मुझे लगता है क्रिकेटर सरफ़राज़ ख़ान के बारे में मिडीया ने जो कुछ भी बढ़ चढ़ कर बोला है वो इसी प्लान का हिस्सा था ... मीडिया ने उनके खेल के बारे में इतना बढ़-चढ़ कर बोला कि उन्हें क्रिकेट का दूसरा ब्रेडमैंन तक कह दिया ... और इस बढ़ चढ़ कर की गई तारीफ का नतीजा ये हुआ है कि सरफ़राज़ सिर्फ दो इनिंग में फेल हुए हैं ... और उसी मीडिया की तरफ से ये सुनने को मिला रहा है कि सरफ़राज़ से बेकार खिलाड़ी आजतक कभी कोई हुआ ही नहीं ...

किसी भी खिलाड़ी को इतनी ज़ल्दी आसमान पर चढ़ा देना ... और उसे फिर वहाँ से सीधे ज़मीन पर पटक देना ... ये किसी भी खेल और खिलाड़ी दोनों के लिए बेहद ख़तरनाक है ... क्योंकि सरफ़राज़ के पहले भी भारतीय टीम में कई खिलाड़ीयों का चयन हुआ है ... उन्होंने भी ख़राब खेल का प्रदर्शन किया है ... लेकिन ख़राब खेलने के बावजूद उनको मौके पे मौका मिलता रहा है ...

तो BCCI को चाहिए कि जिस तरह मीडिया के दबाव में आ कर उन्होंने सरफ़राज़ का चयन टीम में कर लिया था ... ठीक वैसे ही मीडिया के दबाव में आकर वो उन्हें टीम से बाहर ना कर दें ... क्योंकि जब किसी को मौका दिया है ... तो उसे इतने मौके तो ज़रूर मिलने चाहिए कि वो ख़ुद की प्रतिभा को साबित कर सके ...

और जहाँ तक बात है ब्रेडमैंन की तो मेरी क्रिकेट की समझ कहती है कि सिर्फ आंकड़े ही सबकुछ नहीं होते हैं ... कौन कितना खेला , किसके खिलाफ खेला , कैसी कंडीशन में खेला ये सब भी बहुत मायने रखता है ... ब्रेडमैंन का पाला कभी रीवर्स-स्वींग से नहीं पड़ा था ... ब्रेडमैंन ने कभी भारतीय उपमहाद्वीप के पिचेस पर 90° की टर्न लेने वाली गेंदों का सामना नहीं किया था ... गुगली भले देखी हो लेकिन सकलैन मुश्ताक, भज्जी और मुथैया मुरलीधरन जैसा रिस्ट घुमा कर फेंका गया ऑफ स्पीनर नहीं देखा था ... जो ऑफ स्पिन के साथ -साथ 'दूसरा' भी घुमा देते थे ... इसीलिए मैं सचिन तेंदुलकर को दुनियाँ का 'ना भूतो, ना भविष्यतो' वाला बेट्समैंन मानता हूँ ... क्योंकि सचिन ने अपने पूरे करियर में इन गेंदबाजों की जमकर पिटाई की है ... और आंकड़े भी कमोबेस शानदार रहे हैं ...

तो मुझे लगता है सरफ़राज़ को अगर किसी के जैसा बनना ही है तो सचिन ही बने, ब्रेडमैंन नहीं ... और तबतक ख़ुद पर गर्व महसूस ना करें जबतक लोग उनकी तुलना सचिन से ना करने लगे .... इसलिए उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया की उलूल -जुलूल तुलनाओं से दूर रहना चाहिए ... और सिर्फ अपने क्रिकेट पे ध्यान देना चाहिए ... क्योंकि एक दो ख़राब पारीयाँ उनके क्रिकेट का भविष्य तय नहीं कर सकती हैं ...

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