12/01/2024
*मोक्ष की प्रतीक्षा या प्रयास की आवश्यकता*
मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक की यात्रा को संस्कृत में संसार कहते हैं,जिसका अर्थ है, जन्म-मरण का चक्र। इस चक्र से गुजरती हुई सारी सृष्टी ही कभी न कभी मोक्ष को प्राप्त करेंगी। ऐसा हमारे ऋषि मुनियों का मत।
अब प्रश्न हो सकता हैं कि जब सबको मोक्ष प्राप्ति होगी ही, तब प्रयास' की क्या आवश्यकता है ? जब सब लोग मुक्त हो ही जाएँगे, तो क्यों न हम चुपचाप बैठकर इसकी प्रतीक्षा करें ?
इतना तो सत्य अवश्य है कि कभी न कभी सभी जीव मुक्त हो जाएंगे, कोई नहीं रह जाएगा। किसी का भी विनाश नहीं होगा, सब का उद्धार हो जाएगा।
अगर ऐसा हो, तो प्रयत्न से क्या लाभ ?
पहली बात तो यह है कि प्रयत्न से ही हम मौलिक केन्द्र पर पहुँच पाएँगे; दूसरी बात यह है कि हम स्वयं नहीं जानते कि हम प्रयत्न क्यों करते हैं। हमें प्रयत्न करते रहना है, बस।
'करोड़ों लोगों में कुछ ही लोग यह जानते हैं कि वे मुक्त हो जाएंगे।' संसार के असंख्य लोग अपने भौतिक कलापों से ही सन्तुष्ट हैं। पर कुछ ऐसे लोग भी अवश्य मिलेंगे, जो जाग्रत है और जो संसार-चक्र से ऊब गये हैं। वे अपनी मौलिक साम्यावस्था में पहुँचना चाहते हैं।
ऐसे विशिष्ट लोग जान-बूझकर मुक्ति के लिए प्रयत्न करते हैं, जब कि आम लोग अनजाने ही उसमें रत रहते हैं।
"वेदान्त दर्शन का आदि-अन्त है - 'संसार त्याग दो' - असत्य को छोड़कर सत्य की खोज करो।"
जिन्हें संसार से आसक्ति है, वे पूछ सकते है - "क्यों हम संसार से विमुख होने का प्रयास करें ? क्यों हम मौलिक केन्द्र पर लौट चलने के लिए प्रयत्न करें? माना कि हम सभी ईश्वर के यहाँ से आये हैं पर हम इस संसार को पर्याप्त आनन्दप्रद पाते हैं, हम क्यों न संसार का अधिकाधिक उपभोग करें ? इससे विमुख होने के लिए प्रयास ही क्यों करें?"
वे कहते हैं - देखो, संसार में कितना विकास हो रहा है, आनन्द के कितने साधन निकाले जा रहे हैं। यह सब कुछ तो आनन्दोपभोग के लिए ही है न ? हम क्यों इन सारी चीजो से मुँह मोड़कर उस वस्तु के लिए तपस्या करें, जो इन सब से भिन्न है ?
"इन सारी बातों के लिए जवाब यह है कि इस संसार का निश्चय ही अन्त होगा, यह खण्ड खण्ड होकर विनष्ट हो जाएगा। इन सारे आनन्दों को हम कई जन्मों में भोग चुके हैं। जिन चीजों को अभी हम देख रहे हैं, उनका आविर्भाव कई बार पहले हो चुका है। मैं यहाँ कई बार आ चुका हूँ और कई बार तुम सब से पहले भी बाते कर चुका हूँ। जिन शब्दों को तुम अभी सुन रहे हो, उन्हें इसके पहले भी अनेक बार सुन चुके हो और अभी और भी कितनी बार सुनोगे। हमारे शरीर बदलते रहते हैं पर आत्माएँ तो एक ही रहती हैं।
दूसरी बात यह है कि जिन चीजों को तुम अभी देख रहे हो, वे कालान्तर से आती ही रहती हैं। यह इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगा। मान लो कि तीन-चार पासे हैं और जब तुम उन्हें फेंकते हो, तो किसी में पाँच, किसी में चार, किसी में तीन और किसी में दो अंक निकल आते हैं। अगर तुम उन्हें बार बार फेंकते रहो, तो निश्चय ही ये अंक दुहराये जाएँगे। यह नहीं कहा जा सकता कि कितनी बार फेंकने से ऐसा होगा; वह तो संयोग पर निर्भर करता है। ठीक यही बात आत्माओं तथा उनसे सम्बद्ध वस्तुओं के सम्बन्ध भी कही जा सकती है।
एक बार जो रचनाएँ हुई और उनके विघटन हुए, उन्हीं की आवृत्ति बार बार होगी, चाहे इन आवृत्तियों के बीच जितना भी समय लगे।
पैदा होना, खाना-पीना और फिर मर जाना – जीवन का यह क्रम न जाने कितनी बार आता-जाता रहेगा। कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो सांसारिक भोग से ऊपर उठ ही नहीं सकते। पर वे लोग जो ऊपर उठना चाहते हैं,
यह अनुभव करते है। की यह आनन्द पारमार्थिक नहीं है, वरन् नगण्य हैं।
- स्वामी विवेकानंद ( ज्ञान योग पुस्तक से स्वाध्याय के कुछ अंश)