Rajesh Kumar Rajound

Rajesh Kumar Rajound Rajesh Kumar is one of the best boxing coaches in India. He is youngest Indian boxing coach who join
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डिग्रियां तो तालीम के खर्चें की रसीदें हैंइल्म वो है  जो किरदार  में  झलकता है- राजेश कुमार राजौंद          *k
02/06/2026

डिग्रियां तो तालीम के खर्चें की रसीदें हैं
इल्म वो है जो किरदार में झलकता है- राजेश कुमार राजौंद
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25/05/2026
बॉक्सर मनोज कुमार जी ने राजौंद की जनता और पशुधन की पीड़ा को जिस मजबूती से उठाया है, वह हर गांववासी की आवाज़ है।गांव के त...
19/05/2026

बॉक्सर मनोज कुमार जी ने राजौंद की जनता और पशुधन की पीड़ा को जिस मजबूती से उठाया है, वह हर गांववासी की आवाज़ है।
गांव के तालाबों की बदहाल स्थिति, रुके हुए रिंग बांध और अधूरे नालों का निर्माण केवल विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और सम्मान से जुड़ा विषय है।

उम्मीद है माननीय मुख्यमंत्री श्री Nayab Saini जी इस गंभीर समस्या का तुरंत संज्ञान लेकर राजौंद को राहत देने का कार्य करेंगे।

— राजेश कुमार राजौंद

एक सच्चा खिलाड़ी सिर्फ़ मेडल नहीं जीतता,वो अपने संघर्ष से आने वाली पीढ़ियों का रास्ता भी बनाता है।तुम्हारी आवाज़ केवल तु...
13/05/2026

एक सच्चा खिलाड़ी सिर्फ़ मेडल नहीं जीतता,
वो अपने संघर्ष से आने वाली पीढ़ियों का रास्ता भी बनाता है।

तुम्हारी आवाज़ केवल तुम्हारी नहीं,
उन हजारों खिलाड़ियों की आवाज़ है जो सिस्टम के दबाव में चुप रह जाते हैं।

सच बोलना आसान नहीं होता,
लेकिन इतिहास हमेशा उन्हीं को याद रखता है जो खिलाड़ियों के हक़ के लिए खड़े होते हैं।

मुझे गर्व है कि तुमने संघर्ष के रास्ते को चुना, समझौते के रास्ते को नहीं।
खिलाड़ी ही खेल की असली पहचान है, और उसकी गरिमा सबसे ऊपर होनी चाहिए। Boxer Manoj Kumar

एक खिलाड़ी जब मैदान में उतरता है,
तो वो सिर्फ़ मुक्के, दौड़ या दांव नहीं लगाता —
वो अपना बचपन, अपनी खुशियाँ, अपने सपने और पूरा यौवन दांव पर लगा देता है।

देश सेवा के लिए सेना में भर्ती होने की उम्र 17 साल निर्धारित है,
लेकिन एक खिलाड़ी तो बचपन से ही देश के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर देता है।
फिर भी विडंबना देखिए —
देश के लिए मेडल जीतने के बाद भी उसे चैन से जीने नहीं दिया जाता।

पहले नौकरी के लिए संघर्ष,
फिर अवार्ड के लिए संघर्ष,
और उसके बाद अपनी ही फेडरेशन में ख़ुद को सही साबित करने का संघर्ष।

सबसे बड़ी पीड़ा तब होती है जब कई खिलाड़ियों के साथ
न उनके अभिभावक खड़े हो पाते हैं,
न उनके कोच,
और न ही सिस्टम उनकी आवाज़ सुनता है।

ऐसे में खिलाड़ी सच जानते हुए भी अपने सिद्धांतों से समझौता करने को मजबूर हो जाता है,
क्योंकि उसकी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं होता।

मेरा खेल में कोई गॉडफादर नहीं था,
लेकिन मेरे पास मेरे गुरु राजेश कुमार राजौंद जी थे,
जिन्होंने हर कठिन समय में मेरे हौसले को टूटने नहीं दिया।
उन्हीं से प्रेरणा लेकर आज मैं उन खिलाड़ियों की आवाज़ उठाने का प्रयास कर रहा हूँ,
जिनकी आवाज़ को फेडरेशन तानाशाही तरीके से दबाने की कोशिश करती है।

दुखद यह भी है कि ऐसे सिस्टम का साथ अक्सर वही लोग देते हैं
जिन्हें समय से पहले बहुत कुछ मिल जाता है।
उनकी मजबूरी बन जाती है हर बात में “हाँ” कहना,
क्योंकि सच बोलेंगे तो सिस्टम से बाहर कर दिए जाएँगे।

क्रिकेट में खिलाड़ी ही कोच बनते हैं, खिलाड़ी ही सिलेक्टर बनते हैं।
हॉकी इंडिया में भी दिलीप टिर्की जी के नेतृत्व के बाद सकारात्मक बदलाव देखने को मिला।
तो फिर दूसरे खेलों में खिलाड़ियों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाता?

आज पूरा देश विनेश फोगाट के संघर्ष को देख रहा है,
लेकिन हर खिलाड़ी किसी खेल परिवार से नहीं आता,
और न ही हर खिलाड़ी की किस्मत इतनी मजबूत होती है कि उसकी आवाज़ देश सुन सके।

आख़िर क्यों फेडरेशन खिलाड़ियों को दूसरी पंक्ति में खड़ा कर देती हैं?
जबकि सच्चाई यह है कि फेडरेशन खिलाड़ी से है, खिलाड़ी फेडरेशन से नहीं।

यह पीड़ा सिर्फ़ मेरी नहीं,
हर उस खिलाड़ी की है जिसकी आवाज़ दबा दी गई।

सवाल आज भी वही है —
आख़िर खिलाड़ी कब तक यूँ ही पिसते रहेंगे… और क्यों?

मंज़िल दूर सही,पर कदम आज भी हौसलों के साथ चल रहे हैं…क्योंकि जीत रुकने वालों को नहीं,लगातार बढ़ने वालों को मिलती है — रा...
08/05/2026

मंज़िल दूर सही,
पर कदम आज भी हौसलों के साथ चल रहे हैं…
क्योंकि जीत रुकने वालों को नहीं,
लगातार बढ़ने वालों को मिलती है — राजेश कुमार राजौंद
:

🇮🇳🥊


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