11/07/2024
श्री हनुमान जी
रामकथा में हनुमान जी सागर पार करने ही वाले हैं। ऐसा प्रयास करने वाले वे अकेले हनुमान नहीं हैं, चलते तो बहुत हैं।
प्रतिदिन कितने ही हनुमान, संसार सागर में, इस मनुष्य देह रूपी लंका की, अन्त:करण रूपी अशोक वाटिका में, मोह रूपी रावण द्वारा बंदी बनाई गई, भक्ति रूपी सीता की खोज के लिए, भगवन्नाम रूपी मुद्रिका, मुंह में डाल कर निकलते हैं।
भगवान् बड़ी आशा से, जल भरी आंखों से, वह नाम अंगूठी, उन को देते हैं कि ये अवश्य ही मनुष्य देह पाकर, भक्ति की खोज करेंगे।
पर कितनों ने छलांग लगाने का ही साहस नहीं किया, अपना स्वरूप भूत बल भूलें बैठें रहें। कितनों ने छलांग तो लगाई पर नाम अंगूठी मुंह से सागर में ही गिरा दी।
कितने मनोरथ के मैनाक पर अटक गए। कितनों को प्रतिष्ठा रूपी सुरसा निगल गई। कितनों को राग-द्वेष रूपी सिंघिका खा गई। तो कितनों को अविद्यारूपी लंकिनी ने बंदी बना लिया।
कुछ जो बचते बचाते पहुंचे, उनमें से कितने ही लंका की चकाचौंध में लुभाएं गए। किसी ने वहीं विवाह कर घर बसा लिया। कोई दुकान खोल बैठ गया। किसी ने वहां के दुःख देखकर, कष्ट निवारण केन्द्र, अनाथालय, वृद्धाश्रम, अस्पताल, विद्यालय, कालेज आदि खोल लिएं। तो कोई किन्हीं को भगवान् की कथा सुनाकर, रिझाकर और गीत संगीत की मंडली इकठ्ठी कर, महामण्डलेश्वर और न मालूम कौन कौन सी पदवियां पाकर जम गया।
कोई विरला, अपनें लक्ष्य को निरंतर याद रख, चलता ही चला गया, अटका नहीं, भटका नहीं, घबराया नहीं, भरमाया नहीं; सीधे अन्त:करण अशोक वाटिका में घुस गया, भक्ति को खोजा और लंका को आग लगाकर, भगवान् के चरणों में वापिस, सही सलामत, बेदाग पहुंच गया।
बस, वही राम का प्यारा है, वही अमर है, चिरंजीवी है,असली संत है, असली हनुमान है।
अस्तु