Vireshwar Upadhyay वीरेश्वर उपाध्याय

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Vireshwar Upadhyay वीरेश्वर उपाध्याय Yug Manishi
Coordinator
Think - Tank
Problem Solver
Trouble Shooter
Solution Architect
Subject Matte

1- यह युग परिवर्तन का महत्वपूर्ण समय है


2- योजना भले ही ईश्वर की है


3- लेकिन आप भी बहुत कुछ कर सकते हैं


4- जो आगे बढ़कर कुछ करेगा सो पायेगा





{ बौद्धिक - क्रांति }
{ वीरेश्वर उपाध्याय } ...... { शांतिकुञ्ज - हरिद्वार }
___________________________________

ॐ
27/12/2025

28/10/2024
27/10/2024

चर्चा

01/06/2024

दुःख संसार से दूर होने, रोने, रूठने अथवा अपने विगत
कर्मो पर पश्चाताप करने का उपकरण नहीं बल्कि
एक दुर्लभतम परमिट, पत्र है
देवत्व, ईश्वर कृपा, दर्शन तथा सत्संग पाने का।

हम प्रभु का सानिध्य प्राप्त कर मोक्ष को
प्राप्त कर सकते हैं अतः सच ही कहा है कि
दुःख ही सुख का मूल है।

25/05/2024

निर्वस्त्र आये थे,निर्वस्त्र ही जायेंगे,
कमज़ोर आये थे,कमज़ोर ही जायेंगे,
बिना धन-संपदा के आये थे,
बिना धन-संपदा के ही जायेंगे,
पहला स्नान भी हमने स्वंय नहीं किया
अंतिम स्नान भी हम स्वंय नहीं कर पायेंगे,
यही सच्चाई है,जीवन मे कुछ भी स्थायी नही है,
इसलिये स्वयं को अधिक तनावग्रस्त न करें,
क्योंकि परिस्थितयां चाहे कितनी भी खराब हो,
बदलती जरूर है।

16/05/2024

अनजाने कर्म का फल

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था ।
राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था ।
उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी ।
तब पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से ज़हर निकाला ।
तब रसोईया जो लंगर ब्राह्मणो के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई ।
किसी को कुछ पता नहीं चला ।
फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी ।
अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दुख हुआ ।

ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा .... ??
(1) राजा .... जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है ....
या
(2 ) रसोईया .... जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है ....
या
(3) वह चील .... जो जहरीला साँप लिए राजा के महल से गुजरी ....
या
(4) वह साँप .... जिसने अपनी आत्म-रक्षा में ज़हर निकाला ....

बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका (Pending) रहा ....

फिर कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा ।
उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि "देखो भाई ....जरा ध्यान रखना .... वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है ।"

बस जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला (decision) ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा ।

यमराज के दूतों ने पूछा - प्रभु ऐसा क्यों ??
जब कि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका (role) भी नहीं थी ।
तब यमराज ने कहा - कि भाई देखो, जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं । पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनंद मिला .... ना ही उस रसोइया को आनंद मिला .... ना ही उस साँप को आनंद मिला .... और ना ही उस चील को आनंद मिला ।
पर उस पाप-कर्म की घटना का बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला । इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा ।

बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से (बुराई) करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता हैं ।

अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया .... ??

ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता है जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं ....

☺: A very deep *Philosophy of Karma*☝

12/05/2024

जो बड़ा माना जाता है
वह गर्व का अनुभव करता है।

यह गर्व कब अहंकार मे बदल जाता है,
पता नही चलता। अहंकार के साथ,
बड़ा होना एक रोग बन जाता है
जो इन्सान को पतन की ओर ले जाता है।

बड़ा बन जाना सरल है लेकिन
बड़ा बने रहने मे बड़ा संघर्ष है।

09/04/2024

ऋद्धि दे, सिद्धि दे,
वंश में वृद्धि दे, ह्रदय में ज्ञान दे,
चित्त में ध्यान दे, अभय वरदान दे,
दुःख को दूर कर, सुख भरपूर कर, आशा को संपूर्ण कर,
सज्जन जो हित दे, कुटुंब में प्रीत दे,
जग में जीत दे, माया दे, साया दे, और निरोगी काया दे,
मान-सम्मान दे, सुख समृद्धि और ज्ञान दे,
शान्ति दे, शक्ति दे, भक्ति भरपूर दें..."

आप सभी सज्जनों को ९ अप्रैल से शुरू होने
वाले नव वर्ष विक्रम संवत २०८१ के लिए अग्रिम
शुभकामनाएं।

🚩 हर हर महादेव 🚩

09/04/2024

*संतोष का गुण उनके ज्यादा समीप होता है जो उदार होते हैं। वृक्ष अपना सर्वस्व परोपकार को दे देते हैं, नदियों का जल जगत के लिए होता है। वे परम संतोषी हैं। संतोष का प्रभाव पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है। जो संतोषी होते हैं वो परोपकारी होते हैं। हमे संतोषी बनने की कोशिश करनी चाहिए जिससे जीवन का परम आनन्द प्राप्त किया जा सके।

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