24/10/2020
*मेरी बात सुनो, समझो और करो !!!*
अरसे से उनको सुनने की हसरत थी। क्या कह रहे थे वह? यही न कि मेरी बात सुनो, समझो और करो। आखिर उनसे आगे सोचा ही नहीं गया है।
शायद ऐसे ही किसी लम्हे में जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने महसूस किया होगा, ‘ज्यादातर लोग जहां तक देख पाते हैं, उसे ही दुनिया समझ लेते हैं। कुछ लोग उसे नहीं मानते। हमें उनके साथ होना चाहिए।’ 19 वीं सदी के महान दार्शनिक हैं वह। भारतीय दर्शन से बहुत प्रभावित रहे हैं।
हमारी सोच ही दुनिया को छोटा या बड़ा बनाती है। ऐसा भी होता है कि हम अपने को बड़ा समझते हैं और दुनिया छोटी हो जाती है। कभी हम अपने को छोटा समझते हैं और दुनिया बड़ी हो जाती है। जिंदगी जीने के लिए बड़प्पन जरूरी होता है। और बिना सोच के बड़प्पन नहीं आता।
हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। और लगातार छोटे होते चले जाते हैं। हम छोटी-छोटी चीजें करते हैं और बडे़े होते चले जाते हैं। हम एक तरह से सोचते हैं। और सोचते-सोचते उसी को सब कुछ मान लेते हैं। हम खुद को इतना बड़ा कर लेते हैं कि अपने आगे हर चीज छोटी नजर आती है। वही धीरे-धीरे हमारी दुनिया होने लगती है। हम उसके आगे न देखना चाहते हैं, और न सुनना चाहते हैं। लेकिन हमारे देखने और सुनने से ही तो वह पूरी दुनिया नहीं हो जाती। वह तो जो है, सो है। हम खुद ही खुशफहमी या गलतफहमी में रहना चाहें, तो रह सकते हैं। यह तो एक जोखिम है, जो खुद को ही खत्म करता है।
*Happy Ashtmi*
🙏🙏