02/03/2021
- बस यूं समझ लीजिए मोटेरा की 'कातिल गेंद' बल्लेबाजों के सिलेबस के बाहर की थी
- गेंद अगर दिखेगी नहीं तो टर्न करे या सीधी रहे.. क्या फर्क पड़ता है
- अहमदाबाद में जो कुछ हुआ, उसे आसान शब्दों में समझिए
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विराट कोहली, विवियन रिचर्ड्स, नैथन लॉयन, ग्रीएम स्वॉन.. फेहरिस्त लंबी है उन लोगों की जो अहमदाबाद में दो दिन से भी कम समय में नाटकीय तरीके से खत्म हुए टेस्ट के लिए बल्लेबाजों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इतने दिनों में मैंने क्रिकेटर कमेंटेटरों, ट्विटर और फेसबुक पर लिखने वाले पत्रकारों के तमाम आकलन पढ़े लेकिन मुझे ज्यादातर मुख्य समस्या से भटके हुए लगे।
एक्सपर्ट्स ने इसे हेडिंग्ली बनाम मोटेरा और सीम बनाम स्पिन, बल्लेबाज बनाम गेंदबाज की लड़ाई बनाने की कोशिश की। लेकिन मेरे ख्याल से समस्या ये नहीं है। इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया में अगर बैटिंग कॉलेप्स होता है तो उसकी अपनी क्रिकेटीय वजहें होती हैं। खासकर इंग्लैंड में पिच के साथ मौसम अहम भूमिका निभाता है। इसलिए ये कह देना काफी कि इंग्लैंड में जब दो-तीन दिन में टेस्ट खत्म होता है तो कोई क्यों नहीं कुछ बोलता?
कुल लोग ये भी तर्क दे रहे कि जिस पिच पर रोहित शर्मा बैटिंग कर सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं? ये बेहद फर्जी तर्क है। ऐसी खबरें आपने देखी और सुनी होगी कि बहुमंजिला इमारत के गिरने पर बहुत सारे लोग मर गए लेकिन दो-तीन बाद मलबे से कोई बच्चा या कोई बुजुर्ग जिंदा निकल गया। चमत्कारिक रूप से किसी के बच निकलने का मतलब ये नहीं कि मृतकों से दुर्व्यवहार किया जाए। रोहित शर्मा ने रन बना लिया तो इसका मतलब ये नहीं बाकी बेकार थे। साथ ही यहां ये भी देखना जरूरी है कि रोहित शर्मा किसी अश्विन या अक्षर पटेल के खिलाफ रन नहीं बना रहे थे। पूछिये ना उनसे जो जो रूट की गेंद पर भी गच्चा खा गए।
खैर आते हैं मुद्दे पर। अहमदाबाद के मोदी स्टेडियम में मचे हाहाकार (ध्यान दीजिए मैंने पिच नहीं लिखा क्योंकि मेरी चिंता पिच है ही नहीं) पर इतने दिनों में मुझे दो ही विश्लेषण ऐसा पढ़ने को मिला जो सच के करीब जान पड़ता है। इंडियन एक्प्रेस में देवेंद्र पांडे की स्टोरी और पत्रकार फ्रेडी वाइल्ड का ट्विटर थ्रेड। इन दोनों का लब्बोलुआब ये है कि दोष मोटेरा की पिच का नहीं बल्कि पिंक बॉल का है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदाबाद में टेस्ट के नाम पर जो कुछ हुआ उससे टीम मैनेजमेंट भी खुश नहीं है। टीम मैनेजमेंट के एक सदस्य ने अखबार को बताया, 'गुलाबी गेंद का सामना करते समय समस्या ये होती है कि गुलाबी गेंद लाल गेंद की तुलना में बहुत तेज़ी से स्किड होती है, जिसे पढ़ना मुश्किल होता है। दरअसल, लाल गेंदों का सामना करते-करते क्रिकेटर के दिमाग में एक अलग स्मृति बन जाती है। उनकी स्मृति में गेंद की रफ्तार और गेंद के व्यवाह को लेकर एक निश्चित ज्ञान दर्ज होता है। चूंकि गुलाबी गेंद लाल गेंद की तुलना में ज्यादा तेजी से आती है, इससे बल्लेबाज का अंदाजा बिगड़ जाता है। यही वजह है जिसे एक्सपर्ट सीधी और सपाद गेंद कह रहे हैं, उन गेंदों पर भी बल्लेबाज पस्त हो गए। आसान शब्दों में ये जान लीजिए कि जैसे सिलेबस से बाहर का सवाल आने पर अच्छे से अच्छा छात्र गड़बड़ा जाता है वैसे ही अहमदाबाद में जिन गेंदों पर बल्लेबाज आउट हुए वो सिलेबस के बाहर की गेंद थी। अखबार के मुताबिक यही वजह है कि खिलाड़ी डे-नाइट टेस्ट खेलने के लिए उत्सुक नहीं हैं।
जहां बड़े-बड़े पूर्व क्रिकेटर हेडिंग्ली बनाम मोटेरा और सीम बनाम स्पिन विवाद में उलझे हुए थे इंग्लैंड के कप्तान जो रूट ने समस्या को तुरंत पकड़ लिया। रूट के मुताबिक पिंक बॉल में चमक बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला अतिरिक्त पेंट की वजह गेंद सतह पर तेजी से फिसलती है। इससे बल्लेबाजों को गेंद भांपने में मुश्किल होती है। इससे जाहिर होता है कि अहमदाबाद 'हादसे' के लिए पिच नहीं बल्कि पिंक बॉल जिम्मेदार है।
लेकिन,सवाल उठता है कि डे-नाइट टेस्ट कोई पहली बार तो नहीं हो रहा फिर अहमदाबाद में नया क्या हुआ? तो जानकारों के मुताबिक धूल वाली पिच, ओस और तापमान में गिरावट ने गुलाबी बॉल को और घातक बना दिया। टीम इंडिया के एक खिलाड़ी के मुताबिक अगर मोटेरा में लाल गेंद से टेस्ट मैच होता है तो चार दिन खिंच जाता। चेन्नई की पिच और अहमदाबाद की पिच के बीच जो लोग तुलना करते हैं, वो भूल गए कि चेन्नई में रेड बॉल से टेस्ट खेला गया और चेन्नई में पिंक ब़ॉल। इसलिए चेन्नई में खराब पिच होने के बावजूद मैच लंबा चला।
पिंक बॉल के साथ एक और दिक्कत बताई जाती है वो है काले रंग की सीम। ब्लैक सीम की वजह से बल्लेबाजों के लिए हवा में इसे पकड़ना (देखना) मुश्किल होता है। बल्लेबाजों को ये अंदाजा लगाने में दिक्कत होती है कि गेंद किधर जा रही है। जब बल्लेबाज को गेंद की दशा-दिशा का अंदाजा ही ना हो तो फिर बॉल टर्न करे या सीधी रह जाए क्या फर्क पड़ता है। वो तो बेबस होगा। आप इसे ऐसे भी समझिये। आप गाड़ी ड्राइव कर रहे हों और आगे ये पीछे की गाड़ी की रफ्तार का आपको सटीक अंदाजा ही ना हो तो क्या होगा? या तो आप ठुकेंगे या ठोकेंगे? अहमदाबाद वही हुआ। बल्लेबाजों की ठुकाई हो गई। टीम इंडिया खुशकिस्मत थी कि उसे अश्विन और अक्षर का सामना नहीं करना पड़ा,वरना विराट कोहली भी शिकायत कर रहे होते।