02/10/2026
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"जब अर्जुन धर्म की खातिर भीष्म पितामह को मार सकते हैं, तो फिर नाथूराम गोडसे ने राष्ट्र के खातिर मोहनदास को मारकर क्या गलत किया।"
ये तुलना सोशल मीडिया पर अक्सर होती है। इसके दो अलग-अलग संदर्भ हैं:
1. महाभारत वाला प्रसंग:
भीष्म पितामह और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र में घोषित युद्ध हुआ था। दोनों पक्ष आमने-सामने थे, युद्ध के नियम थे। कृष्ण ने अर्जुन को गीता में समझाया था कि ये धर्मयुद्ध है, जहाँ एक क्षत्रिय का कर्तव्य अपने पक्ष के धर्म के लिए लड़ना है। अर्जुन ने युद्ध के मैदान में एक योद्धा को हराया था।
2. 1948 वाला प्रसंग:
नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को मोहनदास करमचंद गांधी की प्रार्थना सभा में जाकर गोली मारकर हत्या की थी। उस समय कोई युद्ध नहीं चल रहा था, भारत स्वतंत्र हो चुका था। गोडसे ने अदालत में अपना पक्ष रखा कि उसे लगता था कि गांधी की नीतियाँ, खासकर विभाजन के समय पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने की बात मानना, राष्ट्र के हित में नहीं हैं।
अदालत ने इस हत्या को एक व्यक्ति द्वारा दूसरे निहत्थे व्यक्ति की राजनीतिक हत्या माना, इसे युद्ध नहीं माना, और गोडसे को भारतीय कानून के तहत मुकदमा चलाकर फांसी की सजा दी गई।
इसी वजह से इस तुलना पर दो मुख्य नजरिए मिलते हैं:
इस तुलना को सही मानने वालों का तर्क: उनका कहना है कि दोनों ने ही अपने-अपने हिसाब से बड़े हित के लिए अपने पूज्य / बड़े व्यक्ति के खिलाफ कदम उठाया। अर्जुन के लिए वह धर्म था, गोडसे के लिए राष्ट्र था।
इस तुलना को गलत मानने वालों का तर्क: उनका कहना है कि दोनों घटनाओं की प्रकृति बिल्कुल अलग है - एक घोषित युद्ध के मैदान में दो सशस्त्र योद्धाओं के बीच लड़ाई थी, दूसरी शांति के समय में एक निहत्थे नेता की हत्या थी। एक को शास्त्रों में क्षत्रिय धर्म कहा गया, दूसरे को आधुनिक कानून में हत्या माना गया।
अर्जुन का कार्य महाभारत की कथा और दर्शन का हिस्सा है, जबकि गोडसे का कार्य आधुनिक भारत के कानूनी और ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा है।