19/06/2026
वेतन और भत्तों में असमानता के कारण डॉक्टर्स कर रहे हैं रिजाइन...लखनऊ के चक गंजरिया स्थित कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में डॉक्टरों के इस्तीफे का सिलसिला थम नहीं रहा है। अब न्यूरो सर्जरी विभाग के एक और डॉक्टर ने संस्थान से किनारा कर लिया है। नियमित चिकित्सक डॉ. मयंक सिंह ने नौकरी छोड़ दी है। SGPGI में सेलेक्शन के बाद उन्होंने रिजाइन कर दिया। इससे दिमाग में ट्यूमर, ब्रेन कैंसर और जटिल न्यूरो संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की मुश्किलें बढ़ने की संभावना है।
कैंसर संस्थान में कुल 32 नियमित डॉक्टर हैं। आठ बांड के तहत डॉक्टर तैनात हैं। जबकि एक महिला डॉक्टर कानपुर से प्रतिनियुक्त पर हैं। कुल 41 डॉक्टर हैं। न्यूरो सर्जरी विभाग में अभी तक तीन नियमित व दो बांड के तहत डॉक्टर तैनात थे। इनमें नियमित डॉ. मयंक सिंह ने नौकरी छोड़ दी है। उनका पीजीआई में चयन हो गया है।
कैंसर संस्थान के 11 विभागों में एक भी डॉक्टर नहीं है। इन विभागों में न तो कोई जांच हो रही है न ही इलाज। जबकि डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं। कई विभागों में तो करोड़ों की मशीन हैं। जो कि ताले में बंद धूल फांक रही हैं। मेडिकल आंकोलॉजी, मेडिकल फिजिस्स, डेंटेस्ट्री, न्यूक्लीयर मेडिसिन, बायोकेमेस्ट्री, हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन, पैलिएटिव केयर, पीएमआर, त्वचा, हीमैटोलॉजी व रेडियोडायग्नोसिस विभाग है।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में मरीज और उनके तीमारदार हर दिन उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचते हैं। ब्रेन ट्यूमर से जूझ रहे मरीजों में कई ऐसे होते हैं, जिनमें समय पर सर्जरी न होने पर बीमारी तेजी से बढ़ने का खतरा रहता है। ऐसे में विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी मरीजों की परेशानी को और बढ़ा सकती है। कैंसर संस्थान से अब तक 28 से ज्यादा डॉक्टर नौकरी छोड़ चुके हैं। वहीं कई अन्य डॉक्टर भी संस्थान छोड़ने की तैयारी में हैं। लगातार हो रहे पलायन से संस्थान की कई महत्वपूर्ण सेवाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
डॉक्टरों की नाराजगी की बड़ी वजह वेतन और भत्तों में असमानता बताई जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि केजीएमयू, पीजीआई व लोहिया संस्थान में तैनात डॉक्टरों और कैंसर संस्थान के विशेषज्ञों की योग्यता समान है। लेकिन वेतन-भत्तों में अंतर है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ लंबे समय से अपनी मांगें उठा रहे हैं। विशेषज्ञों के जाने का असर सीधे मरीजों पर पड़ रहा है। दूर-दराज जिलों से आने वाले कैंसर मरीजों को तारीख मिलने का इंतजार करना पड़ता है। कई मरीज ऐसे भी हैं, जिनके लिए हर गुजरता दिन बीमारी के बढ़ने का खतरा लेकर आता है।