08/09/2026
1962 की वो कहानी जब फ्रंट से भागकर बेडरूम से लड़ी गई थी जंग
दुनिया के सैन्य इतिहास में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं जहां सेनापतियों ने अपनी आखिरी सांस तक अग्रिम मोर्चे पर रहकर सेना का नेतृत्व किया। लेकिन वर्ष 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान एक ऐसी घटना भी घटी जिसने भारतीय सेना के शौर्य के इतिहास पर एक ऐसा दाग लगा दिया जिसे आज भी सैन्य अधिकारी याद नहीं करना चाहते।
यह कहानी है तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के चहेते और तत्कालीन चौथी कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी एम कौल की जो युद्ध के सबसे नाजुक मोड़ पर अपने सैनिकों को बर्फीली पहाड़ियों में छोड़कर दिल्ली लौट आए थे।
अक्टूबर 1962 की शुरुआत में नेफा जो अब अरुणाचल प्रदेश है के बॉर्डर पर हालात बद से बदतर हो चुके थे। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी लगातार भारतीय सीमाओं पर दबाव बना रही थी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन को एक ऐसे संकटमोचक की तलाश थी जो उनकी फॉरवर्ड पॉलिसी यानी बिना पूरी तैयारी के चीन सीमा के पास चौकियां बनाना को सही साबित कर सके।
इसके लिए सेना मुख्यालय की वरिष्ठता और नियमों को दरकिनार करते हुए 4 अक्टूबर 1962 को रातों रात एक नई टुकड़ी चौथी कोर बनाई गई। इसकी कमान सौंपी गई लेफ्टिनेंट जनरल बी एम कौल को जो मूल रूप से आर्मी सर्विस कोर के अधिकारी थे और जिन्हें युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव कम था।
5 अक्टूबर को कौल असम के तेजपुर मुख्यालय पहुंचे। कमान संभालने के तुरंत बाद जनरल कौल जमीनी हकीकत देखने के लिए सीमावर्ती दुर्गम इलाके धौला और नमका चू नदी के पास गए। यह इलाका समुद्र तल से करीब 15000 फीट की ऊंचाई पर था जहां जमा देने वाली ठंड थी।
भारतीय सैनिक वहां बिना पर्याप्त गरम कपड़ों और थ्री नॉट थ्री 303 की पुरानी राइफलों के साथ देश की रक्षा में तैनात थे। लेकिन पहाड़ों की इस ऊंचाई, ऑक्सीजन की कमी और हाड़ कंपा देने वाली ठंड को जनरल कौल बर्दाश्त नहीं कर पाए और वहां पहुंचते ही उन्होंने दावा किया कि उनके सीने में तेज दर्द है और उन्हें पल्मोनरी एडिमा यानी अत्यधिक ऊंचाई के कारण फेफड़ों में पानी भरना हो गया है।
जब चीनी सेना भारतीय चौकियों को घेर रही थी और भारतीय सैनिकों को अपने कमांडर की रणनीतिक सूझबूझ और हौसले की सबसे ज्यादा जरूरत थी ठीक उसी वक्त यानी 11 अक्टूबर 1962 को जनरल कौल मोर्चे और तेजपुर मुख्यालय को छोड़कर विमान से सीधे दिल्ली आ गए।
दिल्ली आने के बाद भी वे किसी बड़े अस्पताल में भर्ती होने के बजाय नई दिल्ली के अपने सरकारी आवास पर आराम करने चले गए।
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि गंभीर रूप से बीमार होने के दावों के बावजूद कौल ने चौथी कोर के कमांडर का पद नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने घर के बेडरूम को ही अस्थायी सैन्य मुख्यालय बना लिया।
देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन और इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ बी एन मलिक खुद एक बीमार जनरल के घर हाजिरी लगाने जाते थे। वे कौल के बिस्तर के चारों तरफ बैठते थे, रजाई पर युद्ध के नक्शे फैलाए जाते थे और वहीं से रणनीतियां तय होती थीं।
जनरल कौल अपने बिस्तर पर तकिया लगाकर लेटे रहते थे और वहीं से टेलीफोन और वायरलेस के जरिए सैकड़ों मील दूर तेजपुर में बैठे अपने जूनियर अफसरों को ऑर्डर पास करते थे। वे जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुके थे और तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थापर भी इस राजनीतिक रसूख के आगे बेबस थे।
युद्ध के बाद जब इस पराजय की जांच के लिए हेंडरसन ब्रूक्स भगत रिपोर्ट तैयार की गई तो उसमें जनरल कौल के इस गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर बेहद सख्त टिप्पणियां की गई थीं। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि दुनिया के सैन्य इतिहास में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि जब देश पर हमला हुआ हो तो मोर्चे का मुख्य कमांडर सैकड़ों मील दूर राजधानी में अपने बिस्तर पर बैठकर सेना को हुक्म दे रहा हो। अगर जनरल कौल सचमुच इतने बीमार थे कि वे पहाड़ों पर नहीं रह सकते थे तो उन्हें तुरंत अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए था या कमान किसी दूसरे सक्षम जनरल को सौंप देनी चाहिए थी।
जब दिल्ली के बेडरूम से युद्ध लड़ने का यह सिलसिला चल रहा था तब चीन ने इसका पूरा फायदा उठाया। 20 अक्टूबर 1962 को चीनी सेना ने पूरी ताकत के साथ हमला बोल दिया। भारतीय सेना बिना स्पष्ट आदेशों के बिखरने लगी। तब जनरल कौल को आनन फानन में वापस भेजा गया। 24 अक्टूबर को जब कौल दोबारा तेजपुर पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भारतीय सेना के सैकड़ों जवान शहीद हो चुके थे और नेफा का बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में जा चुका था।
यह घटना साबित करती है कि जब सेना में नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक रसूख और भाई भतीजावाद के आधार पर होती हैं तो देश को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
इस पराजय के बाद नवंबर 1962 में जनता और संसद के भारी दबाव के कारण जनरल कौल को सेना से हटना पड़ा। इसके बाद नेहरू ने सैम मानेकशॉ को तेजपुर भेजा जिन्होंने आते ही इस रिमोट कंट्रोल ड्रामे को खत्म किया और सेना के स्वाभिमान को वापस जिंदा किया।
डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी, प्रकाशित पुस्तकों, मीडिया रिपोर्ट्स और हेंडरसन ब्रूक्स भगत रिपोर्ट से जुड़े सार्वजनिक अंशों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल ऐतिहासिक जानकारी साझा करना है। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं है।