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1962 की वो कहानी जब फ्रंट से भागकर बेडरूम से लड़ी गई थी जंगदुनिया के सैन्य इतिहास में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं जहां सेनापत...
08/09/2026

1962 की वो कहानी जब फ्रंट से भागकर बेडरूम से लड़ी गई थी जंग

दुनिया के सैन्य इतिहास में ऐसे कई किस्से दर्ज हैं जहां सेनापतियों ने अपनी आखिरी सांस तक अग्रिम मोर्चे पर रहकर सेना का नेतृत्व किया। लेकिन वर्ष 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान एक ऐसी घटना भी घटी जिसने भारतीय सेना के शौर्य के इतिहास पर एक ऐसा दाग लगा दिया जिसे आज भी सैन्य अधिकारी याद नहीं करना चाहते।

यह कहानी है तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के चहेते और तत्कालीन चौथी कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी एम कौल की जो युद्ध के सबसे नाजुक मोड़ पर अपने सैनिकों को बर्फीली पहाड़ियों में छोड़कर दिल्ली लौट आए थे।

अक्टूबर 1962 की शुरुआत में नेफा जो अब अरुणाचल प्रदेश है के बॉर्डर पर हालात बद से बदतर हो चुके थे। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी लगातार भारतीय सीमाओं पर दबाव बना रही थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन को एक ऐसे संकटमोचक की तलाश थी जो उनकी फॉरवर्ड पॉलिसी यानी बिना पूरी तैयारी के चीन सीमा के पास चौकियां बनाना को सही साबित कर सके।

इसके लिए सेना मुख्यालय की वरिष्ठता और नियमों को दरकिनार करते हुए 4 अक्टूबर 1962 को रातों रात एक नई टुकड़ी चौथी कोर बनाई गई। इसकी कमान सौंपी गई लेफ्टिनेंट जनरल बी एम कौल को जो मूल रूप से आर्मी सर्विस कोर के अधिकारी थे और जिन्हें युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव कम था।

5 अक्टूबर को कौल असम के तेजपुर मुख्यालय पहुंचे। कमान संभालने के तुरंत बाद जनरल कौल जमीनी हकीकत देखने के लिए सीमावर्ती दुर्गम इलाके धौला और नमका चू नदी के पास गए। यह इलाका समुद्र तल से करीब 15000 फीट की ऊंचाई पर था जहां जमा देने वाली ठंड थी।

भारतीय सैनिक वहां बिना पर्याप्त गरम कपड़ों और थ्री नॉट थ्री 303 की पुरानी राइफलों के साथ देश की रक्षा में तैनात थे। लेकिन पहाड़ों की इस ऊंचाई, ऑक्सीजन की कमी और हाड़ कंपा देने वाली ठंड को जनरल कौल बर्दाश्त नहीं कर पाए और वहां पहुंचते ही उन्होंने दावा किया कि उनके सीने में तेज दर्द है और उन्हें पल्मोनरी एडिमा यानी अत्यधिक ऊंचाई के कारण फेफड़ों में पानी भरना हो गया है।

जब चीनी सेना भारतीय चौकियों को घेर रही थी और भारतीय सैनिकों को अपने कमांडर की रणनीतिक सूझबूझ और हौसले की सबसे ज्यादा जरूरत थी ठीक उसी वक्त यानी 11 अक्टूबर 1962 को जनरल कौल मोर्चे और तेजपुर मुख्यालय को छोड़कर विमान से सीधे दिल्ली आ गए।

दिल्ली आने के बाद भी वे किसी बड़े अस्पताल में भर्ती होने के बजाय नई दिल्ली के अपने सरकारी आवास पर आराम करने चले गए।

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि गंभीर रूप से बीमार होने के दावों के बावजूद कौल ने चौथी कोर के कमांडर का पद नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने घर के बेडरूम को ही अस्थायी सैन्य मुख्यालय बना लिया।

देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन और इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ बी एन मलिक खुद एक बीमार जनरल के घर हाजिरी लगाने जाते थे। वे कौल के बिस्तर के चारों तरफ बैठते थे, रजाई पर युद्ध के नक्शे फैलाए जाते थे और वहीं से रणनीतियां तय होती थीं।

जनरल कौल अपने बिस्तर पर तकिया लगाकर लेटे रहते थे और वहीं से टेलीफोन और वायरलेस के जरिए सैकड़ों मील दूर तेजपुर में बैठे अपने जूनियर अफसरों को ऑर्डर पास करते थे। वे जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुके थे और तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थापर भी इस राजनीतिक रसूख के आगे बेबस थे।

युद्ध के बाद जब इस पराजय की जांच के लिए हेंडरसन ब्रूक्स भगत रिपोर्ट तैयार की गई तो उसमें जनरल कौल के इस गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर बेहद सख्त टिप्पणियां की गई थीं। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि दुनिया के सैन्य इतिहास में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि जब देश पर हमला हुआ हो तो मोर्चे का मुख्य कमांडर सैकड़ों मील दूर राजधानी में अपने बिस्तर पर बैठकर सेना को हुक्म दे रहा हो। अगर जनरल कौल सचमुच इतने बीमार थे कि वे पहाड़ों पर नहीं रह सकते थे तो उन्हें तुरंत अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए था या कमान किसी दूसरे सक्षम जनरल को सौंप देनी चाहिए थी।

जब दिल्ली के बेडरूम से युद्ध लड़ने का यह सिलसिला चल रहा था तब चीन ने इसका पूरा फायदा उठाया। 20 अक्टूबर 1962 को चीनी सेना ने पूरी ताकत के साथ हमला बोल दिया। भारतीय सेना बिना स्पष्ट आदेशों के बिखरने लगी। तब जनरल कौल को आनन फानन में वापस भेजा गया। 24 अक्टूबर को जब कौल दोबारा तेजपुर पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भारतीय सेना के सैकड़ों जवान शहीद हो चुके थे और नेफा का बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में जा चुका था।

यह घटना साबित करती है कि जब सेना में नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक रसूख और भाई भतीजावाद के आधार पर होती हैं तो देश को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

इस पराजय के बाद नवंबर 1962 में जनता और संसद के भारी दबाव के कारण जनरल कौल को सेना से हटना पड़ा। इसके बाद नेहरू ने सैम मानेकशॉ को तेजपुर भेजा जिन्होंने आते ही इस रिमोट कंट्रोल ड्रामे को खत्म किया और सेना के स्वाभिमान को वापस जिंदा किया।

डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी, प्रकाशित पुस्तकों, मीडिया रिपोर्ट्स और हेंडरसन ब्रूक्स भगत रिपोर्ट से जुड़े सार्वजनिक अंशों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल ऐतिहासिक जानकारी साझा करना है। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं है।

नेपाल में आई बाढ़ ने सब कुछ तहस नहस कर दिया है। सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और कई जगह पूरे के पूरे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट म...
08/09/2026

नेपाल में आई बाढ़ ने सब कुछ तहस नहस कर दिया है। सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और कई जगह पूरे के पूरे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट मलबे में दब गए। लेकिन सबसे डरावनी तस्वीर उन सुरंगों के अंदर की है जहां बाढ़ आने के समय काम कर रहे कई मजदूर बाहर ही नहीं निकल पाए।

अब इन अंधेरी सुरंगों के अंदर जिंदगी तलाशने के लिए नेपाली सेना और विदेशी रेस्क्यू टीमें जुटी हुई हैं। ड्रोन, तकनीकी उपकरण और भारी मशीनों की मदद से सुरंगों को खंगाला जा रहा है क्योंकि कहीं कोई इंसान अभी भी जिंदा हो सकता है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक भारत, चीन और दक्षिण कोरिया की टनल रेस्क्यू टीमें भी नेपाली सेना के साथ मिलकर अभियान चला रही हैं।

और फिर ऐसी खबर आई जिसने उम्मीद जगा दी।

ऊपरी त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की एक सुरंग में रेस्क्यू टीम करीब 225 मीटर अंदर पहुंची और वहां एक चीनी नागरिक जिंदा मिला। वह बाढ़ के बाद करीब 10 दिन से सुरंग के अंदर फंसा हुआ था। उसे बाहर निकालकर तुरंत प्राथमिक उपचार दिया गया और फिर अस्पताल ले जाया गया।

इससे एक दिन पहले इसी इलाके की दूसरी सुरंग से दो नेपाली मजदूरों को भी जिंदा निकाला गया था। वे करीब 170 मीटर अंदर फंसे हुए थे और नौ दिन बाद बाहर आए।

और उसी दिन नुवाकोट के बेट्रावती में एक और अविश्वसनीय रेस्क्यू हुआ। 64 साल की चंद्रिका श्रेष्ठ को उनके बाढ़ से दबे घर की ऊपरी मंजिल से 11वें दिन जिंदा निकाला गया। परिवार तो उन्हें खो चुका मानकर अंतिम संस्कार की तैयारी तक कर चुका था। फिर मलबे के बीच से हल्की आवाज सुनाई दी और रेस्क्यू टीम ने खिड़की तोड़कर उन्हें बाहर निकाला।

सोचिए बाहर पूरी दुनिया मान चुकी थी कि शायद अब कोई नहीं बचा होगा। लेकिन मलबे और अंधेरे के बीच कहीं जिंदगी अभी भी सांस ले रही थी।

नेपाल सरकार के 5 सितंबर के अपडेट के मुताबिक इस आपदा में अब तक 1344 शव बरामद किए जा चुके हैं और करीब 5000 लोग अभी भी लापता हैं। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की सुरंगों में अब भी लोगों के फंसे होने की आशंका है।

इसीलिए रेस्क्यू टीमें अभी रुक नहीं रही हैं।

क्योंकि जब तक किसी सुरंग से आखिरी आवाज नहीं आ जाती तब तक उम्मीद खत्म नहीं होती। मलबा कितना भी गहरा हो जिंदगी की तलाश उससे भी गहरी होती है।

डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स, नेपाल सरकार के अपडेट और विभिन्न समाचार स्रोतों पर आधारित है। इसमें दी गई संख्या और जानकारी समय के साथ बदल सकती है। इस पोस्ट का उद्देश्य केवल जानकारी साझा करना है।

टाइगर ऑफ राजवार - कर्नल आशुतोष शर्मा की अमर शहादतभारतीय सेना का इतिहास ऐसे जांबाज अफसरों की कहानियों से भरा पड़ा है जिन्...
08/09/2026

टाइगर ऑफ राजवार - कर्नल आशुतोष शर्मा की अमर शहादत

भारतीय सेना का इतिहास ऐसे जांबाज अफसरों की कहानियों से भरा पड़ा है जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। एक ऐसा ही नाम है कर्नल आशुतोष शर्मा जिन्हें कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के लिए खौफ का दूसरा नाम और सेना में प्यार से टाइगर ऑफ राजवार कहा जाता था।

2 मई 2020 को हंदवाड़ा में नागरिकों की जान बचाते हुए कर्नल आशुतोष ने जो सर्वोच्च बलिदान दिया उसने पूरे देश की आंखें नम कर दी थीं।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले आशुतोष शर्मा का बचपन से ही एकमात्र सपना था भारतीय सेना की वर्दी पहनना। लेकिन यह राह आसान नहीं थी। वे लगातार असफलताओं का सामना करते रहे लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आखिरकार अपने 13वें प्रयास में उन्होंने सर्विस सिलेक्शन बोर्ड का इंटरव्यू पास किया। साल 2001 में वे सेना की प्रतिष्ठित गार्ड्स रेजिमेंट में बतौर अधिकारी कमीशन हुए। उनका यह संघर्ष आज देश के लाखों डिफेंस एस्पिरेंट्स के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।

कर्नल आशुतोष उन चुनिंदा सैन्य अधिकारियों में से थे जो बंकर में बैठकर आदेश देने के बजाय खुद बंदूक थामकर सबसे आगे चलते थे। कश्मीर घाटी में आतंक विरोधी अभियानों में उनकी बहादुरी के लिए उन्हें तीन बार सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

पहला सेना मेडल 2018 में घाटी में सफल आतंकवाद विरोधी अभियानों के कुशल नेतृत्व के लिए।
दूसरा सेना मेडल 2019 में जब एक कुख्यात आतंकी अपने कपड़ों में ग्रेनेड छिपाकर जवानों की तरफ बढ़ रहा था तो कर्नल आशुतोष ने अपनी जान की परवाह किए बिना पॉइंट ब्लैंक रेंज पर जाकर उस आतंकी को ढेर कर दिया और अपने साथियों को बचा लिया।
तीसरा सेना मेडल 2020 में मरणोपरांत हंदवाड़ा में अदम्य साहस और शहादत के लिए।

उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के चंजीमुल्ला हंदवाड़ा इलाके में लश्कर ए तैयबा के आतंकियों ने एक घर में स्थानीय नागरिकों को बंधक बना लिया था। कर्नल आशुतोष अपनी 21 राष्ट्रीय राइफल्स टीम के साथ तुरंत मौके पर पहुंचे। चूंकि अंदर नागरिक फंसे थे इसलिए सेना भारी हथियारों का इस्तेमाल नहीं कर सकती थी। कर्नल आशुतोष ने खुद अपनी टीम के साथ उस घर के भीतर घुसने का फैसला किया।

कर्नल और उनकी टीम ने सूझबूझ से घर के अंदर फंसे सभी नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। नागरिकों को बचाने के बाद आतंकियों के साथ आमने सामने की भीषण गोलाबारी शुरू हुई। कर्नल आशुतोष और उनके जांबाजों ने लश्कर ए तैयबा के टॉप कमांडर हैदर समेत आतंकियों को मार गिराया। इस भीषण मुठभेड़ में कर्नल आशुतोष शर्मा, मेजर अनुज सूद, नायक राजेश कुमार, लांस नायक दिनेश सिंह और जम्मू कश्मीर पुलिस के सब इंस्पेक्टर शकील काजी देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। वह पिछले 5 वर्षों में घाटी में शहीद होने वाले पहले कमांडिंग ऑफिसर थे।

कर्नल आशुतोष की शहादत के बाद उनकी पत्नी पल्लवी शर्मा और परिवार ने जो हिम्मत दिखाई उसने पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। एक इंटरव्यू में पल्लवी जी ने बताया कि कर्नल आशुतोष अक्सर उनसे कहते थे मुझे अपनी यूनिट के 1500 जवानों की देखभाल करनी है, मुझे पूरा भरोसा है कि तुम पीछे से परिवार को अच्छे से संभाल लोगी। पल्लवी शर्मा ने गर्व से कहा शहादत का यह गम असहनीय है लेकिन मुझे गर्व है कि मेरे पति ने कायरों की तरह पीठ नहीं दिखाई बल्कि नागरिकों को बचाते हुए अपनी वर्दी का मान रखा। कर्नल आशुतोष अपनी बेटी तमन्ना को भी सेना की वर्दी में देखना चाहते थे।

कर्नल आशुतोष शर्मा आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं लेकिन उनका जीवन, देश के प्रति उनका समर्पण और कर्तव्य के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का जज्बा हर भारतीय के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा।

जय हिंद, जय भारत।

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7 सितंबर - नीरजा भनोट जयंती - साहस की अमर कहानी5 सितंबर 1986 की सुबह कराची एयरपोर्ट पर पैन एम फ्लाइट 73 को आतंकियों ने ह...
08/09/2026

7 सितंबर - नीरजा भनोट जयंती - साहस की अमर कहानी

5 सितंबर 1986 की सुबह कराची एयरपोर्ट पर पैन एम फ्लाइट 73 को आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था। नीरजा चाहती तो शुरुआत में ही पायलटों की तरह विमान से बाहर निकल सकती थीं लेकिन उन्होंने आखिरी सांस तक अपनी ड्यूटी को चुना।

आतंकियों के घुसते ही नीरजा ने तुरंत सूझबूझ से हाईजैक कोड दबा दिया। नतीजा यह हुआ कि पायलट तुरंत विमान छोड़कर सुरक्षित बाहर निकल गए जिससे विमान जमीन पर ही रुका रहा और आतंकी उसे उड़ा नहीं पाए।

आतंकियों का मुख्य निशाना अमेरिकी यात्री थे। जब उन्होंने पासपोर्ट इकट्ठा करने को कहा तो नीरजा और उनके क्रू ने चालाकी से अमेरिकी पासपोर्ट्स को सीटों के नीचे और कचरे के डिब्बे में छुपा दिया जिससे आतंकी उन्हें ढूंढ नहीं पाए।

17 घंटे के खूनी ड्रामे के बाद जब विमान में अंधेरा छा गया और आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू की तब नीरजा ने भागने के बजाय आपातकालीन दरवाजा खोला और यात्रियों को बाहर निकालने लगीं।

तीन बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालते समय वो आतंकियों की गोलियों की चपेट में आ गईं। खुद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने उन बच्चों को विमान से नीचे सुरक्षित स्लाइड कराया और फिर दम तोड़ दिया।

इस सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया। वह यह सम्मान पाने वाली पहली महिला और सबसे कम उम्र की भारतीय नागरिक हैं। उन्हें अमेरिका और पाकिस्तान से भी अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

सैकड़ों जिंदगियां बचाने वाली भारत की इस वीर बेटी की शहादत और हौसले को शत शत नमन।

जय हिंद।

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कारगिल का हीरो जिसने 25 साल की उम्र में देश के लिए सब कुछ दे दिया - कैप्टन हनीफ उद्दीनसाल 1999 की वो तपती गर्मियां थीं ज...
08/09/2026

कारगिल का हीरो जिसने 25 साल की उम्र में देश के लिए सब कुछ दे दिया - कैप्टन हनीफ उद्दीन

साल 1999 की वो तपती गर्मियां थीं जब पूरा देश क्रिकेट वर्ल्ड कप के रोमांच में डूबा हुआ था। लेकिन उसी वक्त देश की उत्तरी सीमाओं पर लगभग 18,000 फीट की बर्फीली ऊंचाइयों पर भारत के कुछ जांबाज एक अलग ही जंग लड़ रहे थे। यह जंग थी कारगिल युद्ध।

इसी जंग में एक 25 साल का नौजवान भी था जिसने अपनी बहादुरी से इतिहास लिख दिया। नाम था कैप्टन हनीफ उद्दीन।

कैप्टन हनीफ का जन्म 23 अगस्त 1974 को दिल्ली में हुआ था। जब वे महज 8 साल के थे तब उनके पिता का निधन हो गया। उनकी मां श्रीमती हेमा अजीज जो एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका हैं, ने अकेले ही हनीफ और उनके दो भाइयों की परवरिश की।

बचपन से ही हनीफ बहुत स्वाभिमानी थे। एक बार स्कूल में उन्हें मुफ्त यूनिफॉर्म मिल रही थी तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि हम जरूरतमंद नहीं हैं, यह किसी ऐसे बच्चे को दी जाए जिसे इसकी ज्यादा जरूरत हो।

कैप्टन हनीफ को संगीत विरासत में मिला था। वे सेना में भी अपनी टुकड़ी के साथियों के लिए अक्सर गिटार बजाकर गाना गाया करते थे। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर रवाना होने से ठीक पहले उन्होंने अपने साथियों के लिए अपना पसंदीदा गाना गुनगुनाया था - अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू कहां खत्म।

दिल्ली के शिवाजी कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने देश सेवा का रास्ता चुना। 7 जून 1997 को हनीफ 11वीं बटालियन राजपुताना राइफल्स में अफसर के रूप में शामिल हो गए।

जब हनीफ का IMA के लिए सिलेक्शन हुआ तो वे अपनी मां के पास एक बॉन्ड पर दस्तखत कराने गए। जब उनकी मां ने वो बॉन्ड पढ़ना शुरू किया तो हनीफ ने हंसते हुए कहा इसमें लिखा है कि अगर मुझे ट्रेनिंग के दौरान कुछ हो गया तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। उनकी मां ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया भारतीय सेना में जाना तुम्हारा सपना रहा है, मैं तुम्हें रोकूंगी नहीं।

जून 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन हनीफ की यूनिट को लद्दाख के टरटुक क्षेत्र में तैनात किया गया। उन्हें लगभग 18,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित पॉइंट 5590 पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। इस मिशन को नाम दिया गया था ऑपरेशन थंडरबोल्ट।

6 जून 1999 को अपनी बटालियन के जयकारे रामचंद्र की जय के साथ कैप्टन हनीफ और उनकी टुकड़ी आगे बढ़ी। अचानक दुश्मन ने भारी गोलीबारी शुरू कर दी। कैप्टन हनीफ बुरी तरह घायल हो गए लेकिन उन्होंने पीछे हटने से साफ मना कर दिया। उन्होंने घायल होने के बावजूद लगातार फायरिंग जारी रखी ताकि उनके साथी सैनिक सुरक्षित बाहर निकल सकें।

जिस समय हनीफ शहीद हुए उस समय उनकी उम्र मात्र 25 साल थी। उन्हें भारतीय सेना में आए हुए सिर्फ दो साल हुए थे।

शहादत के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई। भारतीय सैनिकों ने हनीफ के पार्थिव शरीर को अपनी तरफ लाने की भरपूर कोशिश की लेकिन लगातार फायरिंग ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। उनके शव को लाने के दो प्रयास और किए गए लेकिन सफलता नहीं मिली।

जब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी पी मलिक ने उनकी मां हेमा अजीज को फोन किया और कहा कि दुश्मन की लगातार फायरिंग की वजह से हम हनीफ के शव को वापस नहीं ला पाए हैं तो उस वीर मां ने जो कहा उसने पूरी सेना का दिल जीत लिया। मां ने कहा मैं नहीं चाहती कि मेरे बेटे के शव को वापस लाने के लिए कोई और सैनिक अपनी जिंदगी जोखिम में डाले। जब लड़ाई खत्म हो जाएगी तो मैं उस जगह पर जाना चाहूंगी जहां मेरे बेटे ने अंतिम सांस ली थी।

हनीफ की शहादत के 43 दिन बाद कैप्टन एस के धीमान और मेजर संजय विश्वास राव और उनके साथी कठिन रास्ते पर चलते हुए उस जगह पर पहुंचे जहां हनीफ ने अपने प्राण त्यागे थे। उन्हें दूर से ही हनीफ और उनके साथी का पार्थिव शरीर दिखाई दे गया जो बर्फ से जम चुका था। वो लोग उन दोनों के पार्थिव शरीर को कंधे पर लादकर पूरी रात चलते रहे तब जाकर नीचे लाए और सम्मान सहित अंतिम विदाई हुई।

कैप्टन हनीफ उद्दीन की इस अद्वितीय बहादुरी के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया। यही नहीं भारतीय सेना ने उनके सम्मान में कारगिल के उस पूरे टरटुक क्षेत्र का नाम बदलकर सब सेक्टर हनीफ रख दिया। इतिहास में इस पूरी जंग और जीत को ऑपरेशन हनीफ के रूप में भी याद किया जाता है।

कैप्टन हनीफ उद्दीन जैसे नायक रोज रोज पैदा नहीं होते। वे एक ऐसे सैनिक थे जो आखिरी सांस तक देश के लिए लड़ते रहे। आज पूरा देश उनकी शहादत और उनकी मां के त्याग को सलाम करता है।

जय हिंद, जय भारत।

डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी, मीडिया रिपोर्ट्स और भारतीय सेना से जुड़े प्रकाशित स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी और प्रेरणा साझा करना है। हमारा इरादा किसी भी तथ्य को बढ़ा चढ़ाकर पेश करना नहीं है। यदि किसी तथ्य में त्रुटि हो तो सूचित किया जा सकता है।

"ये आकाशवाणी है... अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए" अगर भारतीय रेडियो के इतिहास में किसी एक आवाज़ को 'दहाड़' (The...
08/09/2026

"ये आकाशवाणी है... अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए" अगर भारतीय रेडियो के इतिहास में किसी एक आवाज़ को 'दहाड़' (The Roar) कहा जा सकता है, तो वो आवाज़ थी देवकी नंदन पांडे की।
वे सिर्फ एक न्यूज़रीडर नहीं थे, वे उस दौर में भारत सरकार की सबसे 'आधिकारिक आवाज़' (Official Voice) थे।
क्यों उन्हें 'भीष्म पितामह' कहा जाता है?
गंभीर और वजनदार आवाज़:
उनकी आवाज़ में एक ऐसा गुरुत्वाकर्षण (Gravity) था कि जब वे बोलते थे, तो लगता था कि कोई बहुत महत्वपूर्ण बात कही जा रही है। 1948 से लेकर दशकों तक, देश की हर बड़ी खबर—चाहे वो गांधी जी की हत्या हो, नेहरू जी का निधन, या युद्ध की घोषणा—देश ने सबसे पहले उन्हीं की आवाज़ में सुनी।
घड़ी मिलाने वाली आवाज़:
कहा जाता है कि सुबह 8 बजे जब उनका बुलेटिन शुरू होता था, तो लोग अपनी घड़ियाँ मिलाते थे। उनकी पाबन्दी और उच्चारण (Pronunciation) इतना सटीक था कि उसमें एक सेकंड या एक मात्रा की भी गलती की गुंजाइश नहीं होती थी।
एक अनोखा किस्सा:
वे इतने विश्वसनीय थे कि संजय गांधी के निधन (1980) के समय, देवकी नंदन पांडे जी रिटायर हो चुके थे। लेकिन प्रशासन ने विशेष रूप से उन्हें घर से बुल्वाया, क्योंकि उनका मानना था कि इतनी बड़ी और दुखद खबर अगर पांडे जी की भारी आवाज़ में नहीं जाएगी, तो शायद लोगों को यकीन नहीं होगा।
आज की तेज़-तर्रार मीडिया के दौर में, देवकी नंदन पांडे की वो 'ठहरी हुई' और 'दमदार' आवाज़ एक सुनहरी याद बनकर रह गई है।

ठेकुआ - बिहार और झारखंड की मिठास और परंपरा का प्रतीकठेकुआ बिहार और झारखंड की संस्कृति में गहराई से बसा एक पारंपरिक मीठा ...
08/09/2026

ठेकुआ - बिहार और झारखंड की मिठास और परंपरा का प्रतीक

ठेकुआ बिहार और झारखंड की संस्कृति में गहराई से बसा एक पारंपरिक मीठा नाश्ता है जिसे अक्सर छठ पूजा जैसे त्योहारों पर बनाया जाता है। यह एक कुरकुरा, डीप फ्राइड कुकी जैसा व्यंजन है जो गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी, घी से बनता है और इसमें इलायची या सौंफ के बीज का स्वाद भी मिलाया जाता है। ठेकुआ अपनी देहाती बनावट, खास आकार, अक्सर लकड़ी के सांचे से बनाए गए जटिल डिजाइन और लंबे समय तक खराब न होने की वजह से जाना जाता है। यही वजह है कि यह धार्मिक समारोहों में प्रसाद और चाय के साथ पसंदीदा नाश्ता बन जाता है।

झटपट ठेकुआ बनाने की विधि:

1. आटा गूंथना: 2 कप गेहूं का आटा, आधा कप गुड़, 2 से 3 चम्मच पानी में पिघला हुआ या चीनी, एक चौथाई कप घी, 1 छोटा चम्मच इलायची पाउडर और 2 बड़े चम्मच कसा हुआ नारियल, अगर चाहें तो मिलाएं। थोड़ा थोड़ा पानी डाल कर सख्त आटा गूंथ लें।

2. आकार देना: आटे को छोटी छोटी लोइयों में बांट लें। हर लोई को चपटा करके लगभग चौथाई इंच मोटी टिक्की बना लें और सांचे या कांटे से दबा कर डिजाइन बना दें।

3. तलना: मध्यम गरम घी या तेल में दोनों तरफ से सुनहरा भूरा और कुरकुरा होने तक तलें। फिर निकाल कर अतिरिक्त तेल हटा दें।

4. परोसना: पूरी तरह ठंडा होने दें और एयरटाइट डिब्बे में स्टोर करें। चाय के साथ या त्योहार के प्रसाद के रूप में इसका आनंद लें।

ठेकुआ अगर घी की जगह तेल से बनाया जाए तो पूरी तरह शाकाहारी होता है। यह शकरपारा जो मैदा और चीनी की चाशनी से बनता है और गुझिया से बिल्कुल अलग है। गुड़ की मिठास और कुरकुरी बनावट इसे बिहारी घरों में उत्सवों का मुख्य व्यंजन बनाती है।



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डिस्क्लेमर: यह रेसिपी सामान्य जानकारी के लिए है। सामग्री की मात्रा और तलने का समय अपने स्वाद और जरूरत के अनुसार बदल सकते हैं।

शेर अफगान - नूर जहां के पहले शौहर और मुगल दरबार का बहादुर योद्धामुगल इतिहास का वो बहादुर योद्धा जिसकी कहानी नूर जहां की ...
07/09/2026

शेर अफगान - नूर जहां के पहले शौहर और मुगल दरबार का बहादुर योद्धा

मुगल इतिहास का वो बहादुर योद्धा जिसकी कहानी नूर जहां की छवि में चमकती है, शेर अफगान खान। अली कुली इस्ताजलू के नाम से जन्मे शेर अफगान एक फारसी प्रवासी थे जो ईरान के सफाविद सल्तनत से कंधार और फिर हिंदुस्तान आए। मेवाड़ के राणा के खिलाफ जंग में अपनी बहादुरी के लिए बादशाह जहांगीर, तब प्रिंस सलीम ने उन्हें शेर अफगान यानी शेर को हराने वाला का खिताब दिया।

1594 में अकबर ने उनकी शादी मेहर उन निसा, बाद में नूर जहां से कराई। 1605 में जहांगीर के दौर में उन्हें बर्दवान, पश्चिम बंगाल का जागीरदार बनाया गया। 1607 में बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन खान कोका के साथ टकराव में उनकी मौत हो गई, जिसके बाद मेहर उन निसा ने जहांगीर से निकाह किया और नूर जहां के नाम से मुगल सल्तनत की ताकतवर मलिका बनीं। उनकी बेटी मेहर उन निसा बेगम ने जहांगीर के बेटे शाहरियार से शादी की जो शाहजहां के भाई थे।

बर्दवान में पीर बहराम के मकबरे के पास शेर अफगान और कुतुबुद्दीन की मजारें आज भी मुगल इतिहास की कहानी सुनाती हैं। उनकी बहादुरी और नूर जहां के साथ उनकी कहानी इतिहास के पन्नों में अमर है।



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डिस्क्लेमर: यह पोस्ट ऐतिहासिक स्रोतों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। इतिहास से जुड़ी घटनाओं और तिथियों को लेकर अलग अलग स्रोतों में मतभेद हो सकते हैं।

गोवर्धन असरानी - हंसी का वो सितारा जो हर दौर में चमकता रहाअगर किसी कलाकार ने पांच दशकों तक दर्शकों को हंसाया, रुलाया और ...
07/09/2026

गोवर्धन असरानी - हंसी का वो सितारा जो हर दौर में चमकता रहा

अगर किसी कलाकार ने पांच दशकों तक दर्शकों को हंसाया, रुलाया और सोचने पर मजबूर किया तो वो हैं गोवर्धन असरानी, जिन्हें हम सब प्यार से सिर्फ असरानी कहते हैं। उनका अभिनय ऐसा है जो पीढ़ियों को जोड़ता है।

जन्म: 1 जनवरी 1941, जयपुर, राजस्थान
तालीम: फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया FTII, पुणे
शुरुआत: हरे कांच की चूड़ियां 1967 से हिंदी फिल्मों में डेब्यू

करियर आंकड़े:
हिंदी फिल्में - 350 से ज्यादा
गुजराती फिल्में - 25 से ज्यादा, लीड रोल और चरित्र भूमिकाएं
निर्देशन - 6 फिल्में, 1974 से 1997
पुरस्कार - फिल्मफेयर अवॉर्ड बेस्ट कॉमेडियन, आज की ताजा खबर 1974 और कई मंचों पर लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान

यादगार फिल्में:
शोले 1975 - जेलर का हास्यपूर्ण किरदार, आज भी यादगार
चला मुरारी हीरो बनने 1977 - मुख्य भूमिका में
बावर्ची, नमक हराम, तपस्या, जुर्माना, लगान, हेरा फेरी, हलचल, चुप चुप के, क्यूंकि

राजेश खन्ना के साथ विशेष संबंध:
1972 से 1991 के बीच 25 फिल्मों में साथ काम किया
इनमें से 21 फिल्में हिट रहीं, एक ऐतिहासिक जोड़ी

थिएटर और शिक्षण में योगदान:
FTII में अभिनय शिक्षक के रूप में कार्य किया
ऑल इंडिया रेडियो में वॉयस आर्टिस्ट के रूप में भी काम किया

शख्सियत की झलक:
सादगी, विनम्रता और हास्य से भरपूर
अभिनय में गहराई और टाइमिंग का बेजोड़ संतुलन

गोवर्धन असरानी ने यह साबित किया है कि सच्चा कलाकार समय की सीमाओं से परे होता है। उनका योगदान सिर्फ सिनेमा नहीं, बल्कि भारतीय हास्य संस्कृति का हिस्सा है।



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डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है।

बिहार कैडर के 2010 बैच के एक अत्यंत अनुभवी और 'संकटमोचक' आईएएस (IAS) अधिकारी—डॉ. चंद्रशेखर सिंह (Dr. Chandrashekhar Sing...
07/09/2026

बिहार कैडर के 2010 बैच के एक अत्यंत अनुभवी और 'संकटमोचक' आईएएस (IAS) अधिकारी—डॉ. चंद्रशेखर सिंह (Dr. Chandrashekhar Singh)। मूल रूप से बिहार के ही रहने वाले डॉ. सिंह अपनी प्रशासनिक पकड़, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और जनता के बीच अपनी 'सुलभ' छवि के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बिहार के सबसे महत्वपूर्ण जिलों और विभागों में अपनी सेवाएँ देकर एक कुशल प्रशासक के रूप में अपनी पहचान बनाई है।
डॉ. चंद्रशेखर सिंह जी को एक ऐसे अधिकारी के रूप में पहचाना जाता है जो 'चुनौतियों' को 'अवसर' में बदलने में माहिर हैं। विशेष रूप से पटना के जिलाधिकारी (DM) के रूप में उनके कार्यकाल को उनकी कार्यकुशलता के लिए सदैव याद किया जाता है।

प्रमुख गौरवपूर्ण उपलब्धियाँ और योगदान:
* पटना के जिलाधिकारी (DM, Patna): राज्य की राजधानी के डीएम के रूप में उन्होंने लंबे समय तक सेवा की। इस दौरान उन्होंने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, मेट्रो रेल के लिए भूमि अधिग्रहण और शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
* कोविड-19 प्रबंधन: पटना में जिलाधिकारी रहते हुए उन्होंने कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन आपूर्ति, अस्पतालों में बेड के प्रबंधन और टीकाकरण अभियान का जिस कुशलता से नेतृत्व किया, उसकी हर स्तर पर सराहना हुई।
* मुजफ्फरपुर का सफल कार्यकाल: मुजफ्फरपुर के डीएम के रूप में उन्होंने 'चमकी बुखार' (AES) जैसी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती और बाढ़ प्रबंधन पर प्रभावी ढंग से काम किया। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को जमीनी स्तर पर मजबूत करने पर जोर दिया।
* पारदर्शी और जन-सुलभ प्रशासन: डॉ. सिंह अपनी 'जनता दरबार' पहल के लिए प्रसिद्ध हैं, जहाँ वे आम लोगों की शिकायतों को खुद सुनते हैं। उन्होंने सरकारी कार्यालयों में दलाली प्रथा को खत्म करने और फाइलों के निष्पादन में तेजी लाने के लिए कई कड़े कदम उठाए।
* विकास योजनाओं का क्रियान्वयन: वर्तमान में वे बिहार सरकार के महत्वपूर्ण विभागों (जैसे मुख्यमंत्री सचिवालय या अन्य प्रमुख विभाग) में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं, जहाँ वे राज्य की विकास नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
"प्रशासन की असली परीक्षा सामान्य दिनों में नहीं, बल्कि आपदा और संकट के समय होती है। जनता का भरोसा ही एक अधिकारी की सबसे बड़ी पूंजी है।" — डॉ. चंद्रशेखर सिंह जी की पूरी कार्यशैली इसी जन-सेवा के संकल्प पर आधारित है।

संक्षिप्त आंकड़े (Quick Glance):
* पहचान: 2010 बैच के आईएएस अधिकारी (बिहार कैडर)।
* विशेषता: आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ, पटना के पूर्व डीएम, निष्पक्ष और कर्मठ छवि।
* योगदान: पटना और मुजफ्फरपुर में बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार।
* विरासत: एक ऐसे अधिकारी के रूप में जिन्होंने 'राजधानी' जैसे संवेदनशील जिले को बेहद शांति और कुशलता से संभाला।
डॉ. चंद्रशेखर सिंह जी बिहार की नौकरशाही के उन विश्वसनीय स्तंभों में से हैं, जिनकी कार्यक्षमता पर सरकार और जनता दोनों को अटूट भरोसा है। उनकी निष्ठा और प्रशासनिक सूझबूझ को हमारा सादर नमन! 🙏

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