03/04/2017
भगवान श्री कृष्ण जब संधि प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के राज्य में पधारे तो भगवान के स्वागत कि बहुत सी तैयारीयां की गई.दुःशासन का भवन जो राजभवन से भी अधिक सुंदर था उसे भगवान के ठहरने के लिए खाली कर दिया गया.धृतराष्ट्र ने आदेश दिया की अश्व,गज,रथ, गौ रत्न,आभरण और जो भी वस्तुएं हमारे यहां सर्वोत्तम हों वे दुःशासन के भवन में एकत्र कर श्री द्वारिकाधीश को भेंट कर दी जाएं। परन्तु दुर्योधन के मन मे प्रेम के स्थान पर केवल दिखावा ही था l
दुर्योधन ने भगवान से कह दिया की युद्ध के बिना पांडवो को सुई के नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूंगा। कहते हैं कि “विनाशकाले विपरीत बुद्धि" दुर्योधन के पास उनके मामा खड़े थे शकुनि, जब बात नही बनी तो शकुनि के इशारे पर दुर्योधन ने भगवान को बंदी बनाना चाहा परन्तु भगवान के विशाल रूप को देखकर दुर्योधन को आभास हो गया की कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं है
तो भय से कांपते हुए दुर्योधन बोला की "वासुदेव" मुझसे पाप हो गया अतःआप मेरा अपराध क्षमाँ कर हमारा आतिथ्य स्वीकार कीजिए.भगवान बोले, दुर्योधन किसी का आतिथ्य तब स्वीकार किया जाता है जब 3 परिस्तिथियां हो-
1.भोजन खिलाने वाले के मन में भाव हो, 2.किसी के पास अभाव हो 3.अथवा किसी के लिए इतना प्रभाव हो कि मना ही न किया जा सके। भगवान बोले दुर्योधन तेरे अंदर भाव नहीं, और मेरे पास किसी चीज़ का अभाव नहीं l और मेरी दृष्टि में तेरा कोई प्रभाव भी नहीं l में तेरा कोई प्रभाव नही मानता.इसलिए तेरे घर का भोजन में नहीं करूँगा!
कहते हैं न " बिना भाव नाहिं रीझे नन्दकिशोर"भाव के बिना तो भगवान दान,धर्म,और भक्ति भी स्वीकार नही करते वे तो केवल भक्त का भाव देखते हैं.आज भगवान विदुर जी पर कृपा करने वाले है l
विदुर जी दासी पुत्र थे इसलिए राज के अभिमान में चूर दुर्योधन उसके भाई और अन्य दरबारी विदुर जी से द्वेष रखते थे इसलिए विदुर जी नगर से बाहर अपनी पत्नी के साथ एक छोटी-सी कुटिया में रहते थे l विदुर जी राजकोष से भी कभी धन नहीं लेते थे.और धरती पर ही सोया करते l भक्त विदुर जी का मन सदा प्रभु भक्ति में लगा रहता.उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ही भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन की मेवा और 56 भोग त्यागकर विदुर जी के यहाँ आतिथ्य स्वीकार कर हरा साग भी बड़े प्रेम से खाया और दुर्योधन के राजमहल के सुखों को छोड़कर विदुर जी की झोंपड़ी में रात बितायी lभगवान दुर्योधन के यहाँ से चल दिए !
महलों मे रहने वाले भगवान,सारे सुख भी जिनकी शरण लेते हैं आज वही भगवान दुर्योधन के शाही शीशमहलों को छोड़कर दासी पुत्र विदुर की झौंपड़ी में पधारे हैं.भगवान विदुर जी के द्वार पर पहुंचे.भगवान ने आवाज लगाई- काका काकी। जब विदुरानी ने आवाज सुनी तो अपनी सुध बुध खो बैठी की मेरे गोपाल आये है। निर्वस्त्र ही दरवाजे कि और दौड़ी ऐसा कहते हुए मेरे भगवान आये है. दरवाजा खोला तो भगवान ने विदुरानी को निर्वस्त्र देखा और झट से अपना पीताम्बर उढ़ा दिया। विदुरानी भगवान को अंदर लेके गई। सुध बुध खो चुकी विदुरानी ने भगवान को बिठाने के लिए चौकी बिछाई वो भी उलटी। भाव के भूखे भगवान विना कोई विचार किये ही उस उलटी चौकी पर बैठ गए। एक बार भी भगवान ने नही कहा काकी मे पहली बार तो तेरे घर आया हु और तू मुझे उलटी चौकी पर बिठा रही है। अब विदुरानी सोचने लगी की भगवान को क्या खिलाऊ और कहने लगे की लाला मे तेरा रोज इंतजार करती हूँ कि मेरा लाला कब आएगा ? रोज तेरे लिए माखन मिश्री रखती लेकिन तुम मेरे घर नहीं आये ?आज तो मैंने अब तक माखन भी नही मथा कोई व्यवस्था भी नहीं की lअब क्या खिलाऊ तुम्हे ? भगवान एक टक अपने भक्त को निहार रहे है। विदुरानी को याद आया कि केले के फल रखे हुए है। भगवान को इंतजार नहीं करवाना चाहती है कि माखन निकालू और भगवान से दूर होउ तभी उन्हें केले दिखे,और केला छीलकर केले को तो फ़ेंक देती और छिलका भगवान को खिलाने लगी ,देखो भगवान प्रेम के इतने भूखे चुपचाप छिलके ही खाये जा रहे थे l
अचानक विदुर जी आये और बोले क्या कर रही हो ? भगवान को छिलके खिला रही हो |अचानक विदुरानी का ध्यान हटा, वह शर्म से पानी पानी होने लगी और अब भगवान को केला खिलाने लगी | भगवान मुस्कराए और बोले काका मुझे छिलके में अधिक आनंद आ रहा था.उस रात भगवान विदुर के घर में ही ठहरे l उस निर्धन के पास एक चटाई ही बैठने के लिए थी और खाने के लिए केवल अलूना सरसों का साग था| वह भी हांडी में पक रहा था.भगवान के चरण पड़ते हीे विदुर की झोंपड़ी में उजाला हो गया.उसके भाग्य जाग गए| उसने प्रभु के चरण धोकर चरणामृत लिया और रात भर प्रभु की सेवा करता रहा.प्रभु के वचन सुनकर वह मुग्ध हो गया. जिनकी भक्ति करता आ रहा था.वह आज प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे आनंदित कर रहे थे !
विदुर का साग भगवान ने बड़े चाव से ऐसे खाया जैसे 56 प्रकार के भोजन खा रहे हों l उस दिन विदुर-विदुरानी स्वयं भगवान का प्रसाद पाकर उनका मन तृप्त हो गया| विदुर जी का जीवन एक तरह से मुक्त होकर भवसागर से पार हो गया.अगले दिन जब दुर्योधन ने भगवान से विदुर जी के घर रहने का कारण पूछा तो ? भगवान हंस कर बोले की दुर्योधन! विदुर की झौंपड़ी तो अति पवित्र है.विदुर राजाओं का भी राजा है.उसकी आत्मा प्रेम भक्ति के रस में डूबी हुई है.में तो केवल प्रेम देखता हूँ, जहाँ कोई मुझे प्रेम से पुकारे वहां जाता हूँ लेकिन आपके महलों में प्रेम भक्ति का वास तक नहीं,वहां तो केवल अहंकार,लोभ और राज्य की भूख है, इसलिए मुझे विदुर का प्रेम खींच कर ले गया विदुर के घर अपार श्रद्धा और प्रेम का भंडार है.में केवल भाव का भूखा हूँ l क्योंकि भक्त और भगवान के बीच केवल एक प्रेम का ही नाता है l
हरे कृष्ण !
राजाधिराज महाराज द्वारिकाधीश भगवान की जय __/\__