10/01/2026
क्या सौरभ गांगुली भारत के सर्वश्रेष्ठ कप्तान हैं? (भाग-2)
2007 विश्व कप में करारी शिकस्त के बाद महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में टीम T20 विश्व कप के लिए दक्षिण अफ्रीका में थी। भारत का सफर ऐसा था कि हर मैच do or die मुकाबले थे। स्कॉटलैंड के खिलाफ पहला मैच बारिश के कारण रद्द हो गया। दूसरे मैच में पाकिस्तान के खिलाफ जीतना जरूरी था लेकिन रनगति और जीत के मार्जिन का भी ध्यान रखना था ताकि सुपर 8 में जगह पक्की हो।
सुपर 8 में पहला मुकाबला न्यूज़ीलैंड से था और भारत को एक और हार का सामना करना पड़ा। अब आगे हार का विकल्प समाप्त हो चुका था। युवराज के एक ओवर में 6 छक्कों से सजी पारी के दम पर भारत ने इंग्लैंड पर जीत हासिल की।फिर मेजबान अफ्रीका सामने आई। भारत ने पहले खेल कर 153 बनाए। सेमीफाइनल खेलने के लिए अफ्रीका को सिर्फ 126 बनाना था, लेकिन RP singh की धारदार गेंदबाजी ने मेजबान अफ्रीका को संभलने का अवसर भी नही दिया।
सेमीफाइनल में भारत ने 188 रनों के पहाड़ खड़ा किया लेकिन हेडन और साईमंड्स ने खूंटा गाड़ दिया। मुकाबला हाथ से निकलने ही वाला था। लेकिन श्रीसंथ का हेडन को बोल्ड करना, फिर हरभजन का क्लार्क को आउट करना किसी चमत्कार से कम नही था। अंतिम 3 ओवर में 30 का लक्ष्य एक ओवर में 22 में बदल गया। और अंत में भारत को जीत भी मिली। क्रिकेट पंडित आज भी इस मुकाबले में धोनी के गेंदबाजी में परिवर्तन के फैसलों की चर्चा करते हैं।
फाइनल की कहानी के लिए अंतिम एक ओवर की चर्चा पर्याप्त है। धोनी के पास हरभजन का विकल्प था लेकिन उन्होंने गेंद थमाई एक अंजान को। बाकी जो हुआ वो इतिहास बन गया।
ये जीत किसी परियों की कहानी जैसा था, लेकिन धोनी का गेंदबाजी परिवर्तन, अपने खिलाड़ियों में भरोसा दिखाना , अपने खिलाड़ियों के पीछे खड़े रहना एक मिसाल बन गया।
दूसरी कहानी है 2002 के नेटवेस्ट ट्रॉफी के फाइनल की। पूरे टूर्नामेंट में सचिन एक बेहतरीन फॉर्म में थे। फाइनल से पहले क्या शानदार त्रिकोणीय मुकाबले हुए थे उस सीरीज में। तीनों टीम में एक से बढ़कर एक खिलाड़ी थे। एक फर्क था, भारत की बल्लेबाजी क्रम विश्व की सर्वश्रेष्ठ इकाई थी।
फाइनल में इंग्लैंड ने क्या अद्भुत खेल दिखाया। ट्रेसकोथिक और नासिर हुसैन ने शानदार शतक जमाया। लक्ष्य 325 का था और भारत हार चुकी थी। उस दौर में 325 के लक्ष्य मतलब सिर्फ था, टीम में सचिन जैसे खिलाड़ी का होना भी उम्मीद नही दे रहा था। फाइनल की लगातार हार की टीस चुभ रही थी।सिर्फ ट्रॉफी इंग्लैंड को सौंपना शेष था। TV रेडियो बंद हो चुके थे।
पूरी दुनिया में बस 11 व्यक्ति थे जो जीत के लिए खेल रहे थे और उन 11 का नेतृत्व दादा कर रहे थे। दादा की बल्लेबाजी देखकर ऐसा लगा जैसे हाथ में बल्ला नही कोई तलवार हो। सहवाग भी सहमे नजर आ रहे थे दादा का रौद्र रूप के सामने। दादा का स्ट्राइक रेट सिर्फ 139 का ही था, जो शायद उस दौर में भी कोई बहुत खतरनाक नही था , जयसूर्या जैसे बल्लेबाज उसी श्रृंखला में खेले थे। असली वजह थी दादा का आक्रामक बॉडी लैंग्वेज, चेहरे का वो भावहीन तेज जिसमें जीत के अलावा और कुछ नही दिख रहा था। दादा जैसे ये ठान कर उतरे थे कि अकेले ही लक्ष्य पार कर लेंगे। ऐसा हुआ नही, ये तेज अधिक समय न टिका। एक एक कर सारे दिग्गज पवेलियन लौट गए। जब सचिन आउट हुए तब तक उन 11 में से 9 समर्पण कर चुके थे। एक क्रिकेट प्रसंशक के रूप में मैं इस बात से परहेज नही करूंगा कि सचिन के आउट होने के बाद शायद दादा ने भी हार मान लिया गया होगा।
तो फिर क्या खास है दादा में और फिर वे कैसे भारत के सर्वश्रेष्ठ कप्तान हो सकते हैं। महेंद्र सिंह धोनी के क्रिकेट माइंड की तुलना दादा से करना भी उचित नही है। मैंदान में धोनी के फैसलों पर पूरी की पूरी बाइबिल लिखी जा सकती है। धोनी के लिए क्रिकेट एक शतरंज की बिसात थी और उस बिसात के बेताज बादशाह थे धोनी। तो क्या धोनी ही सर्वश्रेष्ठ हैं, शायद हाँ या शायद नही!
क्योंकि नेटवेस्ट के फाइनल की कहानीअभी शेष है।
कप्तान सिर्फ एक खिलाड़ी नही होता, सिर्फ एक बल्लेबाज या गेंदबाज या रणनीतिकार नही होता । सर्वश्रेष्ठ वो नही जो दूसरों से बेहतर हो, सर्वश्रेष्ठ वह है जो अपने टीम के हर एक खिलाड़ी को अजेय बना दे। दादा को शायद खुद भी अंदाजा नही होगा कि कप्तान बनने के बाद युवाओं की जो फौज तैयार की थी उन्होंने, आज उसकी अग्निपरीक्षा थी।
बल्लेबाजों की आखिरी जोड़ी मैंदान में थी। और उस दिन मोहम्मद कैफ और युवराज, सचिन और सौरभ से भी बड़े बल्लेबाज थे। क्योंकि वे खड़े थे अपनी टीम को एक असंभव जीत दिलाने के लिए। टीम के एक एक खिलाड़ी में यही विश्वास भरना ही दादा को सर्वश्रेष्ठ कप्तान बनाता है। कैफ और युवराज उस मैच में दो युवा रणबांकुरों की तरह खेले कि चाहे असंभव ही क्यों न लगे, जब तक आखिरी विकेट भी शेष है, लक्ष्य सिर्फ जीत होगा।
लॉर्ड्स के मैंदान में फाइनल मुकाबले की उस जंग ने दुनिया को भारतीय क्रिकेट की असली औकात से परिचय कराया। युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ ने इतिहास के पन्ने पर अपनी जिद्द की कलम से लिखा " भारत : नेटवेस्ट ट्रॉफी 2002 विजेता। जीत के बाद बंगाल टाइगर की दहाड़ पूरी दुनिया ने देखी। लॉर्ड्स की बालकनी में शर्ट हाथ में लेकर नचाना कोई साधारण कप्तान कर ही नही सकता था। क्रिकेट के मैंदान पर जीत का वह जुनून ही दादा को असाधारण और अजेय बनाता है। ये जुनून हार और जीत के परिभाषा से बहुत ऊपर है। ये जुनून रिकॉर्ड और ट्रॉफी की सरहदों में सिमटने वाला नही है। ये जुनून जिद्द का जुनून है, हार के अन्तिम क्षण में भी, जीत का ख्वाब देखने का जुनून है। और भारतीय क्रिकेट में उस जुनून का नाम है "सौरव चंडीदास गाँगुली"।
धोनी भारत के सबसे सफल कप्तान हैं। निःसंदेह उनकी गिनती दुनिया के सबसे सफल कप्तान में भी की जाएगी। लेकिन जब भी बात भारत के सर्वश्रेष्ठ के सर्वश्रेष्ठ कप्तान की होगी, जुबान पर सिर्फ एक ही नाम आएगा।