10/02/2017
सभी अच्छी आदतें एकदम से शुरू न किया करें।
अक्सर ये देखता हूँ काफी सब लोग जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में वर्जिश के नाम पर साल दो साल में अपने ऑफिस या घर की सोसाइटी की लिफ्ट खराब होने पर एक या दो मंज़िल सीढियां ही चढ़ी होती है ....या फिर वजन उठाने के नाम पर नहाते समय पानी का डिब्बा उठाया होता है ....।
किसी एक दिन वो "दंगल या भाग मिल्खा भाग " जैसी जोश से ओत-प्रोत मूवी देख कर अपने कुसंगठित सिलिंडर नुमा शरीर से जो की अभी तक अक्सर "जलवायु परिवर्तन सम्बंधित वायु-रूपी गैस " छोड़ने में इस्तेमाल होता रहा था उसे "छरहरा -सुन्दर-सुडौल गुरुत्वाकर्षण मुक्त " बनाने हेतु प्रण लिए अपने घर के नज़दीक स्थित कसरत-खाने की सालभर की फीस जमा करा देता है ।
उनका शुरुआती एक-दो दिन का जोश देखने लायक होता है ,वो अपने 2 quintal रुई वजनी शरीर को इस कदर तोड़ता मरोड़ता है मानो आज काम-देवता उसे मिलकर बोलेंगे दोस्त मेरे रिटायर होने पर तुम्ही मेरे कार्यभार संभालोगे .....।
वो घर की रसोई में चल रही लोकतंत्रांत्रिक व्यवस्था का तख्तापलट कर अपनी तानाशाही लागु कर सिर्फ भूरे चावल और मध्यभाग मुक्त अंडे बनाने का फरमान जारी कर देता है ।
शरीर की पाचनक्रिया की अर्थव्यवस्था अचानक हुई नोटबंधी जैसी घोषणा से एकदम से सकते में आ जाती है, ये कल तक 5 आलू -गोभी के परांठे से दिन की शुरुवात करने वाले इंसान को एकदम से क्या हो गया ।
ब्रेकफास्ट में 2 छोले भटुरे की प्लेट लंच में और 5 कचोड़ी खा खा कर शरीर का पालन पोषण करने वाले मेरे मालिक को ये क्या अंकुरित चने खा कर शरीर से पेड़-पौधे उगाना चाह रहा है ....
वो एक ही दिन में अपने 125cc इंजन क्षमता पर 2000cc वर्जिश का बोझ डाल देता है, Teddy Bear जैसे कोमल शरीर ,दर्द के मारे करहाने लगता है ....रात को सोने के लिए कई दर्द-निवारक दवाईयों का सेवन कर फिर किसी तरह रात बिताई जाती है ।
और बस यूँही 2 दिन में जोश के गुबारे की हवा निकल जाती है…..
फिर ठग्गू के लडू घर आ जाते है ….फिर गर्म कचोड़ी की याद आती है।