13/06/2026
*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।*
यह याद रखने की बात है कि जब तक जनता का, निन्दा प्रशंसा का, आदर तिरस्कार का मापदण्ड न बदलेगा तब तक गुण्डे मूंछों पर ताव देकर अपनी सफलता पर गर्व करते हुए दिन-दिन अधिक उच्छृंखल होते चलेंगे और सदाचार के कारण सीमित सफलता या असफलता प्राप्त करने वाले खिन्न और निराश रह कर सत्यपथ से विचलित होने लगेंगे। युग-निर्माण संकल्प में यह प्रबल प्रेरणा प्रस्तुत की गई है कि हम मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं एवं विभूतियों को नहीं सज्जनता और आदर्शवादिता को ही रखें।
परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे। उचित अनुचित का लाभ हानि का, निष्कर्ष निकालने और किधर चलना, किधर नहीं चलना इसका निर्णय करने के उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी के आधार पर उसकी गतिविधियां चलती भी हैं। पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन का साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है वही महत्वपूर्ण समस्या सामने आने पर कुंठित हो जाता है।
*क्रमशः* *........*
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हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....