16/06/2026
मलमास,पुर्षोत्तम मास, तिलमास, कालमास और मानसिक गुलामी
सदियों से समाज में कुछ ऐसी मान्यताएँ फैलाई गई हैं जिनका आधार तर्क, विज्ञान और प्रकृति नहीं, बल्कि अंधविश्वास और परंपरागत धारणाएँ रही हैं। मलमास, तिलमास, कालमास या किसी विशेष महीने को शुभ-अशुभ बताने की सोच भी इसी श्रेणी में आती है।
सोचिए, क्या प्रकृति ने कभी किसी दिन, महीने या तिथि को अशुभ घोषित किया है? क्या सूरज किसी दिन कम रोशनी देता है? क्या धरती किसी विशेष महीने में घूमना बंद कर देती है? क्या हवा, पानी और मौसम किसी तथाकथित अशुभ समय में अपना काम छोड़ देते हैं? नहीं। प्रकृति अपने नियमों से चलती है, उसे मनुष्यों द्वारा बनाई गई शुभ-अशुभ की धारणाओं से कोई लेना-देना नहीं है।
यदि किसी "शुभ दिन" में दुर्घटना, बीमारी, नुकसान और मृत्यु हो सकती है, तो फिर किसी "अशुभ दिन" में सफलता, जन्म, विवाह, व्यापार और खुशियाँ क्यों नहीं हो सकतीं? वास्तविकता यह है कि किसी कार्य की सफलता का संबंध हमारी तैयारी, मेहनत, ज्ञान और परिस्थितियों से होता है, न कि किसी महीने या तिथि से।
दुर्भाग्य से इन मान्यताओं ने लोगों के मन में ऐसा भय बैठा दिया है कि शिक्षित व्यक्ति भी कई बार सामाजिक दबाव या मजबूरी में इन्हें मानने लगते हैं। यही मानसिक गुलामी की पहचान है—जब व्यक्ति अपनी बुद्धि और तर्क के बजाय डर और परंपरा के आधार पर निर्णय लेने लगे।
आज आवश्यकता है कि हम विज्ञानवादी और तर्कवादी सोच अपनाएँ। हर बात को प्रश्नों की कसौटी पर परखें। जो बात प्रकृति, प्रमाण और वैज्ञानिक सोच से मेल खाती हो, उसे स्वीकार करें; और जो केवल डर, भ्रम या अंधविश्वास पर आधारित हो, उसे छोड़ दें।
समाज तब आगे बढ़ता है जब लोग सोचने का साहस करते हैं। इसलिए अंधविश्वास नहीं, विवेक अपनाइए। डर नहीं, ज्ञान को आधार बनाइए। प्रकृति के नियमों को समझिए, विज्ञान का सम्मान कीजिए और आने वाली पीढ़ियों को भी तर्क, शिक्षा और मानवता का मार्ग दिखाइए।
"शुभ-अशुभ दिन नहीं होते, शुभ-अशुभ हमारे कर्म और निर्णय होते हैं। प्रकृति हर दिन समान अवसर देती है; फर्क केवल हमारी सोच और मेहनत का होता है।" शारीरिक शिक्षक