23/03/2022
देश की सरकार भगत सिंह को शहीद नहीं मानती है , जबकि आजादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले भगतसिंह हर हिन्दुस्ता नी के दिल में बसते हैं ।
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था , जो अब पाकिस्तान में है । उस समय उनके चाचा अजीत सिंह और श्वान सिंह भारत की आजादी में अपना सहयोग दे रहे थे । ये दोनों करतार सिंह सराभा द्वारा संचालित गदर पाटी के सदस्य थे । भगत सिंह पर इन दोनों का गहरा प्रभाव पड़ा था । इसलिए ये बचपन से ही अं ग्रेजों से घृणा करने लगे थे । भगतसिंह करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय से अत्यधिक प्रभावित थे । 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला । लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने 1920 में महात्मा गांधी द्वा रा चलाए जा रहे अहिंसा आंदोलन में भाग लेने लगे , जिसमें गांधी जी विदेशी समानों का बहिष्कार कर रहे थे ।
14 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने सरकारी स्कूलों की पुस्तकें और कपड़े जला दिए। इसके बाद इनके पोस्टर गांवों में छपने लगे । भगत सिंह पहले महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन और भारतीय नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्य थे । 1921 में जब चौरा -चौरा हत्याकांड के बाद गांधी जी ने किसानों का साथ नहीं दिया तो भगत सिंह पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा । उसके बाद चन्द्रशेखरआजाद के नेतृत्व में गठित हुई गदर दल के हिस्सा बन गए।
उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया । 9 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ के लिए चली 8 नंबर डाउन पैसें जर से काकोरी नामक छोटे से स्टेशन पर सरकारी खजाने को लूट लिया गया । यह घटना काकोरी कांड नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है । इस घटना को अंजाम भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और प्रमुख क्रांतिकारियों ने साथ मिलकर अंजाम दिया था ।
काकोरी कांड के बाद अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के क्रांतिकारियों की धरपकड़ तेज कर दी और जगह-जगह अपने एजेंट्स बहाल कर दिए। भगत सिंह और सुखदेव लाहौर पहुंच गए। वहां उनके चाचा सरदार किशन सिंह ने एक खटाल खोल दिया और कहा कि अब यहीं रहो और दूध का कारोबार करो ।
वे भगत सिंह की शादी कराना चाहते थे और एक बार लड़की वालों को भी ले कर पहुंचे थे । भगतसिंह कागज-पेंसिल ले दूध का हिसाब करते , पर कभी हिसाब सही मिलता नहीं । सुखदेव खुद ढेर सा रा दूध पी जाते और दूसरों को भी मुफ्त पिलाते ।
क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेंट्रल असेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे । भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशीरल विचारक, कलम के धनी , दार्शनिक, चिंतक, लेखक, पत्रकार
और महान मनुष्य थे । उन्होंने 23 वर्ष की छोटी -सी आयु में फ्रांस, आयरलैं ड और रूस की क्रांतिका विषद अध्ययन किया था । हिन्दी , उर्दू, अंग्रे जी , संस्कृत, पंजाबी , बंगला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ चिंतक और विचारक भगतसिंह भारत में समाजवाद के पहले व्याख्याता थे । भगत सिंह अच्छे वक्ता , पाठक और लेखक भी थे । उन्होंने 'अकाली ' और 'कीर्ति ' दो अखबारों का संपादन भी किया ।
जेल में भगत सिंह ने करीब दो साल रहे । इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे । जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा । उस दौरान उनके लिखे गए लेख व परिवार को लिखे गए पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं ।अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया है । उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो , वह उनका शत्रु है । उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था 'मैं नास्तिक क्यों हूं '? जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हड़ताल की । उनके एक सा थी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिए थे ।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई।