Chetan bhanwardas

Chetan bhanwardas astrology, mantra, yoga, spirituality & austerity, nature love, pujari

12/05/2026

"ब्रह्मबीज समुत्पन्नो मन्त्र संस्कार वर्जित:।
जाति मात्रोपजीवी च स भवेत् ब्राह्मण: सम:।।"

#ब्राह्मणत्व
#पूजनीय
#वेदपाठी
#महाभारत

02/05/2026

जाति हमारी आत्मा, गौत्र हमारा ब्रह्म।
सत्य हमारा पिता है, मुक्ति हमारा धर्म ||

#गौत्र
#मॉडर्न_जेनेटिक्स
#ऋषि_परम्परा
#डीएनए

14/04/2026

शास्त्र निर्णय अनुसार युगादि तिथियों का अनुष्ठान कृष्ण पक्ष की तिथियों में अपराह्न काल में तथा शुक्ल पक्ष की तिथियों में पूर्वाह्न काल में किया जाता है। इस नियमानुसार वैशाख शुक्ल तृतीया पूर्वाह्न व्यापिनी जिस दिन होगी, उसी दिन अक्षय तृतीया मनाई जायेगी। परन्त् यदि तृतीया तिथि दो दिन पूर्वाह्न व्यापिनी हो तो अक्षया तृतीया को दूसरे दिन उसी स्थिति में मनाने के शास्त्रादेश मिलते हैं कि दूसरे दिन त्रिमुहूर्त (अर्थात् 6 घटी) या उससे अधिक काल की तृतीया तिथि विद्यमान रहे। यदि इससे (6 घटी) कम काल की तृतीया रहे तो पहले दिन ही अक्षय तृतीया मनाई जानी चाहिये।

"द्वेधाविभक्त-दिन-पूर्वार्धैक देश-व्यापिनी दिनद्वये चेत् त्रिमुहूर्त्ताधिक व्याप्तिसत्वे परा,
त्रिमुहूर्त्त न्यूनत्वे पूर्वा।" - (धर्मसिन्धुः)

इस प्रमाणानुसार दिनाक 20 अप्रैल, सोमवार को तृतीया तिथि मात्र 3 घटी 35 पल होने से त्रिमुहूर्त व्यापिनी नहीं बन पा रही है। अतः अक्षया ततीया पर्व दि

राम मंदिर रक्षक पं देविदीन पांडेपंडित देवीदीन जो सनेथू गाव अयोध्या के रहने वाले थे जिनका जन्म सर्युपारी ब्राह्मण परिवार ...
15/04/2023

राम मंदिर रक्षक पं देविदीन पांडे
पंडित देवीदीन जो सनेथू गाव अयोध्या के रहने वाले थे जिनका जन्म सर्युपारी ब्राह्मण परिवार में हुआ था जो की एक कर्मकांडी पुरोहित थे लेकिन जब बाबर की सेना ने सभी हिंदू राजाओं को हराते हुए राम मंदिर की तरफ बढ़ी तब ,श्री भगवान परशुराम की तरह ही पंडित देविदीन पांडे ने पुरोहित का काम छोड़कर आसपास के ब्राह्मण क्षत्रियों को लेकर बाबर सेना के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए हथियार उठा लिया ,और बाबर के खिलाफ मीर बाकी के नेतृत्व में मुगलों के सेना से युद्ध किया, ये युद्ध इतना विकराल था की युद्ध करते समय पंडित जी ने 700 मुगलों को अपने हाथों से काट डाला। एक मुगल सैनिक की तलवार के वार से ऐसा हुआ कि देविदीन जी का सर दो भागों में फट कर खुल गया लेकिन उन्होंने अपने गमछे से सर को बांधकर लड़ाई लड़नी शुरू कर दी और अंत में एक सैनिक के द्वारा किए गए वार से काफी घायल हो गए और वहीं पर वीरगति को प्राप्त हुए ! उस सेना के सेनापति देविदीन के वीरगति प्राप्त हो जाने के बाद बाबर की सेना जीत गई !
देविदीन ने अपने जीवित रहते राम मंदिर को आंच नहीं आने दी!

इतिहासकार कनिंघम अपने 'लखनऊ गजेटियर' के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखते हैं कि 1,74,000 हिन्दुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीर बाकी अपने मंदिर ध्वस्त करने के अभियान में सफल हुआ।

यदि हमारे पूर्वजो को हवाई जहाज बनाना नहीं आता, तो हमारे पास "विमान" शब्द भी नहीं होता। यदि हमारे पूर्वजों को Electricity...
06/02/2023

यदि हमारे पूर्वजो को हवाई जहाज बनाना नहीं आता, तो हमारे पास "विमान" शब्द भी नहीं होता।

यदि हमारे पूर्वजों को Electricity की जानकारी नहीं थी, तो हमारे पास "विद्युत" शब्द भी नहीं होता।

यदि "Telephone" जैसी तकनीक प्राचीन भारत में नहीं थी तो, "दूरसंचार" शब्द हमारे पास क्यो है।

Atom और electron की जानकारी नहीं थी तो अणु और परमाणू शब्द कहा से आए।

Surgery का ज्ञान नहीं था तो, "शल्य चिकितसा" शब्द कहा ये आया।

विमान, विद्युत, दूरसंचार , ये शब्द स्पष्ट प्रमाण है, कि ये तकनीक भी हमारे पास थी।

फिसिक्स के सारे शब्द आपको हिन्दी में मिल जाएगे।

बिना परिभाषा के कोई शब्द अस्तित्व में रह नहीं सकता।

सौरमंडल में नौ ग्रह है व सभी सूर्य की परिक्रमा लगा रहे है, व बह्ममांड अनंत है, ये हमारे पूर्वजो को बहुत पहले से पता था। रामचरित्र मानस में काक भुशुंडि - गरुड संवाद पढिए, बह्ममांड का ऐसा वर्णन है, जो आज के विज्ञान को भी नहीं पता।

अंग्रेज जब 17-18 सदी में भारत आये तभी उन्होने विज्ञान सीखा, 17 सदी के पहले का आपको कोई साइंटिस्ट नहीं मिलेगा,

17 -18 सदी के पहले कोई अविश्कार यूरोप में नहीं हुआ, भारत आकर सीखकर, और चुराकर अंग्रेजो ने अविश्कार करे।

भारत से सिर्फ पैसे की ही लूट नहीं हुई, ज्ञान की भी लूट हुई है।

वेद ही विज्ञान है और हमारे ऋषि ही वैज्ञानिक हैं ।

04/01/2023

दुनिया का पहला हवाई जहाज बनाने वाला राइट ब्रदर्स नहीं बल्कि एक भारतीय था... 🙏😎🛫

आपको बस यह पता है कि राइट ब्रदर्स ने अमेरिका के कैरोलीन तट पर 17 दिसम्बर सन् 1903 को यह कारनामा किया था, और उनका बनाया हवाई जहाज करीब 120 फीट की ऊँचायी तक उड़ कर गिर गया था। क्योंकि हमें यही पढ़ाया गया है लेकिन सच्चायी यह है कि एक भारतीय कई वर्षों पहले यह कारनामा कर चुका था। जिन्होंने सन् 1895 में बहुत बड़ा विमान बनाया था और उसे मुम्बई की चौपाटी के समुद्र तट पर उड़ाया था। यह हवाई जहाज 1500 फिट ऊपर उड़ा और तब नीचे आया था। इनका नाम “ शिवकर बापूजी तलपड़े" था ,जो मुम्बई के चिरा बाजार के रहने वाले थे और मुम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के अध्यापक व वैदिक वैदिक विद्वान थे। उन्होंने महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखे विमान शास्त्र नामक पुस्तक पढ़कर ऐसा किया था, जिसके 8 अध्याय में विमान बनाने की तकनीक का वर्णन है।

इस विमान का नाम शिवकर बापूजी तलपड़े ने 'मरुत्सखा' रखा था जिसका अर्थ 'हवा का मित्र' होता है। इस घटना को बाल गंगाधार तिलक ने अपने पंजाब केसरी के सम्पादकीय में भी जगह दी थी, साथ ही इस मौके पर दो अंग्रेज़ पत्रकार भी वहाँ मौजूद थे, और लन्दन के अखबारों में भी यह खबर छपी थी। तत्कालीन भारतीय जज महादेव गोविन्दा रानाडे और बरोडा के राज सय्याजी राव गायकवाड़ भी इस घटना के गवाह रहे थे।

18 वीं सदी से पहले पूरे विश्व में हवाई जहाज की कोई कल्पना भी नहीं थी, जब अंग्रेज़ भारत में आये तो उन्होंने हमारे धर्म ग्रन्थों को पढ़ने समझने के लिये संस्कृत सीखी।

लार्ड मकौले ने 25 वर्ष तक संस्कृत में हिन्दू ग्रन्थों का अध्यन किया। भारत को ज्ञान रूप से इतना समृद्ध देख कर उसको विश्वास हो गया कि बौद्धिक ज्ञान-विज्ञान की समृद्धि के वजह से वो लम्बे समय तक भारत को गुलाम बनाने में असफल रहेंगे.. अतः उसने हमारे धर्म ग्रन्थों में मिलावट तथा झूठी बातों का प्रचार प्रसार करना शुरू किया और राम और पुष्पक विमान को कोरी कल्पना कहना शुरू कर दिया। वो कहते कि दिखाओ कहा कुछ हवा में उड़ता है,यह रामायण काल्पनिक है।

शिवकर बापूजी तलपड़े ने इस कथित कल्पना को सत्य सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और अंग्रेज़ों के सामने गुलामी के काल में ही अपने संस्कृत व वेद-उपनिषद के ज्ञान से विश्व का सबसे पहला हवाई जहाज बना के दिखा दिया था।

लेकिन इस घटना के बाद वे हमेशा अंग्रेज़ों के नज़रों में खटकते रहे और उनकी साज़िशों का शिकार होकर गुमनाम हो गये...!

जय सनातन जय हिन्द 🙏

साभार..

13/02/2021

महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है .... !!

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी .... !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में *द्वापर का सबसे महान योद्धा* *"देवव्रत" (भीष्म पितामह)* शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था -- अकेला .... !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , "प्रणाम पितामह" .... !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , " आओ देवकीनंदन .... ! स्वागत है तुम्हारा .... !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" .... !!

कृष्ण बोले , "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" .... !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... !

कृष्ण चुप रहे .... !

भीष्म ने पुनः कहा , "कुछ पूछूँ केशव .... ?
बड़े अच्छे समय से आये हो .... !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !!

कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ....!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न .... ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ... मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ईश्वर नहीं ...."

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... ! बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! "

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले .... " कहिये पितामह .... !"

भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?"

"किसकी ओर से पितामह .... ? पांडवों की ओर से .... ?"

" कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था .... ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या .... ? यह सब उचित था क्या .... ?"

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह .... !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ..... !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन .... !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !!

"अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण .... !"

"तो सुनिए पितामह .... !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ .... !
वही हुआ जो हो होना चाहिए .... !"

"यह तुम कह रहे हो केशव .... ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ..... ? "

*"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !*

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!"

" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !"

" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... !
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"

"तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??"

*" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !*

*कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... !*

*वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा .... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !*

*जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह* .... !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय .... !

*भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह* ..... !!"

"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?"

*"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !*

*ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !*केवल मार्ग दर्शन करता है*

*सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है .... !*
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
यही प्रकृति का संविधान है .... !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से .... ! यही परम सत्य है ..... !!"

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे .... !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... !
उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण .... !"

*कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था* .... !

*जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।*

*धर्मों रक्षति रक्षितः* 🚩🚩

13/02/2021

माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली,सीता जी बड़े गौर स सब देख रही थी।
ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया। लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा 'अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा'।
लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुचकर माँ सीता जी को बुलवाया ।
फिर उन्होंने सीताजी जे कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था ।
आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना।
आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना।
इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी।

तृण धर ओट कहत वैदेही।
सुमिरि अवधपति परम् सनेही।।

यही है उस तिनके का रहस्य !
इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर सकती थी, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही !
ऐसी विशलहृदया हैं जानकी माता !!
*।। जय जय सीताराम ।। 🌹🌹🌹*

05/02/2021

हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है। परंतु ऐसा कुछ नहीं है!
ये केवल झुठ फ़ैलाया जाता है।ये नितांत असत्य है .......

"हिन्दू"* शब्द की खोज -
*"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः से हुई है।”*

*अर्थात* जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

'हिन्दू' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन, संस्कृत शब्द से है!

यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विछेदन करें तो पायेंगे ....
*हीन+दू* = हीन भावना + से दूर

*अर्थात* जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, मुक्त रहे, वो हिन्दू है !

हमें बार-बार, सदा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दू शब्द मुगलों ने हमें दिया, जो *"सिंधु" से "हिन्दू"* हुआ l

*हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !*

जानिए, कहाँ से आया हिन्दू शब्द, और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?

हमारे "वेदों" और "पुराणों" में *हिन्दू शब्द का उल्लेख* मिलता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है!

"ऋग्वेद" के *"ब्रहस्पति अग्यम"* में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-
*“हिमलयं समारभ्य*
*यावत इन्दुसरोवरं ।*
*तं देवनिर्मितं देशं*
*हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।*

*अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिंदुस्तान* कहते हैं!

केवल *"वेद"* ही नहीं, बल्कि *"शैव" ग्रन्थ* में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं:-

*"हीनं च दूष्यतेव्* *हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।”

अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं!
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक *"कल्पद्रुम"* में भी दोहराया गया है :

*"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”*

*अर्थात* जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

*"पारिजात हरण"* में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-

*”हिनस्ति तपसा पापां*
*दैहिकां दुष्टं ।*
*हेतिभिः श्त्रुवर्गं च*
*स हिन्दुर्भिधियते।”*

अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का, और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है !

*"माधव दिग्विजय"* में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-

*“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य*
*पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।*
*गौभक्तो भारत:*
*गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।*

*अर्थात : वो जो "ओमकार"* को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, गौपालक रहे, तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है!

केवल इतना ही नहीं, हमारे "ऋगवेद" (८:२:४१) में *विवहिन्दू* नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने 46,000 गौमाता दान में दी थी! और *"ऋग्वेद मंडल"* में भी उनका वर्णन मिलता है l

बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहनेवाले, सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं।
*"हिनस्तु दुरिताम🙏🏻🙏🏻
🚩

11/06/2020
25/05/2020

चमार नहीं! #चंवर_वंश होता है!
चमार तो मुग़लों का दिया गया नाम है!
#सूर्यवंशी_चंवरवंश!!
जैसे कि संत रविदास!
जय संत श्री रविदास #हिंदुत्व के सच्चे रखवाले!

चंवरवंशी का धर्म नष्ट करने के लिए मुगलों ने उनसे गाय का चमड़ा छिलवाया, उतरवाया!

और वाल्मीकि (ब्राम्हणों) से मेला उठवाया जिससे इनका धर्म भंग हुआ तब ये #भंगी कहलाये!
किन्तु इन दिलेर हिंदुओं ने ये घृणित कार्य करना तो पसंद किया लेकिन इस्लाम नहीं कबूला!!
और सनातन धर्म की रक्षार्थ सुअर पालने का काम किया क्योंकि इस्लाम में सुअर देखना और उसकी आवाज सुनना हराम है!!
लेकिन #सनातन_धर्म नहीं छोड़ा! ये सुरवीर कौम है!! जिसने धर्म की खातिर अपना राजसुख तक त्याग दिया!!

#भगवान_वाल्मीकि और #संत_रविदास की जय!!🚩🚩

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