28/03/2026
गाज़ा और लेबनान से शुरू हुई इस जंग को नेतनयाहू ने जानबूझकर ईरान तक खींचा है। दरअसल उसका असली मक़सद गाज़ा या लेबनान जीतना कभी था ही नहीं। उसका इकलौता टारगेट है किसी भी तरह अमेरिका को इस पूरे मिडिल ईस्ट की आग में घसीटना और सीधे ईरान से टकराना। यह एक ज़मीनी सच है कि इज़राइल की इकॉनमी और डिफेन्स सिस्टम लंबी जंग का बोझ उठा ही नहीं सकते। उनकी फौज़ 'रिजर्व सैनिकों' यानी आम नागरिकों पर चलती है, जिनके महीनों तक बॉर्डर पर रहने से मुल्क का आर्थिक ढांचा बुरी तरह चरमरा चुका है। फिर भी नेतनयाहू जंग रोकने के लिए तैयार नहीं है?
दरअसल नेतनयाहू को यह खौफ सता रहा है कि अगर उसने आज जंग रोक दी, तो अगले 5-10 सालों में इज़राइल का वजूद ही हमेशा के लिए मिट जाएगा। तब तक हिज़्बुल्लाह और हमास दोबारा और भी ज़्यादा ताक़तवर होकर खड़े हो जाएंगे, और सबसे बड़ा डर ये है कि ईरान एक मुकम्मल न्यूक्लियर पावर बन चुका होगा। इज़राइल यह अच्छी तरह जानता है कि वो अकेले अपने दम पर ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को कभी खत्म नहीं कर सकता। इसीलिए नेतनयाहू ने इस जंग को जानबूझकर इतना भड़काया कि ट्रंप को मजबूरन ईरान पर शुरुआती हमला करना पड़ा। इसे मिलिट्री एक्सपर्ट्स की भाषा में 'सैमसन ऑप्शन' कहते हैं—यानी अपना वजूद बचाने के लिए सुपरपावर अमेरिका के कंधों पर बंदूक रखकर चलाना और उसे अपनी जंग में झोंक देना।
दूसरी तरफ ईरान है। इस जंग में उनका भयंकर नुकसान हो रहा है, लगातार बड़ी शहादतें हो रही हैं, लेकिन जिस हौसले और जज़्बे के साथ वो इस ज़ुल्म के सामने सीना ताने खड़े हैं, वो वाक़ई इतिहास में सुनहरे हर्फों में दर्ज होने वाली बात है। ईरान महज़ जज़्बात में नहीं लड़ रहा, बल्कि वो एक 'थकाने की जंग' (War of Attrition) लड़ रहा है, और अगर ज़मीनी हक़ीक़त देखें, तो ईरान इज़राइल को खोखला करने में काफी हद तक कामयाब भी हो रहा है। ईरान जानता है कि सीधी जंग में अमेरिका की ताक़त बड़ी है, इसलिए उसकी रणनीति पूरी तरह से इज़राइल को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से इतना तोड़ देने की है कि वहां के नागरिक खुद अपना देश छोड़कर भागने लगें। ईरान ने इज़राइल की इकॉनमी, टूरिज़्म और समाज के उस 'सुरक्षित' होने के गुरूर को इतनी बुरी तरह तोड़ दिया है कि इज़राइली नागरिक अब रिवर्स माइग्रेशन (देश छोड़ने) के लिए मजबूर हो रहे हैं।
इसके अलावा, पर्दे के पीछे ईरान का जो सबसे बड़ा मक़सद है वो 'वैचारिक लीडरशिप' का है। ईरान अरब के बादशाहों या हुक्मरानों को अपने पाले में लाना ही नहीं चाहता। उसका सीधा टारगेट है 'अरब की आम अवाम'। आज जब सुन्नी अरब मुल्कों के हुक्मरान खामोश बैठे हैं, तब एक शिया मुल्क फिलिस्तीन के लिए बम खा रहा है।
ईरान अपनी इस बर्बादी की कीमत चुकाकर तमाम इंसाफ पसंद और अरब की सड़कों पर 'हीरो' बन रहा है और पूरी मुस्लिम उम्मत की Ideological Leadership हासिल कर रहा है।