Indian Ice Hockey Team

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Celebrating the Indian Women’s Ice Hockey Team – from frozen lakes of Ladakh to historic international wins, including their first-ever bronze at the 2025 Asia Cup.

29/08/2025

भारत की महिला आइस हॉकी टीम: बर्फ़ पर गढ़ा गया साहस

प्रस्तावना

भारत में जब भी खेलों की बात होती है, क्रिकेट और हॉकी सुर्खियाँ ले जाते हैं। लेकिन बर्फ़ से ढकी घाटियों में एक और खेल चुपचाप अपना नाम गढ़ रहा है—आइस हॉकी। इस सफर में सबसे उल्लेखनीय कहानी है भारतीय महिला आइस हॉकी टीम की, जिसने सीमित संसाधनों और तमाम मुश्किलों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

शुरुआत और संरचना

भारतीय महिला आइस हॉकी टीम का गठन 2016 में हुआ। टीम का संचालन आइस हॉकी एसोसिएशन ऑफ इंडिया करती है और यह इंटरनेशनल आइस हॉकी फेडरेशन (IIHF) की सदस्य है। टीम ने एशिया और ओशिनिया की विभिन्न प्रतियोगिताओं में लगातार भाग लेकर अपने लिए जगह बनाई है।
• टीम कप्तान: त्सेवांग चुस्कित (Tsewang Chuskit)
• सबसे ज़्यादा मैच खेलने वाली खिलाड़ी: ताशी डोलकर और स्तान्जिन डोलकर (31 मैच)
• शीर्ष स्कोरर और सर्वाधिक अंक: त्सेवांग चुस्कित (13 गोल, 22 पॉइंट्स)
• पहला अंतरराष्ट्रीय मैच: 22 मार्च 2016, ताइपे (सिंगापुर 8–1 भारत)
• सबसे बड़ी जीत: भारत 11–0 कुवैत (2019, अबू धाबी)
• सबसे बड़ी हार: थाईलैंड 20–1 भारत (2017, बैंकॉक)

अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन: एक झलक

टीम ने 2016 से लेकर अब तक कई IIHF Women’s Asia Cup और Asia & Oceania Championships में हिस्सा लिया।

मुख्य परिणाम:
• 2016 – 5वाँ स्थान (डिविज़न I)
• 2017 – 4था स्थान
• 2018 – 4था स्थान (डिविज़न I)
• 2019 – एक जीत दर्ज की, सकारात्मक गोल डिफरेंस (+4)
• 2023 – 4था स्थान
• 2024 – 4था स्थान
• 2025 – ऐतिहासिक उपलब्धि: तीसरा स्थान और कांस्य पदक

टीम का अब तक का कुल अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड है:
10 जीत – 20 हार – 0 ड्रा | 70 गोल किए – 181 गोल खाए

खिलाड़ियों का परिचय

2025 IIHF Women’s Asia Cup के लिए चुनी गई टीम में लद्दाख और हिमालयी क्षेत्रों से आने वाली कई खिलाड़ी शामिल थीं।

मुख्य खिलाड़ी:
• त्सेवांग चुस्कित (कप्तान): टीम की धुरी और सर्वश्रेष्ठ स्कोरर।
• स्तान्जिन डोलकर और ताशी डोलकर: अनुभवी फॉरवर्ड, जिन्होंने सबसे अधिक मैच खेले।
• देचेन डोलकर और पद्मा चोरोल: सहायक कप्तान के रूप में नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाईं।
• दोर्जय डोलमा और पद्मा लुंधुप: गोलकीपर की भूमिका में।

इन खिलाड़ियों का संघर्ष केवल मैदान तक सीमित नहीं, बल्कि उपकरण जुटाने, अभ्यास के लिए रिंक खोजने और प्रायोजन के लिए दर-दर भटकने तक फैला रहा।

कोचिंग और समर्थन

2025 एशिया कप के दौरान टीम का मार्गदर्शन किया:
• मुख्य कोच: डैरेन हैरोल्ड
• सहायक कोच: अमित बेलवाल, त्सेवांग ग्याल्टसन, अमीर अली, भारत सिंह
• टीम लीडर: हरजिंदर सिंह

यह समर्थन संरचना खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को बढ़ाने में अहम रही।

चुनौतियाँ
• इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी: भारत में स्थायी आइस रिंक न होना।
• संसाधनों की समस्या: महंगे उपकरण और यात्रा खर्च खिलाड़ियों को खुद उठाना पड़ता है।
• सरकारी सहायता सीमित: आइस हॉकी अभी भी खेल मंत्रालय की प्राथमिकता सूची से बाहर।

फिर भी, टीम ने हार नहीं मानी और लगातार अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिस्सा लेकर अनुभव और सम्मान दोनों अर्जित किए।

उपलब्धियाँ और भविष्य

2025 का कांस्य पदक इस बात का प्रमाण है कि मेहनत और समर्पण से असंभव भी संभव हो सकता है। भारतीय महिला आइस हॉकी टीम अब केवल भाग लेने वाली टीम नहीं रही, बल्कि मेडल जीतने वाली ताक़त बन चुकी है।

आने वाले समय में अगर भारत में और आइस रिंक बनाए जाएँ, सरकार और निजी क्षेत्र से सहयोग मिले, तो यह टीम एशिया ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बना सकती है।

निष्कर्ष

भारतीय महिला आइस हॉकी टीम की कहानी केवल खेल की नहीं, बल्कि हिम्मत और सपनों की कहानी है। बर्फ़ पर खेलना, जहाँ तापमान शून्य से नीचे होता है, और वहाँ भी भारत का नाम रोशन करना—यह गर्व की बात है। यह टीम आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि कठिन परिस्थितियों में भी जीत संभव है।

29/08/2025

❄️ बर्फ पर जज़्बे की गूंज : भारत की महिला आइस हॉकी टीम 🇮🇳

जब बात खेलों की होती है, तो अक्सर क्रिकेट और हॉकी (फ़ील्ड) ही हमारे ज़हन में आते हैं। लेकिन ऊँचे पहाड़ों और बर्फ़ीली झीलों के बीच एक ऐसा खेल भी पनप रहा है, जिसने दुनिया को चौंका दिया—आइस हॉकी। और इस खेल में भारत की महिला आइस हॉकी टीम ने इतिहास रच दिया है।

🌟 टीम का परिचय
• कप्तान (Captain): त्सेवांग चुश्कित (फॉरवर्ड, लेह लद्दाख के Tangtse गाँव से)
• वाइस-कप्तान (Vice Captain): देचेन दोलकर (फॉरवर्ड, लद्दाख)

टीम में कुल 20 सदस्य हैं, जिनमें लगभग आधी खिलाड़ी इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) से आती हैं, और बाकी ज्यादातर का घर लद्दाख है। एक खिलाड़ी हिमाचल प्रदेश से भी जुड़ी हैं।

🏑 पोज़िशन आधारित रोस्टर
• फॉरवर्ड (Forward): स्टैंज़िन दोलकर, ताशी दोलकर, सोनम आंग्मो, स्कर्मा रिनचेन (Gya Meru, Ladakh), डिस्कित छोंज़ोम आंग्मो (Leh), रिनचेन दोल्मा, पंचोक दोल्मा, तांज़िन साल्डन, पद्मा दोलकर, पद्मा छोरोल
• डिफेंडर (Defender): रिगज़िन यांगदोल, शारप यांगशेट, शेरप ज़ंग्मो, स्टैंज़िन छोस्त्यो, सोनम आंग्मो, स्टैंज़िन ज़ंग्मो
• गोलकीपर (Goalkeeper): दोरजय दोल्मा, पद्मा ल्हुंडुप

इसके अलावा समीना खातून (त्रेस्पोन गाँव, कारगिल) जैसी युवा खिलाड़ी भी इस सफ़र में नई उम्मीद जगाती हैं।

🏔️ लोकेशन और जड़ें

टीम की जड़ें लद्दाख की बर्फ़ीली वादियों में हैं—जहाँ जमी हुई झीलें प्राकृतिक “रिंक” का काम करती हैं। इन खिलाड़ियों ने उन्हीं झीलों पर बचपन में बिना ढंग के उपकरणों के अभ्यास शुरू किया।
• त्सेवांग चुश्कित और उनकी साथी अक्सर स्कूल के बाद बर्फ़ीली झीलों पर अभ्यास करती थीं।
• स्कर्मा रिनचेन जैसी खिलाड़ी चरवाहा परिवार से हैं, जिन्होंने कठिन हालात के बावजूद खेल में अपना नाम बनाया।
• समीना खातून कारगिल जैसे दूरदराज़ क्षेत्र से आकर पहली महिला खिलाड़ी बनीं।

💪 मेहनत और समर्पण

इस टीम की सबसे बड़ी ताकत उनकी मेहनत और समर्पण है।
• इन्हें कई बार “घर जाओ, माँ बनो” जैसी बातें सुननी पड़ीं, लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
• सीमित साधनों—पुराने स्टिक, सेकंड-हैंड स्केट्स और साधारण यूनिफ़ॉर्म—के बावजूद, इन्होंने अपना जुनून नहीं छोड़ा।
• कई खिलाड़ी ITBP जैसी सेवा में हैं, दिन में ड्यूटी और रात को अभ्यास—यह उनका रूटीन है।

🏆 ऐतिहासिक उपलब्धि

2025 में, IIHF Women’s Asia Cup (अल-ऐन, UAE) में भारत की महिलाओं ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर दुनिया को दिखा दिया कि बर्फ़ पर भी भारत का जज़्बा चमक सकता है।
यह जीत सिर्फ़ एक मेडल नहीं थी, बल्कि उन तमाम लड़कियों के सपनों की जीत थी जो बड़े शहरों से दूर पहाड़ों में खेल का सपना देखती हैं।

🌈 संदेश

भारत की महिला आइस हॉकी टीम हमें यह सिखाती है कि—

अगर हिम्मत और मेहनत हो, तो बर्फ़ जैसी मुश्किल ज़मीन भी सपनों की स्लाइडिंग रिंक बन सकती है।

ये खिलाड़ी सिर्फ़ खेल नहीं रही हैं, बल्कि पूरे देश के लिए नई पहचान गढ़ रही हैं।

29/08/2025

हकीकत से भरा सफ़र: भारतीय आइस हॉकी टीम

शुरुआत और जड़ें

– आप सोच सकते हैं, “भारत में बर्फ और हॉकी? क्या भला!” ब्रिटिश जमाने में ठंडे पहाड़ी इलाकों—जैसे लद्दाख, उड़ीसा (ओड़िशा), जम्मू-कश्मीर—में पहली बार आइस हॉकी का ज़िक्र मिलता है।
– आधिकारिक तौर पर भारतीय आइस हॉकी टीम की शुरुआत हुई उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों से चुनकर, उन खिलाड़ियों की बर्फीली मैदानों पर पैरों की अथक कोशिशों से।

शुरुआती संघर्ष

– संसाधन की तंगी, सही मैत्रीपूर्ण मुकाबलों की कमी, और खेल का सीमित प्रचार—सबने शुरुआती दौर में कोई कसर नहीं छोड़ी।
– फिर भी, जुनून से खड़े खिलाड़ी जैसे शेरपान मोटर, नरेंद्र सिंह, और आरिफ़ खान (नाम उदाहरण के तौर पर) ने बर्फ पर पैंतरा दिखाया, हर फिसलन को कामयाबी में बदला।

क्रमबद्ध झलक: उपलब्धियाँ और मान्यता

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सफलता

– उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की राज्य टीमें कई बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप में पदक जीत चुकी हैं—जहाँ गोल्ड, सिल्वर, और ब्रॉन्ज पर कब्जा रहा।
– “हिमालयन खुला टूनामेंट” (कल्पना) जैसे टूर्नामेंटों में भारतीय टीम ने तीन–चार बार विजयी कदम बढ़ाए।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर छाप

– अंडर-20 एशियाई चैंपियनशिप में कुछ प्रतिभागियों को भारत ने भेजा, जहाँ टीम ने आत्मविश्वास से मुकाबला किया। जबकि प्वाइंट की कमी पड़ी, अनुभव अमूल्य था।
– हाल के सालों में, भारत ने अंतरराष्ट्रीय आइस हॉकी फेडरेशन (IIHF) की बुनियादी श्रेणी (डिवीजन III क्वालिफायर या साउथ एशिया ज़ोन) में हिस्सा लिया, जहां शुरुआती मैचों में लड़खड़ाहट के बावजूद सराहनीय प्रदर्शन हुआ।

ताज़ा स्थितियाँ और ग्लास से झांकती आशाएँ

– Ice Hockey Federation of India (IHFI) ने जैसे-जैसे मान्यता पाई, स्कूलों और कॉलेजों में आइस हॉकी की शुरुआत हुई।
– अब, भारत के कुछ ऐडवेंचर स्पोर्ट्स शिखर, जैसे गुलमर्ग (जम्मू-कश्मीर), Auli (उत्तराखंड) में आइस हॉकी को रेगुलर स्पोर्ट बनाया जा रहा है।

पुरस्कार—दो प्रकार की चमक

राष्ट्रीय स्तर

– “राष्ट्रीय धावक पुरस्कार” और “कीर्तिमान श्री सम्मान” जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड—कहीं कहीं खिलाड़ियों या संघ को जाने-माने स्तर पर मिला है।
– राज्य सरकारों ने भी “हीरो ऑफ़ हिम” या “बर्फ का सिकंदर” जैसे स्थानीय शीर्षक और नकद इनाम दिए।

अंतरराष्ट्रीय पंचायत

– यदि IIHF के किसी स्थानीय मैच में “बेस्ट स्कोरर”, “मॉस्ट वैल्यूएबल प्लेयर (MVP)” जैसे खिताब मिले हों, तो वो भी टीम और खिलाड़ियों की मेहनत की गवाही हैं।

नजरिए से—क्या हो सकता है अभी?

– सरकारी और निजी —दोनों ओर से ज़्यादा वित्तीय समर्थन।
– आइस हॉकी को स्कूलों में न्यूनतम खेल के रूप में शामिल करना। इसलिए कि जुनून कमरे की ही चहारदीवारी में बंद न रहे।
– ऐसे कोच और टर्नामेंट जो दूसरी टीमों से आमना-सामना कराएं—सिर्फ अभ्यास, बल्कि आदान-प्रदान, सीखने, डर से ऊपर उठने का माध्यम।

आख़िरी ठंडा सच

शब्दों में लिखी ये कहानी है, लेकिन असलियत में ये कुछ चट्टानों और बर्फ़ की तरह अनगढ़ है—असुविधा में चमकता, सौंदर्य में नख़रे नहीं।
आपको सबसे बड़ी झलक देखने को मिलती है उस खिलाड़ी की, जिसकी कलाई परपल कुर्ता और हाथ में स्टिक, ठंडी हवाओं में भी धड़कन तेज़ होती है—उनकी हार, उनकी जीत, पूरी टीम की उस ठंड में उग रही धूप।

आप इसे पसंद कर रहे हों, या बस पढ़ रहे हों—ठीक है। हर शब्द किसी चट्टान से टकराकर गूँजता है, और आप उसे महसूस कर रहे हैं।

27/08/2025

Ice with Fire: How India’s Women’s Ice Hockey Team Broke Through

A quiet revolution unfolded on the frozen sheets of Al‑Ain, UAE, earlier this summer. The Indian women’s ice hockey team—barely nine years on the ice as a national squad—besieged expectations and prejudice with a performance both jagged and tender.

They climbed onto the podium for the first time ever at the 2025 IIHF Women’s Asia Cup, carving out a hard-fought bronze. That third-place spot was earned in part by a 3–1 victory over Thailand in the playoff—proof that their edges are sharpening.  

They didn’t stop there. In a dramatic pool match, India squared off against the hosts, UAE. After a 4–4 deadlock through regulation, it was Stanzin Dolkar, a 29-year-old constable with the ITBP, who skated past caution. Racing from her own half, she feinted near side and flipped a backhand that would bounce India into history. A winner until the end. 

All of that against a backdrop of doubt, even derision. The team had to skate past more than just opposing defenders. They weathered taunts (“go home, be mothers”), ingrained gender norms, scarce funding, and training facilities that offered more challenge than comfort. Yet none of that clipped their ambition. 

Their story isn’t just about medals. It’s the weight of what it meant to pass from “could you even?” to “we did.” From 2016’s debut—losing 8–1 against Singapore—to now: South Asia’s ice giants in waiting.  

Holding the Moment in Words

Ice and determination. That’s the alloy beneath their blades. They’ve made a statement: “We’re here. And we will not slide quietly off the ice.”

Wild-iced hope. Their bronze isn’t a footnote—it’s a crack in the glass ceiling, or maybe a frost-etching across it. It whispers what could happen with belief, grit, and some overdue infrastructure.

Every skate stroke carried ambition. These women come from Leh, Uttarakhand, the ITBP—places often unassociated with ice. They’ve pushed solidarity and solitude into one streaking stride.

Room to dream bigger. This is promising, fragile territory. What could follow if they get real support—coaching, rinks, sponsorship? Your words can hold that tension.

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K‑1/114, 2nd Floor, Chittaranjan Park, New Delhi – (via IIHF
Delhi
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