24/09/2016
इन्हें तुरन्त माफ़ी मांगते हुए नौकरी पर बहाल करना चाहिये
ससम्मान
मेरे गाँव में एक विक्षिप्त औरत थी… पगली-पगली कहते थे सब उसे.. जैसा उसका मन करता वैसा करती थी वो.. कभी कपड़े फेंक-फांक के नाचने लगती तो कभी जोर-जोर से रोने लगती.. सड़क के बीचों-बीच चलती.. ट्रक-कार वाले होरन मार-मार के थक जाते.. साइड हो के निकल लेते लेकिन वो अपनी ही धुन में चलते रहती.. कोई कुछ बोलने गया तो अजीब-अजीब सी हरकतें करने लगती.. ठंडे के दिनों में जब ठण्ड से कंपकंपाती तो उसपे तरस आ के गाँव के कुछ जन पुराने कम्बल दे देते ओढ़ने के लिए.. लेकिन वो कम्बल नहीं ओढ़ती.. अगले दिन पता नहीं कम्बल कहाँ गायब हो जाता… लोग कुछ खाने को देते तो वो कुछ खाती और बाकी को पूरा छींट देती.. फिर उसको एक-एक करके उठा-उठा के खाती.. कभी-कभी दिया हुआ खाना न खा के पुवाल खा लेती.. पत्ते और घास तोड़ के खाने लगती।.. लेकिन फिर लोग उसकी मदद करना नहीं भूलते थे.. भले ही वो विक्षिप्त थी पगली थी लेकिन सामने वाले तो पागल नहीं थे.. विक्षिप्त नहीं थे.. वो अपनी ओर से जैसा बन सकता था वैसे मदद करते थे.. जब वो मर गई तो गाँववालों ने मिल के अंतिम संस्कार भी करवाया।
अब ज़रा कल्पना कीजिये कि कोई बड़का पतरकार हाथ में 20-25 हजार रूपये का कैमरा लिए हमारे गाँव में आता और घास और पुवाल खाती, कटे-फिटे कपडों में, तितर-बितर बालों में उस पगली का फोटु खींचता और पेपर में डालता और लिखता कि “देखिये मानवीय संवेदना कहाँ जा रही हैं!.. एक गरीब और भूखी-प्यासी महिला घास और पुवाल खाने को मज़बूर है!.. क्या इतने बड़े गाँव में कोई इसके लिए एक वक़्त का भी भोजन नहीं दे सकता है ? वाक़ई आज मानवता शर्मसार हुई जा रही हैं.. मानव संवेदनहीन होता जा रहा हैं।“
फिर वो फोटु सोशल मीडिया में खूब वायरल होती.. लोगों के आंसुओं के सैलाब फुट पड़ते.. छाती पीट-पीट के रोते.. मेरे पुरे गाँव वालों को मानवता के दुश्मन बताते.. लाख लानत भेजते.. हमें राक्षस घोषित कर देते.. ब्ला..ब्ला.ब्ला.. हमें पब्लिकली ये बोलने में शर्म आता कि हम अमुक गाँव वाले हैं.. हम अपनी पहचान छुपाते.. पता नहीं किसी के मुँह से क्या सुनने को मिल जाय!।.. उस पतरकार को उस रिपोर्टिंग के लिए कोई बड़का पदोन्नति मिल जाता .. लेकिन हमारे गाँव वालों को मानवता और नैतिकता के मामले में अधोन्निति करके।
कल से ही ऐसे ही एक तस्वीर पूरे सोशल मीडिया में वायरल हुई जा रही है.. राँची के रिम्स अस्पताल में एक महिला का फर्श पे खाना खाते हुए का।.. लोग छाती पीट-पीट बुका फाड़ के रोये जा रहे है.. आँखों के आँसू सूखे जा रहे हैं.. मानवता की दुहाई दे
भारत इमोशनली देश हैं.. यहाँ इमोशन्स का यूज करके किसी को भी बनाया जा सकता है और पूरा काटा जा सकता हैं.. और अगर इसमें राजनीति की सौंध लग गई तो कहने ! .. पूरा हड़कम्प!!
इमोशन्स बेचने वाले पदोन्नति पा मलाई खाते हैं तो इसका यूज करने वाले सत्ता प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
पहले जब किसी को कहीं पे एडमिसन नहीं मिलती थी तो लोग वक़ालत करते थे.. और आज कुछ न कर पाते है तो पतरकार बन जाते हैं.. गली-कूचे में पतरकार का पट्टा लगाये बुद्धिजीवी बने फिरते हैं.. हाथ में 2 हजार से 2 लाख तक का कैमरा और फोन लिये सनसनी खोजते-ढूंढते चलते हैं.. जिसको कि बेचा जा सके।
और ऐसी ही सनसनी उसे रिम्स अस्पताल में मिल गई.. उड़ीसा के माझी के जैसा.. पूरी मानवता शर्मसार हो गई.. लोग भावनाओँ में बहे जा रहे हैं।। .. क्या वो पतरकार उस औरत की हेल्प नहीं कर सकता था?.. लेकिन उसे तो पहले ‘सुपर क्लिक’ की पड़ी थी.. अगर पहले मदद को आता तो फिर ये ‘सुपर क्लिकिंग’ कैसे हो पाती! और इतनी सनसनी कैसे क्रिएट हो पाती?!
और क्लिक करने के बाद उसने उस औरत की क्या मदद की किसे पता?
फोटो में साफ़ दिख रहा है कि उस औरत की मरहम-पट्टी भी हुई थी.. अगर मानवता इतनी ही मर गई होती तो उसकी मरहम पट्टी भी न करते डॉक्टर!!
आज वहाँ के कर्मचारी चन्द्रमणि प्रसाद का ब्यान आया.. उन्हें बर्खास्त किया जा चूका है.. लेकिन खबर ने इस कदर हंगामा काटा है कि कोई उसकी बात को मानने को तैयार ही नहीं होगा.. लोग दो-दिन आँसू बहाने के बाद सबकुछ भूल जाएंगे। लेकिन अगर कुछ दिन बाद वो पुनः अपनी ड्यूटी में वापिस आएगा तो क्या वो ऐसी मदद और किसी ज़रूरतमन्द को कर सकता है ? सौ बार सोचेगा मदद करने के पहले.. पता नहीं कौन पतरकार आ जाए और अमानवीय होने का ठप्पा लगा जाय।
आज अखबार के पहले पन्ने पे बड़े-बड़े हेडिंग्स के साथ खबर छपते है कि आज “मानवता और संवेदना दिनों-दिन और निरंतर गर्त में गिरती जा रही है!”
ये पतरकार जब अपनी पत्रकारिता का परचम लहराने के लिए जब मानवता और संवेदना को बेचेंगे तो मानवता और संवेदना गर्त में न जायेगी तो क्या अर्श पे जायेगी।
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Added : एक अखबार समूह ने खबर बनाया और दूजे अखबार समूह ने खण्डन में खबर छापा.. एक अख़बार ने मानवता को बेचा तो दूसरे अखबार ने मानवता के साथ सौदा किया।.. ये भी हो सकता हैं!!
गंगा महतो
खोपोली।