K. P. Singh "Sanjay"

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K. P. Singh "Sanjay" सबके साथ , सबके दिलों में प्यार जागते चलो।

पिछले कुछ दिन से मैंने गौर किया है कि मेरे कैंप के बगल में जितने पेड़ हैं, उस पर ये पक्षी आकर बैठते हैं और गौर में आया क...
11/08/2026

पिछले कुछ दिन से मैंने गौर किया है कि मेरे कैंप के बगल में जितने पेड़ हैं, उस पर ये पक्षी आकर बैठते हैं और गौर में आया कि जहाँ बैठे हैं, उसके सारे पत्ते गायब होते जा रहे हैं। शुरुआत में यह देखकर थोड़ा अजीब लगा कि आखिर पेड़ की बाकी डालियाँ तो हरी-भरी हैं, लेकिन जिन जगहों पर ये पक्षी डेरा डाले हुए हैं, वहाँ के पत्ते धीरे-धीरे पूरी तरह गायब क्यों होते जा रहे हैं।
बहुत सोचने और लोगों से पूछताछ करने तथा अन्य सोर्स से अध्ययन करने के बाद इस के पीछे की वजह सामने आई। यह खूबसूरत और बड़े आकार का पक्षी एशियन ओपनबिल स्टॉर्क (Asian Openbill Stork) है, जिसे आम बोलचाल में 'शामुकखोल' भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया के आर्द्रभूमि, झीलों और धान के खेतों के आसपास पाया जाने वाला एक प्रमुख जलीय पक्षी है। इनका मुख्य आहार शंख और बड़े घोंघे (Snails) होते हैं, जिन्हें ये अपनी खास और अनोखी चोंच की बनावट से आसानी से तोड़कर खाते हैं, इसी कारण कुछ क्षेत्रों में इसे घोंघईला भी बोलते है। ये सामाजिक पक्षी होते हैं जो अक्सर बड़े झुंडों में ऊंचे पेड़ों पर अपने घोंसले बनाते हैं।
जब इन पक्षियों को कैंप के पास के पेड़ों पर लगातार बैठते और घोंसले बनाते देखा गया, तो पेड़ों के पत्ते गायब होने के पीछे के वैज्ञानिक और प्राकृतिक कारणों की यह रोचक सच्चाई सामने आई, इन पक्षियों के मल (Droppings) में यूरिक एसिड, नाइट्रोजन और अमोनिया की मात्रा अत्यधिक उच्च स्तर पर होती है। जब यह मल लगातार पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं पर गिरता है, तो अत्यधिक रासायनिक सांद्रता के कारण पत्तियां रासायनिक रूप से झुलस जाती हैं और समय से पहले ही सूखकर झड़ जाती हैं।इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन बर्न कहते है। इसके अलावा ये पक्षी अपने विशाल और मजबूत घोंसलों को बनाने या उन्हें संवारने के लिए बहुत सक्रिय रहते हैं। इसके लिए वे अपनी चोंच से आसपास की ताज़ा हरी टहनियों और पत्तियों को लगातार तोड़कर इस्तेमाल करते रहते हैं, जिससे वह हिस्सा धीरे-धीरे पत्ताहीन होने लगता है।एक कारण यह भी माना जाता है कि लगातार भारी मात्रा में बीट गिरने से उस विशेष हिस्से के पेड़ के पर्णसमूह (Foliage) और आसपास की संरचना पर गहरा असर पड़ता है, जिससे वहाँ नई पत्तियों का विकास रुक जाता है और वह डाल पूरी तरह गंजी या सूखी हुई नजर आने लगती है। इसको अम्लीय प्रभाव कहते हैं।
प्रकृति का यह चक्र वाकई हैरान करने वाला है। एक तरफ जहाँ ये पक्षी हमारी जैव विविधता और पर्यावरण का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, वहीं इनका दैनिक रहन-सहन हमारे आस-पास के पेड़ों पर ऐसा अनूठा प्रभाव भी छोड़ जाता है। कैंप के पास बैठकर इस पूरी प्राकृतिक प्रक्रिया को देखना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है।

 ः_शिवाय 📿✨श्रावण मास के पावन प्रथम सोमवार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। आज के इस पवित्र दिन पर आज बात करते हैं देवों...
03/08/2026

ः_शिवाय 📿✨
श्रावण मास के पावन प्रथम सोमवार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। आज के इस पवित्र दिन पर आज बात करते हैं देवों के देव महादेव और उत्तराखंड में स्थित #पंच_केदार की उस पौराणिक और ऐतिहासिक गाथा के बारे में, जो पीढ़ियों से हमारी आस्था का केंद्र रही है।
कहते है कि महाभारत के भीषण युद्ध के बाद, जब पांडवों पर अपने ही परिजनों की हत्या का पाप (ब्रह्महत्या) लगा, तो वे मुक्ति के लिए भगवान शिव का आशीर्वाद चाहते थे। अब भोले शंकर तो महादेव है और महादेव पांडवों से किसी बात पर रुष्ट थे और बैल #नंदी का रूप धारण कर गढ़वाल क्षेत्र में जा छिपे थे। किसी तरह पांडव महादेव को खोजते खोजते भटक रहे थे, एक जगह उनको #महादेव नंदी रूप में मिल गायवलेकिन पांडवों ने उन्हें पहचाना नहीं, लेकिन भीम उनको पहचान गए और जब भीम ने बैल रूपी शिव को पकड़ना चाहा, तो शिवजी जमीन में समा गए और उनके अंग पांच अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए:-
#केदारनाथ बैल की पीठ का कुबड़ (12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल)।
#तुंगनाथ भगवान की भुजाएं (दुनिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर)।
#रुद्रनाथ भगवान शिव का मुखमंडल (चेहरा)।
#मध्यमहेश्वर भगवान शिव की नाभि और पेट का हिस्सा।
#कल्पेश्वर भगवान शिव की जटाएं (केश)।
पांडवों ने इन पाँचों स्थानों पर शिव की आराधना कर मंदिरों की नींव रखी थी। इन मंदिरों (विशेषकर केदारनाथ, तुंगनाथ और मध्यमहेश्वर) की वास्तुकला प्राचीन #कत्यूरी_शैली की है। यहाँ पत्थरों के बड़े-बड़े और मजबूत शिलाखंडों को बिना किसी सीमेंट या चूने के एक-दूसरे के ऊपर सिकोड़कर अद्भुत तरीके से जोड़ा गया है।
कहते है कि सदियों पहले पांडवों द्वारा स्थापित इन मंदिरों का समय-समय पर जीर्णोद्धार हुआ। 8वीं शताब्दी में महान दार्शनिक और संत #आदि_शंकराचार्य ने इन क्षेत्रों का दौरा किया और केदारनाथ समेत इन धामों के पुनरुद्धार में मुख्य भूमिका निभाई।
इन मंदिरों की अनूठी विशेषता है कि जहाँ बाकी अन्य मंदिर सर्दियों में बर्फबारी के कारण बंद हो जाते हैं, वहीं 'कल्पेश्वर' एकमात्र ऐसा केदार मंदिर है जिसके कपाट साल के बारह महीने खुले रहते हैं। भोलेनाथ की यह महिमा हमारी समृद्ध संस्कृति, प्राचीन वास्तुकला और अटूट आस्था का प्रतीक है। आज के इस पावन सोमवार पर महादेव आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें और अपनी कृपा बनाए रखें।
ादेव 🔱🙏

29/07/2026

तोता मैना की कहानी, कहानी पुरानी हो गई।
अब बहुत मुश्किल से देखने को मिल रहे आज कल पट्टू मिट्ठू जी।
🇮🇳 🦜🦜🦜🐦🐦 🐦

हर-हर महादेव🙏🏻​श्रावण मास केवल एक महीना नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में ऊर्जा, भक्ति और प्रकृति के अद्भुत संतुलन का नाम ह...
29/07/2026

हर-हर महादेव🙏🏻
​श्रावण मास केवल एक महीना नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में ऊर्जा, भक्ति और प्रकृति के अद्भुत संतुलन का नाम है। जब हम इस पावन मास को पुराणों की प्राचीन कथाओं और जीवन के तार्किक एवं दार्शनिक पहलुओं की कसौटी पर एक साथ कसकर देखते हैं, तो इसका स्वरूप और भी अधिक प्रेरणादायक और गहरा नजर आता है। यह पूरा महीना आस्था और विज्ञान का एक ऐसा अनूठा संगम है, जो हमें भीतर से झकझोर कर जीने की सही कला सिखाता है।
​पौराणिक संदर्भों की बात करें तो स्कंद पुराण के 'द्वादशवापि मासेषु श्रावणो मे जितिवल्लभः' श्लोक के अनुसार भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि बारह महीनों में उन्हें श्रावण मास सबसे अधिक प्रिय है। इसी मास में सृष्टि के कल्याण के लिए प्रसिद्ध 'समुद्र मंथन' हुआ था, जिसमें निकले हलाहल विष को महादेव ने अपने कंठ में धारण कर 'नीलकंठ' का पद पाया। उस विष की उष्णता को शांत करने के लिए जब देवताओं ने जल अर्पित किया, तो वहीं से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। इसी तरह, माता पार्वती ने शिव को पाने के लिए सावन में ही कठोर तपस्या की थी, जिसके परिणामस्वरुप हरियाली तीज और उनके मिलन का पर्व मनाया गया। शिव पुराण में वर्णित महर्षि मार्कण्डेय की अमरता की कथा हो या फिर अमरनाथ यात्रा और नागपंचमी जैसे प्रसंग, यह सब हमें अटूट श्रद्धा और भगवान की उस रक्षक कृपा से जोड़ते हैं जिसका महात्म्य मात्र सुनने से जीवन सुधर जाता है।
​लेकिन जब हम इन कथाओं के लॉजिकल और दार्शनिक तार्किक रूप से गौर करते हैं, तो इसके मायने बिल्कुल बदल और निखर जाते हैं।
​जैसे समुद्र मंथन और नीलकंठ की कथा हमारे अपने भीतर उठने वाले विचारों का सटीक प्रतिबिंब है। जीवन रूपी संघर्ष में जब निराशा, तनाव और अहंकार का 'विष' पैदा होता है, तो समाज या व्यक्ति का पतन तय हो जाता है। एक संतुलित और परिपक्व इंसान वही है जो समाज के बीच रहकर उस कड़वाहट और नकारात्मकता को खुद में ही पचा ले, उसे बाहर न फैलने दे—यही असली नीलकंठ होना है। ​और सावन वर्षा ऋतु का वह दौर है जब चारों तरफ हरियाली तो होती है, लेकिन मौसम में नमी के कारण पाचन तंत्र कमजोर पड़ जाता है और शरीर की ऊर्जा प्रभावित होती है। आयुर्वेद के अनुसार इस काल में शरीर को ठंडक और संतुलन की आवश्यकता होती है। शिवलिंग पर निरंतर जल या दूध की धारा चढ़ाना और कांवड़ यात्रा करना इस बात का प्रतीक है कि हम अपने शरीर और मन की उष्णता, यानी क्रोध और अशांति को शांत कर रहे हैं। आधुनिक युग की आरामदायक दुनिया से निकलकर, मीलों नंगे पांव चलना, प्राकृतिक जलस्त्रोतों से शुद्ध जल लाना और उसे शिवालय तक पहुंचाना—यह मात्र एक कर्मकांड नहीं है। यह मनुष्य की अदम्य इच्छाशक्ति, मानसिक संयम, शारीरिक सहनशक्ति और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने की सबसे बड़ी परीक्षा है। यह हमें सिखाती है कि किसी भी बड़े लक्ष्य को पाने के लिए अनुशासन और निरंतरता अनिवार्य है।
​ माता पार्वती की तपस्या यह सिखाती है कि बिना संकल्प, धैर्य और निरंतर साधना के जीवन में कभी भी आंतरिक स्थिरता (शिव) प्राप्त नहीं हो सकती। और जिससे एक बार प्रेम हो जाए फिर उसके रूप रंग और वेश भूषा से कोई फर्क नहीं पड़ता, माता पार्वती का प्रभु शिव के लिए अगाध प्रेम और श्रद्धा हम सभी के लिए निष्काम प्रेम को समझने और आत्मसात करने का एक बेहतरीन उदाहरण है।
​संक्षेप में कहें तो, श्रावण मास और कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान या पौराणिक कथाएं भर नहीं हैं। यह एक जीवंत दर्शन है जो हमें यह सिखाता है कि कैसे प्रकृति के बदलावों को समझते हुए, अपने भीतर की नकारात्मकता को शांत करना है और एक अनुशासित, शांत एवं संतुलित जीवन जीना है।
​आइए, इस पावन मास में आस्था के साथ-साथ इसके गहरे जीवन-दर्शन को अपने भीतर उतारें और देवाधिदेव महादेव की आराधना से अपने जीवन को शिवमय बनाएं।
आप सभी को सावन मास की हार्दिक शुभकामनाएं
ादेव
ः_शिवाय 🙏✨







22 जुलाई का दिन भारतीय इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। सन 1947 में इसी ऐतिहासिक तारीख को संविधान सभा द्...
22/07/2026

22 जुलाई का दिन भारतीय इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। सन 1947 में इसी ऐतिहासिक तारीख को संविधान सभा द्वारा 'तिरंगे' को स्वतंत्र भारत के आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकार किया गया था। अंग्रेजों की गुलामी से देश की औपचारिक आजादी से महज 24 दिन पहले लिया गया यह निर्णय इस बात का उद्घोष था कि अब भारत अपनी संप्रभुता, पहचान और गौरव के साथ विश्व पटल पर सर उठाकर खड़ा होने के लिए तैयार है। यह दिन केवल एक प्रतीक को अपनाने की तारीख नहीं, बल्कि अनगिनत देशभक्तों के सपनों को एक सूत्र में पिरोने का पावन क्षण था।
हमारे राष्ट्रध्वज के स्वरूप की यात्रा स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों के साथ आगे बढ़ी। इसके वर्तमान स्वरूप का मूल ढांचा महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया द्वारा तैयार किया गया था। समय और परिस्थितियों के साथ इसमें बदलाव आए और अंततः 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने चरखे के स्थान पर सारनाथ के अशोक स्तंभ से लिए गए 24 तीलियों वाले 'धर्म चक्र' को ध्वज के मध्य में स्थान दिया। इस तरह केसरिया, सफेद और हरे रंग की पट्टियों के साथ नीले रंग का चक्र मिलकर हमारे तिरंगे का पूर्ण रूप बना, जो संपूर्ण भारत की विविधता और एकता का प्रतिनिधित्व करता है। ध्वज का सबसे ऊपरी केसरिया रंग शौर्य व त्याग, मध्य की सफेद पट्टी शांति व सत्य, और निचली हरी पट्टी देश की समृद्धि का प्रतीक है; वहीं मध्य का अशोक चक्र निरंतर प्रगति और न्याय की प्रेरणा देता है।
स्वतंत्रता के कई दशकों तक राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार मुख्य रूप से सरकारी इमारतों और विशेष अवसरों तक ही सीमित था। आम नागरिकों को अपने घरों या निजी संस्थानों पर नियमित रूप से तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं थी। इस व्यवस्था को बदलने में प्रसिद्ध उद्योगपति और पूर्व सांसद नवीन जिंदल का बहुत बड़ा योगदान रहा, जिन्होंने आम जनता के ध्वज फहराने के अधिकार को लेकर एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। इसके परिणामस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि सम्मानपूर्वक राष्ट्रीय ध्वज फहराना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसी के तहत भारत सरकार ने **'भारतीय ध्वज संहिता, 2002' (Flag Code of India, 2002)** लागू की, जो 26 जनवरी 2002 से प्रभावी हुई। बाद में 'हर घर तिरंगा' अभियान को बढ़ावा देने के लिए जुलाई 2022 में नियमों में और संशोधन किए गए, जिसके तहत अब नागरिक दिन-रात (24 घंटे) अपने घरों पर तिरंगा फहरा सकते हैं और इसके लिए हाथ से कते या मशीन से बने पॉलिएस्टर, सूती, रेशमी या खादी के झंडों का उपयोग किया जा सकता है।
आम नागरिकों के लिए नियम और अधिकार तो तय कर दिए गए, लेकिन ध्वज की गरिमा और सम्मान बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। ध्वज संहिता के अनुसार, तिरंगे का उपयोग किसी व्यवसायिक प्रचार, कपड़े या सजावट के रूप में नहीं किया जा सकता। ध्वज कभी भी फटा, मैला या झुका हुआ (सरकारी शोक के अलावा) नहीं होना चाहिए और फहराते समय ध्यान रखना जरूरी है कि केसरिया रंग हमेशा सबसे ऊपर रहे। इसके अलावा ध्वज को जमीन या पानी से स्पर्श नहीं होने देना चाहिए।
राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस हमें न केवल देश के इतिहास और वीरों के त्याग की याद दिलाता है, बल्कि यह हर भारतीय नागरिक को अपने अधिकारों के साथ-साथ राष्ट्रीय ध्वज के प्रति उसकी ज़िम्मेदारियों का भी अहसास कराता है। जब एक आम नागरिक अपने घर की छत पर पूरे सम्मान के साथ तिरंगा फहराता है, तो वह भारत की अखंडता, विविधता और एक सशक्त राष्ट्र बनने के संकल्प में अपनी सीधी भागीदारी दर्ज कराता है।
🇮🇳

22/07/2026
21/07/2026

(जंतर मंतर) पर देश विरोधी नारे लग रहे, वो किसी को नहीं दिखाई दिया, अलग अलग गैंग, अलग अलग मुद्दे उछाल रही है जो कि कही से भी देशहित वाला नहीं लग रहा है, पेपर लीक से तकलीफ सभी को है, लेकिन तकलीफ का मतलब ये नहीं होता को देशद्रोहियों के साथ हो लिया जाए, पेपर लीक कब का खत्म हो गया और पेपर दुबारा संपन्न भी हो चुका है, अब इस मुद्दे पे हंगामा करके संसद सत्र को डिस्टर्ब करना है क्योंकि सरकार कई सारे बिल जैसे और लोक सभा सीट का विस्तार जैसे और भी नए महत्वपूर्ण बिल लाने वाली है जो विपक्ष की ऐसी तेसी करने वाले है। और इस मंत्री का ही रिजाइन क्यों चाहिए इसके पहले के शिक्षा मंत्रियों के कार्यकाल में लीक जैसी घटना नहीं हुई क्या, मै बताता हु इसका रिजाइन क्यों चाहिए, क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान ने सिलेबस में परिवर्तन किया है जिससे कि नई पीढ़ी के बच्चों को असली भारतीय इतिहास पढ़ने का अवसर मिलेगा न कि वामी गैंग द्वारा बनाया हुआ नकली और देश के लुटेरों का महिमामंडन करता हुआ इतिहास पढ़ेंगे, और धर्म परिवर्तन में बाधक शिक्षा का प्रसार हो रहा है, असली मामला ये है, बाकी पेपर लीक से किसी का कोई लेना देना नहीं है, वो कब का दुबारा संपन्न हो चुका है।

आज की मेहनत, कल का सुकून।आज का वृक्षारोपण, कल के लिए छाँव।।   🇮🇳
20/07/2026

आज की मेहनत, कल का सुकून।
आज का वृक्षारोपण, कल के लिए छाँव।।
🇮🇳

आज बात करते है  #धमाल_4 की। ये फिल्म ठीक-ठाक फिल्मों से थोड़ी अच्छी है, लेकिन इसे एकदम सुपर डूपर हिट नहीं बोला जा सकता, ...
17/07/2026

आज बात करते है #धमाल_4 की। ये फिल्म ठीक-ठाक फिल्मों से थोड़ी अच्छी है, लेकिन इसे एकदम सुपर डूपर हिट नहीं बोला जा सकता, लेकिन हां बहुत अच्छा बोल सकते है। एक बात तो बिल्कुल तय है कि यह फिल्म ' से तो सौ गुना बेहतर है। #धमाल सीरीज की पिछली फिल्मों में कॉमेडी भरपूर होती थी, लेकिन इस बार कहानी का जादू थोड़ा हल्का दिखाई दिया है। अगर कलाकारों के अभिनय की बात करें तो सभी का काम ठीक है। इस फिल्म में रितेश देशमुख उर्फ लल्लन जी की हीरोइन बनीं ंद (फिम में पारो की भूमिका) ने यह साबित कर दिया है कि अभिनय के लिए शरीर और चेहरे की बनावटी सुंदरता जरूरी नहीं होती, बल्कि असल मायने में अभिनय करना आना चाहिए। थोड़ा हेल्थी होना किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री बनने की राह में रुकावट नहीं है। वहीं रितेश देशमुख भी फिल्म में बहुत लाजवाब लगे हैं।
रितेश के साथ-साथ यहाँ सबसे ज्यादा तारीफ जावेद जाफरी की करनी होगी, जो इस उम्र में भी एक बच्चे वाले दिमाग के आदमी की एक्टिंग करके बिल्कुल रियलिस्टिक फील देते हैं। फिल्म में 'पृथ्वी' का किरदार निभाने वाले उपेंद्र लिमये भी एकदम झक्कास लगे हैं, आखिर थिएटर आर्टिस्ट तो होते ही हैं कमाल के। रवि किशन भी लगातार अलग-अलग मिजाज की फिल्में कर रहे हैं और उनके आज-कल के अभिनय में एक शानदार वेरिएशन दिखता है। फिल्म के बाकी सभी कलाकारों का अभिनय भी कमाल का है, लेकिन संजय मिश्रा साहब को अब अपनी शैली में थोड़ा बदलाव लाना होगा, क्योंकि उनके काम में एक दोहराव सा अब महसूस होने लगा है। समझे 'गुड्डू ब्रो' बाकी 'धोंदू जस्ट चिल बे'। सच तो यह है कि संजय मिश्रा ने धमाल की पहली फिल्म में जो 'बाबू भाई' का किरदार निभाया था, वो उनका अब तक का सबसे बेहतरीन काम था। उनका बोला हुआ वो मशहूर डायलॉग—"आतंक का दूसरा नाम - बाबू भाई", आज भी याद करने पर चेहरे पर हंसी ला देता है। 🤣
अब बात करते हैं फिल्म की कहानी की, हमेशा की तरह इसमें भी खजाना है और किस्मत से अलग अलग टीमों को (पहली फिल्म से सबकी अपनी अपनी टीम है भाई🤣🤣) सिचुएशन के हिसाब से खजाने का पता चलता है, और अलग अलग घटनाक्रम के माध्यम से सारे किरदार हमेशा की तरह आपस में मिलते भी है। तो खजाने का पता लगाने से लेकर वहां खोजते हुए पहुंचने तक तो सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठाक चल रहा था। कहानी देखने में अच्छी भी लग रही थी और थियेटर में हंसी भी आ रही थी। लेकिन लास्ट में जो ये विस्फोट, पहाड़ के अंदर सुरंग में ब्लास्ट, पत्थर के स्लैब और रास्ते का तोड़ा-ताड़ी वाला सीन दिखाया गया है, वो न तो कहानी के फ्रेम में फिट दिखता है और न ही उसके ग्राफिक्स (VFX) उतने रियलिस्टिक लग रहे हैं। फिल्म का अंत वाला यह सीन किसी दूसरे और बेहतर तरीके से भी फिल्माया जा सकता था, यही इस फिल्म का सबसे बड़ा माइनस प्वाइंट है। खैर, ये मेरे व्यक्तिगत प्वाइंट हैं, बाकी सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है।
देखा जाए तो इंद्र कुमार मल्टी-स्टारर फिल्मों के बेहतरीन निर्देशक और निर्माता हैं, और उनका यह जादू इस फिल्म में भी साफ दिखाई देता है। यह फिल्म पूरी तरह से देखने लायक और एक मनोरंजक फिल्म है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि बाकी फिल्मों की तरह धमाल सीरीज की यह फिल्म भी बढ़िया है और पूरे परिवार के साथ एक साथ बैठकर देखने लायक है। बस अगर इसकी तुलना पिछली धमाल सीरीज की फिल्मों से की जाए, तो उनके मुकाबले इसका थोड़ा सा कम नंबर बनता है। किसी भी सीरीज की पहली फिल्म हमेशा बढ़िया लगी मुझे, इस धमाल सीरीज का भी वही हाल है। सिर्फ धूम सीरीज में धूम 2 पहले से बेहतर है।
अगर आप लोगों ने भी यह फिल्म देखी है, तो आपको यह कैसी लगी? कमेंट में लिखकर जरूर बताइएगा।
धन्यवाद। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
🇮🇳

14/07/2026

Natural music..😍😘😍

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